इस साल आई ‘धुरंधर 2’ ने बॉक्स ऑफिस के साथ-साथ दर्शकों के दिलों पर भी गहरी छाप छोड़ी है। फिल्म की कहानी और एक्टर्स के साथ-साथ इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी, बड़े पैमाने के एक्शन सीक्वेंस, VFX और साउंड डिजाइन को भी खूब पसंद किया गया। कई फिल्म क्रिटिक्ट ने भी टेक्निकल क्वालिटी के मामले में इस फिल्म की बहुत तारीफ की।

ये इकलौती ऐसी फिल्म नहीं है जिसे तकनीक की सहायता से दमदार बनाया गया हो। इसके अलावा ‘ब्रह्मास्त्र’ ‘रा-वन’, ‘कृष 3’ समेत कुछ अन्य की गिनती भी तकनीती रूप से मजबूत फिल्मों में होती है। मगर पुराने जमाने में ये सब संभव नहीं था। मगर तब भी ऐसी फिल्में बनी जिन्होंने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। मगर ऐसा कैसे संभव हुआ आइये जानते हैं।

आज भले ही फिल्मों की सफलता का पैमाना VFX, CGI, साउंड डिजाइन और बड़े विजुअल्स बन गए हैं। एक दौर ऐसा भी था, जब किसी फिल्म को यादगार बनाने के लिए इन तकनीकों की जरूरत नहीं पड़ती थी। उस समय कहानी, स्क्रीनप्ले, अभिनय और सबसे बढ़कर दमदार डायलॉग ही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत होते थे।

डायलॉग बनते थे फिल्मों की जान

70, 80 और 90 के दशक की कई फिल्में आज भी सिर्फ अपने डायलॉग की वजह से लोगों की जुबान पर हैं। ‘शोले’ का “कितने आदमी थे”, ‘दीवार‘ का “मेरे पास मां है”, ‘डॉन’ का “डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है”, ‘मिस्टर इंडिया’ का “मोगैंबो खुश हुआ” और ‘दामिनी’ का “तारीख पर तारीख” जैसे डायलॉग आज भी उतने ही मशहूर हैं, जितने रिलीज के समय थे। इन डायलॉग्स ने फिल्मों को सिर्फ हिट नहीं बनाया, बल्कि उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया।

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उस दौर में तकनीकी संसाधन सीमित थे। कंप्यूटर जनरेटेड विजुअल्स, हाई-एंड कैमरे और आधुनिक साउंड टेक्नोलॉजी जैसी सुविधाएं नहीं थीं। ऐसे में निर्देशक और लेखक अपनी पूरी ताकत कहानी, किरदारों और डायलॉग पर लगा दिया करते थे। यही वजह थी कि दर्शक फिल्म खत्म होने के बाद भी उसके किरदारों और डायलॉग्स को लंबे समय तक याद रखते थे।

आज का सिनेमा काफी हद तक बदल चुका है। दर्शकों की उम्मीदें पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। अब सिर्फ अच्छी कहानी ही नहीं, बल्कि दमदार विजुअल्स, शानदार एक्शन, बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी और दमदार साउंड भी जरूरी माने जाते हैं। यही कारण है कि आज की बड़ी फिल्मों का बजट केवल स्टारकास्ट पर नहीं, बल्कि तकनीकी विभाग पर भी भारी-भरकम खर्च होता है।

हालांकी आज भी फिल्मों का यादगार बनना पूरी तरह तकनीक पर निर्भर नहीं करता। मगर इसका इस्तेमाल किसी फिल्म को बड़ा जरूर बना सकता है। मगर उसे उसे ऐतिहासिक बनाने के लिए आज भी मजबूत कहानी और यादगार डायलॉग ही सबसे अहम हैं। जब कंटेंट और तकनीक का सही संतुलन बनता है, तभी कोई फिल्म दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक अपनी जगह बना पाती है।

90 के दशक की कुछ फिल्में जिनका कम तकनीक में भी चल गया जादू

90 के दशक में फिल्में अपनी कहानी, दमदार डायलॉग, यादगार गानों और कलाकारों की शानदार एक्टिंग की वजह से लोगों के दिलों में जगह बनाती थीं। उस समय भी VFX या बड़ी तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल नहीं होता था। लेकिन उनकी कहानी दिल को छू जाती थी और लोग उनसे जुड़ा महसूस करते थे। आइये उन फिल्मों के बारे में जानते हैं।

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1994 में रिलीज हुई ‘हम आपके हैं कौन‘ अपनी पारिवारिक कहानी, भावनात्मक पलों और यादगार गानों की वजह से आज भी क्लासिक मानी जाती है। वहीं ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (1995) ने सिर्फ रोमांस, दमदार डायलॉग और शानदार किरदारों के दम पर इतिहास रच दिया। इसी साल आई ‘अंदाज अपना अपना’ भी सीमित तकनीक के बावजूद अपनी बेहतरीन कॉमेडी और वन-लाइनर्स के कारण आज तक कल्ट फिल्म बनी हुई है।

1997 में रिलीज हुई ‘बॉर्डर’ में वॉर के सीन व लोकेशन और प्रैक्टिकल इफेक्ट्स के साथ फिल्माए गए थे। इसकी देशभक्ति से भरपूर कहानी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। 1998 की ‘सत्या’ ने बिना किसी तकनीकी तामझाम के अपनी वास्तविक कहानी और दमदार अभिनय से गैंगस्टर फिल्मों की नई पहचान बनाई।

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इसी दौर की ‘कुछ कुछ होता है’ (1998) ने अपनी दिल छू लेने वाली कहानी, म्यूजिक और स्टारकास्ट के दम पर खास पहचान बनाई। ‘जो जीता वही सिकंदर’ (1992) साधारण तकनीक के बावजूद बेहतरीन स्पोर्ट्स ड्रामा, कहानी और गानों की वजह से आज भी दर्शकों की पसंदीदा फिल्मों में शामिल हो गई। वहीं ‘बाजीगर’ (1993) अपने रोमांचक ट्विस्ट और शाहरुख खान के दमदार अभिनय के कारण बड़ी हिट साबित हुई। ‘दामिनी’ (1993) कोर्टरूम ड्रामा, फिल्म भी अपनी मजबूत कहानी और यादगार डायलॉग के दम पर हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में शामिल हो गई।