Film Review of Aamir Khans PK - Jansatta
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FILM REVIEW ‘PK’: हंसते हंसाते पाखंड पर चोट

निर्देशक- राजकुमार हिरानी, कलाकार-आमिर खान, अनुष्का शर्मा, संजय दत्त, बोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह राजपूत, परीक्षित साहनी। ‘पीके’ बनने में काफी देर लगी। लगभग दो साल। पर ये सही समय पर आई है। जब भारत में भी और पाकिस्तान में भी धार्मिक या मजहबी ताकतें भगवान या खुदा के नाम पर अमानवीय हो रही […]

Author December 22, 2014 9:27 AM
चीन में भारतीय फिल्मों का प्रचार करने वाली चीनी कंपनी स्ट्रैटजिक अलायंस में साझेदार प्रसाद शेट्टी ने कहा कि ‘पीके’ ने गैर अंग्रेजी भाषी विदेशी फिल्मों की श्रेणी में एक करोड़ पैंतीस लाख अमेरिकी डॉलर की कमाई कर रिकॉर्ड बनाया है। (फोटो: बॉलीवुड हंगामा)

निर्देशक- राजकुमार हिरानी, कलाकार-आमिर खान, अनुष्का शर्मा, संजय दत्त, बोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह राजपूत, परीक्षित साहनी।

‘पीके’ बनने में काफी देर लगी। लगभग दो साल। पर ये सही समय पर आई है। जब भारत में भी और पाकिस्तान में भी धार्मिक या मजहबी ताकतें भगवान या खुदा के नाम पर अमानवीय हो रही हैं पीके इंसानियत की कहानी है और धार्मिक दकिनायूसी पर कटाक्ष करनेवाली भी। वैसे इसका हास्य अद्भुत है लेकिन इसका संदेश गंभीर है। ये भरपूर मनोरंजन करती है लेकिन इसमें सामाजिक सोद्देश्यता भी है। ये भारत और पाकिस्तान के अवाम के दिली रिश्ते को जोड़नेवाली भी है और भोजपुरी भाषा का स्वाद देनेवाली भी। इसमें देसी खांटीपन भी है और विदेशी यानी बेल्जियम के दृश्य भी। इसमें दूसरे ग्रह या एलियन का किस्सा भी है और राजस्थानी महक भी। इसका विषय उमेश शुक्ला के निर्देशन में बनी फिल्म ओह माई गॉड से मिलता जुलता है लेकिन कहानी में टटकापन और नयापन भी है।

दूसरे ग्रह आया एक यान राजस्थान में उतरता है और उसमें से एक ऐसा लगभग नंगा शख्स (हालांकि नग्न दिखाया नहीं गया है सिर्फ अहसास होता है) बाहर आता है जिसके दोनों कान खड़े हैं और जिसकी छाती पर एक नीला लॉकेट है। एक चोर इस शख्स से उस लॉकेट को छीनकर भाग जाता है। वो शख्स अब क्या करे क्योंकि उस लॉकेट के बिना वो अपने ग्रह पर वापस नहीं जा सकता। वो अपने लॉकेट खोजने की कोशिश करता है और इसी चक्कर में दिल्ली पहुंच जाता है। लॉकेट के लिए वो भगवान से विनती करता है और इसके लिए वो मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर सब जगह जाता है। फिर उसे मालूम होता है कि उसका लॉकेट तपस्वी बाबा नाम के एक धर्मगुरु के पास है जो लॉकेट को भगवान शिव के डमरू का मनका बताता है।

पीके सभी धर्मगुरुओं और मीडिया वालों से धर्म के बारे में सवाल पूछता है और उसके सवाल ऐसे हैं कि दुनिया उसे पीके यानी शराब पिया हुआ समझने लगती है। शख्स का नाम ही पीके पड़ जाता है। क्या उसे अपना लॉकेट मिल पाएगा या वो पृथ्वी पर ही भटकता रहेगा। यही है पीके की गुत्थी और इसी के इर्द गिर्द पूरी फिल्म घूमती है और इस क्रम में धार्मिक पाखंड और अतार्किकता को उजागर करती है। पर इतने सलीके से और हंसते हंसाते कि शुरू से आखिर तक कई बार पेट में बल पड़ जाते हैं। निर्देशक राजकुमार हिरानी का हास्यबोध मुन्ना भाई शृंखला की दोनों फिल्मों और थ्री इडियट्स में दिख चुका है और इस फिल्म में भी वो भरपूर है। पर कुछ नया करने के लिए उन्होंने आमिर खान के सारे संवादों में लगभग भोजपुरी में या भोजपुरी मिश्रित कर दिया है जिससे न सिर्फ स में खास किस्म की भाषाई मिठास आ गई है बल्कि पूरी फिल्म मे एक देसीपन आ गया है।

लगता है कि पीके का किरदार किसी और ग्रह से नहीं बल्कि आरा या गाजीपुर से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली आ गया है और वहां भौंचक होकर घूम रहा है। भोजपुरी या भोजपुरी हिंदी मिश्रित बोलते हुए आमिर कहीं से भी मुंबईकर नहीं बल्कि खांटी भोजपुरिया या भइया लगते हैं। हिरानी और आमिर की जोड़ी ने इस फिल्म से भोजपुरी को एक नई व्यापकता दी है। ये बात कही जाती है कि आमिर खान मिस्टर परफेक्शनिस्ट हैं। शायद अब ये कहने का वक्त आ गया है कि आमिर विविधताओं के समुच्चय हैं। हर फिल्म में वे नया अंदाज लेकर आते हैं और उस अंदाज को बुलंदी पर पहुंचा देते हैं। और जब कोई उस बुलंदी को छूने का मन बनाता है तो आमिर नए अंदाज की नई बुलंदी पर पहुंच जाते हैं। पीके के चरित्र में उन्होंने मासूमियत, संवेदनीलता और तर्कशीलता तत्वों की ऐसी मिलावट की है कि वो अभी तक हिंदी फिल्मों में नहीं दिखी थी।

अनुष्का शर्मा का काम भी बेहतरीन है और निर्देशक ने उनको नया लुक दे दिया है जिससे उनके चेहरा काफी बदल गया है। अनुष्का ने जग्गू नाम की एक लड़की (यहां नामकरण में भी हिरानी ने अपने विशिष्ट हास्यबोध का परिचय दिया है, अनुष्का का नाम जगतजननी है जिसे छोटा कर जग्गू कर दिया है) की भूमिका निभाई है जो एक टीवी चैनल में काम करती है। जग्गू और पाकिस्तानी सरफराज (सुशांत सिंह राजपूत) की प्रेम कहानी भी फिल्म को एक दूसरे धरातल पर ले जाती है। सौरभ शुक्ला ने तपस्वी बाबा की भूमिका में एक धर्मगुरु की प्रभावशाली भूमिका निभाई है। संजय दत्त की भूमिका छोटी है लेकिन फिल्म में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। सुमधुर गानों और कर्णप्रिय संगीत की वजह से भी पीके दर्शनीय के साथ साथ श्रवणीय फिल्म हो गई है। पिछले साल की तरह आमिर फिर से धूम मचाने आ गए हैं। विचित्र तरह की रंगीन कमीज पहने।

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