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संगीत : सम की सुरीली शाम

संगीत के माध्यम से कुछ सार्थक करने के उद्देश्य से स्थापित सांगीतिक संस्था ‘सम’ प्रतिभावान लेकिन उपेक्षित संगीतकारों को समर्पित है..

Author नई दिल्ली | December 10, 2015 22:57 pm
पंडित दरगाही मिश्र स्मृति समारोह में एक प्रस्तुति।

संगीत के माध्यम से कुछ सार्थक करने के उद्देश्य से स्थापित सांगीतिक संस्था ‘सम’ प्रतिभावान लेकिन उपेक्षित संगीतकारों को समर्पित है। दिल्ली और आसपास ही नहीं देश में दूर-दूर से वह ऐसे कलाकारों को आमंत्रित कर मंच प्रदान करती है जिनमें प्रतिभा तो है पर पहुंच नहीं। इसके लिए समय-समय पर दिवंगत मूर्धन्यों के स्मृति समारोह भी आयोजित करती रहती है। सम ने हैबिटाट सेंटर के सहयोग से पिछली सात और आठ दिसंबर को संगीत नायक पंडित दरगाही मिश्र स्मृति समारोह आयोजित किया। पहले दिन मुंबई से आए अनुरत्न राय और पुणे से आई सानिया पाटनकर के शास्त्रीय गायन का कार्यक्रम था। दूसरे दिन दिल्ली के शिवप्रसाद राव के गायन और इलाहाबाद के पंडित साहित्य नाहर के सितारवादन का कार्यक्रम हैबिटाट सभागार में सुनने श्रोताओं की अच्छी-भली उपस्थिति रही।

इस दो रोजा जलसे का शानदार समापन पंडित साहित्य नाहर के सितार-वादन से हुआ। इलाहाबाद के एक संगीत प्रेमी परिवार में जन्मे साहित्य जी को शुरुआती तालीम तो अपने पिता पंडित प्रसाद मिश्र से मिली। लेकिन कालांतर में उन्हें पंडित निखिल बैनर्जी जैसे गुरुओं का मार्गदर्शन भी मिला जिसका गवाह उनका सितार था। इस शाम कर्णाटक संगीत के राग वाचस्पति को उन्होंने अपनी मुख्य प्रस्तुति के लिए चुना और आलाप, जोड़, झाले सहित विलंबित और मध्य तीनताल में दो गतें बजाते हुए इत्मीनान से इस राग की सुरीली अवतारणा की। उनके बजाने में सितार-वादन का परंपरासम्मत अंदाज था जहां विलंबित मसीतखानी पिछली बारहवीं मात्र से शुरू होती है, जाहिर है इस राग की दोनों गत बंदिशें भी उनकी अपनी ही रचनाएं रही होंगी। इसके बाद राग खमाज में एक मीठी धुन बजाकर उन्होंने ‘मधुरेण समापयेत’ वाली उक्ति चरितार्थ की। तबले पर उनका टक्कर का साथ दिया युवा तबला-वादक अभिषेक मिश्र ने।

शाम की शुरुआत शिव प्रसाद राव के गायन से हुई थी। गायक और संगीत-संयोजक श्री महेश्वर राव के सुपुत्र और शिष्य शिव प्रसाद आजकल पंडित विकास कशालकर से मार्गदर्शन पा रहे हैं। इस शाम उन्होंने बिहाग और कौसी कान्हड़ा जैसे दो रागों में विलंबित और द्रुत बंदिशें गाने के बाद अप्रचलित राग प्रदीपकी में अंतिम प्रस्तुति दी। बेहतर होता कि वे दो बड़े रागों की जगह कोई एक चुनते और इत्मीनान से बड़ा और छोटा खयाल गाने के बाद कोई संक्षिप्त चीज गाकर अपनी प्रस्तुति को विराम देते। तबले पर जितेंद्र स्वेन और हारमोनियम पर उनके साथ चेतन निगम थे।

पहली शाम पुणे से आई सानिया पाटनकर का गायन खास रहा। विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे की शिष्या सानिया ने अरविंद थत्ते से टप्पा की विशेष तालीम ली है। अत: उनसे टप्पा सुनने की भी श्रोताओं को अपेक्षा थी। लेकिन दिए गए समय में उन्होंने राग नंद में ही तीन चीजें पेश कीं। विलंबित तीनताल में इस राग के पारंपरिक बड़े खयाल ‘ए बारे सैयां’ के बाद मध्यलय तीनताल में छोटा खयाल गाकर इसी राग में उन्होंने एक सरगम रचना द्रुत तीन ताल में पेश की। हारमोनियम पर उनके साथ विवेक बंसोड़ ने सुरीली संगत की। तबले पर देवाशीष अधिकारी थे जिन्होंने बड़े और छोटे खयाल में तो अच्छी भली संगत की पर ‘सरगम’ में द्रुत तीनताल की लय थामने में इतना समय लगना कुछ अटपटा था। सानिया के गायन में इस बार बेहतरी दिखी। लेकिन पारंपरिक बंदिशों के बर्ताव में उन्हें अनावश्यक छेड़छाड़ से बचना चाहिए भले ही वह सजावट के लिए ही क्यों न हो।

समारोह की शुरुआत हुई थी मुंबई से आए अनुरत्न राय के गायन से। उनके साथ सारंगी पर थे घनश्याम सिसोदिया और तबले पर सचिन शर्मा। राग मारूबिहाग में बड़ा खयाल उन्होंने विलंबित झूमरा में गाते हुए बढ़त वगैरह अच्छी की। लेकिन लगता है कि सुनाने में उनका ज्यादा ध्यान था सुनने में कम, अत: साथ की सारंगी और तानपुरा न सुन पाने के कारण ज्यादातर उनका अपना स्वर कहीं और था सारंगी का कहीं और। जब कभी साथी कलाकारों को सुनकर वे सुर में आए तब भी अक्सर किसी एक सुर पर लंबा रुकने के चमत्कार में अंतत: आवाज के डगमगाने तक की नौबत आई। द्रुत आड़ाचौताल की बंदिश से लेकर तैयार तानों तक उनका गाना ज्यादातर सजावटी लगा, उम्र के साथ शायद परिपक्वता आए। मसलन तानों में तैयारी भी थी विविधता भी, लेकिन सुर में रहना पहली शर्त है यह उन्हें याद रखना चाहिए।

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