अगस्त 2024 में सामने आई जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट ने मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं और अन्य कमजोर वर्गों के साथ होने वाले भेदभाव और शोषण को उजागर किया। रिपोर्ट में कास्टिंग काउच, ताकतवर लोगों की मांगें न मानने वालों का बहिष्कार, फिल्म सेटों पर बुनियादी सुविधाओं की कमी और वेतन में असमानता जैसे गंभीर मुद्दों की तरफ ध्यान दिलाया गया।

वुमेन इन सिनेमा कलेक्टिव की फाउंडिंग मेंबर और जिन्होंने रिटायर्ड हाई कोर्ट जज जस्टिस के. हेमा की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय कमेटी के गठन में अहम भूमिका निभाई अभिनेत्री पार्वती थिरुवोथु ने कहा है कि मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में नए कलाकारों का शोषण अब भी जारी है। कई नए कलाकार बिना किसी उचित कॉन्ट्रैक्ट के काम करने को मजबूर हैं।

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अभिनेत्री पार्वती थिरुवोथु ने कहा कि पिछले आठ-नौ सालों में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में कई बदलाव जरूर आए हैं, लेकिन ये बदलाव गलत प्रथाओं के खिलाफ जागरूकता से ज्यादा डर के कारण हुए हैं। उन्होंने कहा कि वह बदलावों से खुश हैं, लेकिन उनकी रफ्तार से संतुष्ट नहीं हैं। चेन्नई के ताज कोन्नेमारा होटल में आयोजित ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के ‘एक्सप्रेसो’ कार्यक्रम में पार्वती ने इंडस्ट्री में अब भी मौजूद समस्याओं पर खुलकर बात की।

नए कलाकारों का हो रहा है अभी भी शोषण

पार्वती ने कहा, “जब कोई प्रोडक्शन हाउस इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी का गठन करता है, तो यह हमारे लिए एक बड़ी जीत है, क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री को एक कार्यस्थल के रूप में मान्यता दिलाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। हम ऐसी जगह काम करते हैं जहां कॉन्ट्रैक्ट तक नहीं होते और जब नए लोग आते हैं, तो उनसे कहा जाता है कि हम एक परिवार की तरह हैं।

बस काम करो, तुम्हें मौका मिल रहा है। एक नए कलाकार के तौर पर आप ऐसी सर्विस देते हैं, जिससे प्रोड्यूसर पैसे कमा सकता है। लेकिन कई लोग नए कलाकारों के सपनों और महत्वाकांक्षाओं का फायदा उठाकर उनका शोषण करते हैं।”

पार्वती ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री आज भी सुपरस्टार्स और पुरुष अभिनेताओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें कई बार देवता जैसा दर्जा दिया जाता है। ऐसे माहौल में नए कलाकारों को अपने अधिकारों और शर्तों के बारे में खुलकर बोलने का मौका नहीं मिल पाता। अभिनेत्री ने कहा, “मैं किसी व्यक्ति को देवता बनाने की सोच के पूरी तरह खिलाफ हूं।

इस इंडस्ट्री में ऐसा बहुत होता है। जब हम किसी को इतना ऊंचा दर्जा दे देते हैं, तो सही और गलत के बीच का फर्क धुंधला पड़ जाता है, क्योंकि ऐसे लोग नए कलाकारों पर अपना प्रभाव और ताकत इस्तेमाल कर सकते हैं। मेरा मानना है कि इसमें निर्माता और अभिनेता, दोनों की बराबर भूमिका रही है।”

डर की वजह से हुआ इंडस्ट्री में बदलाव

पार्वती ने कहा कि पिछले आठ-नौ सालों में इंडस्ट्री में बदलाव जरूर आया है, लेकिन यह बदलाव काफी हद तक डर की वजह से हुआ है। उन्होंने कहा, “अब पहले की तरह नहीं है। ताकतवर और प्रभावशाली लोग डरते हैं कि उनके गलत कामों के लिए उनसे जवाब मांगा जा सकता है। उन्हें इस बात का डर है कि उनके खिलाफ आवाज उठेगी, उनके बारे में लिखा जाएगा या फिर वे ‘कैंसल कल्चर’ का शिकार हो सकते हैं।”

हालांकि, पार्वती का मानना है कि यह डर ज्यादा समय तक नहीं रहेगा।। उन्होंने कहा, “अगर गलत काम करने वालों को अपने कृत्यों के परिणाम नहीं भुगतने पड़े, तो वे फिर से शोषण की पुरानी आदतों पर लौट सकते हैं। फिलहाल डर की वजह से कई समस्याओं को चुनौती मिल रही है, जैसे बिना कॉन्ट्रैक्ट काम कराना, सेट पर साफ-सफाई और शौचालय जैसी सुविधाओं की कमी, भुगतान में देरी और कला के नाम पर अमानवीय काम के घंटे।”

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन किया गया सवाल

पार्वती ने कहा कि इन बदलावों की शुरुआत वुमेन इन सिनेमा कलेक्टिव के गठन से हुई। उन्होंने बताया कि संगठन ने इंडस्ट्री के भीतर शिकायत करने के बजाय सीधे सरकार से संपर्क किया। उनके अनुसार, WCC ने तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से सवाल किया था कि जब फिल्म इंडस्ट्री सरकार के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत है, तो इसके लिए स्पष्ट नीतियां और निगरानी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई।

उन्होंने कहा, “मैं बदलाव की रफ्तार से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं, लेकिन अच्छी बात यह है कि हम पीछे हटने वाली नहीं हैं। अगर किसी को लगता है कि देरी करके हमें थका दिया जाएगा, तो ऐसा नहीं होगा। हम पितृसत्तात्मक व्यवस्था से पहले ही तंग आ चुकी हैं और अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगी।”

वर्कफ्रंट की बात करें, तो पार्वती थिरुवोथु इन दिनों निर्देशक निसाम बशीर की फिल्म ‘आई, नोबडी’ की रिलीज की तैयारी में हैं। इसमें पृथ्वीराज सुकुमारन, हक्कीम शाहजहान, अशोकन, विजयराघवन और मधुपाल जैसे कलाकार हैं और यह फिल्म 9 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।

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