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फिल्म समीक्षा : बाइस्कोपवाला, टैगोर की कहानी की सुगंध बरकरार

बाइस्कोपवाला में मिनी फैशन स्टाइलिस्ट है और कोलकाता में रहती है। उसके पिता रोबी बसु (आदिल हुसैन) एक चर्चित फोटोग्राफर हैं। एक हवाई दुर्घटना में रोबी बसु की मौत हो जाती है। मिनी को सदमा लगता है। ऐसे ही माहौल में रहमत खान (डैनी) नाम का एक अफगानी मूल का शख्स उससे मिलने आता है।

रवींद्रनाथ ठाकुर की मशहूर कहानी ‘काबुलीवाला’ पर आधारित यह फिल्म आज के जमाने के मुताबिक ढाली गई है।

निर्देशक- देब मेधेकर, कलाकार-डैनी डैंग्जोंग्पा, गीतांजलि थापा, टिस्का चोपड़ा, आदिल हुसैन : रवींद्रनाथ ठाकुर की मशहूर कहानी ‘काबुलीवाला’ पर आधारित यह फिल्म आज के जमाने के मुताबिक ढाली गई है। इसीलिए ‘काबुलीवाला’ इसमें बाइस्कोपवाला बन गया है। यानी वह सूखे फल यानी ड्राईफ्रूट्स नहीं बेचता बल्कि घूम-घूमकर बच्चों और लोगों को बाइस्कोप दिखाता है। एक बात और, रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी की छोटी-सी बच्ची मिनी अब बड़ी हो गई है। आज जब अफगानिस्तान कई दशकों से युद्ध का शिकार है और दूसरे मुल्कों में स्थाई-अस्थाई तौर पर रहनेवाले अफगानी अजीब सी त्रासदी झेल रहे हैं, देव मेधेकर ने अफगानियों की इस पीड़ा से परिचित करा दिया है। डैनी डैंग्जोंग्पा इसमें बाइस्कोपवाले बने हैं, यानी अफगानी। गीतांजलि थापा इसमें मिनी बनी हैं। वह मिनी, जो बच्ची नहीं बल्कि जवान है।

बाइस्कोपवाला में मिनी फैशन स्टाइलिस्ट है और कोलकाता में रहती है। उसके पिता रोबी बसु (आदिल हुसैन) एक चर्चित फोटोग्राफर हैं। एक हवाई दुर्घटना में रोबी बसु की मौत हो जाती है। मिनी को सदमा लगता है। ऐसे ही माहौल में रहमत खान (डैनी) नाम का एक अफगानी मूल का शख्स उससे मिलने आता है। मिनी उससे मिलना नहीं चाहती। फिर उसे पता चलता है कि यह वही शख्स है जो उसे बचपन में बाइस्कोप दिखाता था और हत्या के आरोप में जेल चला गया था। उसे जेल से रिहा कराने में मिनी के पिता की भूमिका रही थी। इतना जानने के बाद मिनी उससे मिलती है और तब उसे पता चलता है कि रहमत का जुर्म क्या था। क्या रहमत निर्दोष था? क्या अफगानिस्तान में उसका परिवार सही सलामत था? क्या मिनी की मदद से रहमत अपने परिवार से मिल पाता है? फिल्म इन्हीं मसलों के सहारे आगे बढ़ती है। चाहे अभिनय की बात हो या पटकथा की।

‘बाइस्कोपवाला’ एक बेहतरीन फिल्म है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह दिल को छूती है। निर्देशक देव मेधेकर की खूबी यह है कि उन्होंने 1892 में लिखी गई कहानी को आज के दौर में इस तरह बदला है कि लगता ही नहीं कि हम किसी और दौर में लिखी कहानी को देख रहे हैं। ‘काबुलीवाला’ पर पहले भी फीचर और टीवी फिल्में बन चुकी हैं। वे सब मूल कहानी के इर्दगिर्द रही हैं। लेकिन ‘बाइस्कोपवाला’ मूल कहानी से अलग दिशा में जाती है और इसके बावजूद इसमें मूल कथा की सुगंध बरकरार है। मूल कहानी की तरह फिल्म भी मानवता की व्यापकता की कहानी है। देश अलग-अलग हो सकता है लेकिन मनुष्य की भावनाएं अलग-अलग नहीं होतीं। चाहे कोई अफगानी हो या भारतीय, इनसानियत की धारा सबके भीतर बहती है। यह भी गौरतलब है कि मेधेकर मराठी हैं लेकिन एक बांग्ला कहानी के भीतर निहित सार्वभौम को उन्होंने उद्घाटित किया है।

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