आज से 100 साल से भी ज्यादा पहले फिल्मों में काम करना आसान नहीं था। खासकर महिलाओं के लिए तो यह बहुत बड़ी बात हुआ करती थी। उस समय समाज में महिलाओं का घर से बाहर काम करना भी अच्छा नहीं माना जाता था। ऐसे में फिल्मों में काम करना तो दूर की बात थी। मगर उस वक्त एक महिला ने समाज के सारे बंधनों को भूलते हुए एक नई पहल की। आइये जानते हैं उनकी कहानी…
साल 1913 में जब दादासाहेब फाल्के ‘मोहिनी भस्मासुर’ बना रहे थे, तब भारतीय सिनेमा अपने शुरुआती दौर में था। उनकी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ रिलीज हो चुकी थी। लेकिन उस फिल्म में महिलाओं का किरदार भी पुरुषों ने निभाया था, क्योंकि कोई महिला फिल्मों में काम करने के लिए तैयार नहीं थी।
मगर फाल्के थोड़ा अलग सोचते थे, वो चाहते थे कि उनकी अगली फिल्म में महिलाएं काम करें। तभी उनकी मुलाकात दुर्गाबाई कामत और उनकी बेटी कमलाबाई गोखले से हुई।
दुर्गाबाई ने खोला महिलाओं के लिए रास्ता
उस समय एक थिएटर कंपनी नासिक आई थी। इसका नाम चित्ताकर्षक नाटक कंपनी था। इस कंपनी में दुर्गाबाई कामत और उनकी बेटी कमलाबाई काम करती थीं। दादासाहेब फाल्के अक्सर उनके नाटक देखने जाते थे। जब उन्हें पता चला कि थिएटर कंपनी कुछ महीनों के लिए बंद होने वाली है, तो उन्होंने कंपनी के मालिक रघुनाथराव गोखले से बात की।
फाल्के ने उनसे पूछा कि क्या दुर्गाबाई और कमलाबाई उनकी फिल्म में काम कर सकती हैं। रघुनाथराव ने इसकी अनुमति दे दी। इसके बाद दुर्गाबाई ने ‘मोहिनी भस्मासुर’ में पार्वती का किरदार निभाया, जबकि उनकी बेटी कमलाबाई ने मोहिनी की भूमिका निभाई। इस तरह दुर्गाबाई कामत को भारत की पहली महिला फिल्म अभिनेत्री के रूप में पहचान मिली। हालांकि ये सफर उनके लिए आसान नहीं था।
उस दौर में महिलाओं का काम करना माना जाता था गलत
आज फिल्मों में काम करना एक सामान्य पेशा है। लेकिन उस समय अभिनय को अच्छा पेशा नहीं माना जाता था। खासकर महिलाओं के लिए थिएटर और फिल्मों में काम करना समाज की नजर में गलत माना जाता था। इसी वजह से फिल्मों में महिलाओं की भूमिका पुरुष कलाकार निभाते थे। दुर्गाबाई ने ऐसे समय में फिल्मों में कदम रखा, जब समाज महिलाओं को इस पेशे में आने की इजाजत देने के लिए तैयार नहीं था।
दादासाहेब फाल्के को भी अपनी पहली फिल्म के लिए महिला कलाकार ढूंढने में काफी परेशानी हुई थी। मगर दुर्गाबाई के लिए उन्होंने एक उज्जवल जीवन के रास्ते खोल दिए थे।
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दुर्गाबाई ने झेली थी घरेलू हिंसा
थिएटर और फिल्मों में आने से पहले उन्हें अपनी निजी जिंदगी में भी बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उनकी बेटी कमलाबाई ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता अच्छे इंसान नहीं थे। वह उनकी मां दुर्गाबाई को बहुत मारते-पीटते थे। एक समय ऐसा आया जब दुर्गाबाई के लिए यह हिंसा सहना मुश्किल हो गया। इसके बाद वह अपनी बेटी के साथ घर छोड़कर मुंबई आ गईं।
