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फिल्मजगत का डर, छिन जाएगी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

बीते दो सालों से सिनेमा कारोबार की हालत कोरोना महामारी के कारण पतली है।

कमल हासन।

आरती सक्सेना

बीते दो सालों से सिनेमा कारोबार की हालत कोरोना महामारी के कारण पतली है। ऐसी स्थिति में सरकार ने ‘सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952’ में कुछ संशोधन का प्रस्ताव रखा है, जिनको लेकर फिल्मवालों को लगता है कि यह अभिव्यक्ति की आजादी को नियंत्रित करने की पहल है और इससे सेंसर बोर्ड बेमानी हो जाएगा। सरकार जब चाहेगी किसी भी फिल्म का प्रदर्शन रोक सकेगी। इसके विरोध में बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्मजगत एकजुट होने की कोशिश कर रहा है। सरकार प्रस्तावों को फिल्म कारोबार की भलाई बता रही है जबकि फिल्मजगत इसे अपने लिए मुश्किल मान रहा है। इस बीच प्रस्ताव पर जनता की राय के लिए दिया गया समय, 2 जुलाई, बीत चुका है।

अब तक ए, यू और यूए श्रेणियों में फिल्में प्रमाणित की जाती थी। अब सरकार ने एक प्रस्ताव के तहत यू श्रेणी में उम्र को आधार बना कर तीन उप श्रेणियां (सात, 13 व 16 साल से ज्यादा उम्र के दर्शकों के लिए दिखाई जाने वाली फिल्में) और जोड़ी हैं। फिल्मजगत की मांग को देखते हुए सरकार ने सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 में प्रस्तावित संशोधन में फिल्म पाइरेसी पर काबू पाने के लिए एक नया अनुच्छेद भी जोड़ा है। इसके तहत सरकार ने शशि थरूर की अध्यक्षता में बनी स्थाई समिति की अनुशंसा को स्वीकार करते हुए पाइरेसी की सजा तीन महीने से तीन साल तक करने के साथ ही जुर्माने की राशि भी बढ़ाकर कुल उत्पादन की पांच फीसद कर दी है। मगर जिस संशोधन को लेकर फिल्मजगत परेशान है उसके मुताबिक केंद्र सरकार सेंसर बोर्ड को किसी प्रमाणित की जा चुकी फिल्म के प्रमाणन पर पुनर्विचार का निर्देश दे सकेगी।

सेंसर बोर्ड को अगर लगता है कि कोई फिल्म देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, न्याय व्यवस्था की अवमानना करती है और दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है तो उसे अनुच्छेद 5बी (1) के तहत प्रमाण पत्र देने से इनकार कर सकता है। सारा मसला इसी संशोधन को लेकर खड़ा हुआ है। फिल्मजगत को लगता है कि इस संशोधन के जरिए किसी भी शिकायत पर सरकार जब चाहे किसी भी फिल्म का प्रदर्शन रोक कर उसे वापस बुला सकती है। एक तरह से जरूरत होने पर किसी फिल्म के प्रमाणपत्र पर आखिरी फैसला सरकार का होगा, भले ही उसे सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र ही क्यों न मिल गया हो। सरकार को सेंसर बोर्ड का अतिक्रमण कर पुनर्विचार का अख्तियार दे दिया गया है। फिल्मवालों का मानना है कि सेंसर बोर्ड की अहमियत इस संशोधन से न के बराबर हो गई है। सरकार इस संशोधन के जरिए फिल्मजगत की मुश्के कसना चाहती है। इसी के खिलाफ बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्मजगत एकजुट हो रहा है।

कमल हासन का कहना है कि इस कानून से बनने से फिल्म निर्माण की आजादी खो जाएगी। सुधीर मिश्रा का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन के जरिए सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना चाहती है। कई निर्माता इस संशोधन पर हैरान हैं। उन्हें सबसे ज्यादा चिंता इस बात से है कि किसी भी फिल्म के प्रदर्शन का आखरी फैसला सरकार का होगा। संशोधन के जरिए सरकार ने सेंसर बोर्ड के खिलाफ अपील का रास्ता भी बंद कर दिया है। पहले बोर्ड के फैसले के खिलाफ निर्माता अपीलेट ट्रिब्यूनल में जा सकता था। हालात को देखते हुए फिल्मजगत चिंतित नजर आ रहा है क्योंकि कई फिल्मवालों को लगता है कि केंद्र सरकार अपनी पहलकदमी को लेकर पीछे नहीं हटती है। इसलिए इस प्रस्तावित संशोधन को कानून बनाने के मामले में उसका रुख अलग नहीं होगा।

सरकार और फिल्मजगत के दावे

हालांकि सरकार का दावा है कि इस संशोधित कानून के लागू होने के बाद पाइरेसी पूरी तरह से रुक जाएगी। मगर फिल्मजगत का मानना है कि अगर यह कानून बनता है तो फिल्म बनाना ही मुश्किल हो जाएगा। इस कानून को लेकर फिल्मवाले कितने चिंतित हैं यह इस बात से ही पता चल जाता है कि लगभग डेढ़ हजार फिल्मवालों न इस संशोधन के खिलाफ हस्ताक्षर कर अपना विरोध प्रकट किया है। हस्ताक्षर करने वाले फिल्मवालों में निर्माता निर्देशक सुधीर मिश्रा, हंसल मेहता, अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, नंदिता दास, फरहान अख्तर, दिवाकर बनर्जी, अभिनेता कमल हासन, सूर्या आदि शामिल हैं। कमल हासन और विशाल भारद्वाज जैसे फिल्मकारों ने ट्वीट कर इस संशोधन की खिलाफत की है। फरहान अख्तर ने भी इस संशोधन के खिलाफ ट्वीट कर अपनी राय व्यक्त की है। फिल्मवालों ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को डेढ़ हजार लोगों के दस्तखत वाला विरोध-पत्र भी भेजा है।

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