खुद के साथ-साथ बेटी के जीवन की थी चिंता
अपने और बेटी के लिए दुर्गाबाई ने थिएटर में काम करना शुरू किया। इसके बारे में बात करते हुए कमलाबाई ने कहा था, “हम और कैसे गुजारा कर सकते थे?” लोगों ने उनके थिएटर में काम करने पर बातें बनाईं और उनकी आलोचना की। लेकिन दुर्गाबाई ने लोगों की परवाह नहीं की। उनके लिए काम करना जरूरी था, क्योंकि उन्हें अपनी बेटी के साथ खुद अपनी जिंदगी चलानी थी।
दुर्गाबाई थीं एक अच्छी कलाकार
दुर्गाबाई सिर्फ फिल्मों में काम करने वाली महिला नहीं थीं। वह पहले से ही एक अच्छी थिएटर कलाकार थीं। उन्होंने कथक सीखा था। वह वीणा, सितार और तबला भी बजाती थीं। उन्होंने थिएटर में ‘किंग लियर’, ‘मैकबेथ’, ‘रोमियो एंड जूलियट’ और ‘कीचक वध’ जैसे नाटकों में भी काम किया था। यानी जब दादासाहेब फाल्के ने उन्हें अपनी फिल्म में काम करने का मौका दिया, तब तक वह एक अनुभवी कलाकार बन चुकी थीं।
पुरुष कलाकारों ने किया था दुर्गाबाई का विरोध
जब थिएटर कंपनी में महिलाओं ने काम करना शुरू किया, तो कुछ पुरुष कलाकारों ने इसका विरोध किया। कुछ ने तो कंपनी छोड़ने की धमकी भी दी। लेकिन कंपनी के मालिक रघुनाथराव गोखले ने महिलाओं का साथ दिया और अपना फैसला नहीं बदला। यही थिएटर आगे चलकर दुर्गाबाई को सिनेमा तक लेकर गया।
दादासाहेब फाल्के से मुलाकात
कमलाबाई के अनुसार, दादासाहेब फाल्के अक्सर उनकी नाटक कंपनी के कार्यक्रम देखने आते थे। जब उन्हें पता चला कि कंपनी कुछ समय के लिए बंद हो रही है, तो वह दुर्गाबाई और कमलाबाई के घर पहुंचे। उन्होंने कहा कि जब तक थिएटर कंपनी बंद है, तब तक क्या मां-बेटी उनकी फिल्म में काम कर सकती हैं? इसके बाद दुर्गाबाई और कमलाबाई ने ‘मोहिनी भस्मासुर’ की शूटिंग शुरू की। फिल्म को पूरा होने में करीब छह महीने लगे।
इस फिल्म के साथ ही दोनों ने भारतीय सिनेमा में इतिहास रच दिया। दुर्गाबाई की बेटी कमलाबाई ने भी थिएटर और फिल्मों में लंबा करियर बनाया। उन्होंने छह दशकों से ज्यादा समय तक काम किया। इसके बाद उनके परिवार में अभिनय की परंपरा आगे बढ़ी। उनके पोते चंद्रकांत गोखले और आगे चलकर विक्रम गोखले और मोहन गोखले जैसे कलाकारों ने भी अभिनय की दुनिया में नाम बनाया। यानी दुर्गाबाई का एक फैसला आगे चलकर कई पीढ़ियों की अभिनय विरासत बन गया।
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महिलाओं के लिए रास्ता खोलने वाली दुर्गाबाई को क्यों नहीं मिला सम्मान?
इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद दुर्गाबाई कामत के बारे में आज बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके जन्म और निधन की तारीख को लेकर भी अलग-अलग जानकारी मिलती है। लेकिन उनकी बेटी की यादों से यह साफ है कि दुर्गाबाई ने बहुत मुश्किल जिंदगी जी थी।
उन्होंने घरेलू हिंसा झेली, समाज की बातें सुनीं और अकेले अपनी बेटी को पालने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्हें काम करना था, अपनी बेटी को पालना था और अपने पैरों पर खड़ा होना था।
उन्होंने थिएटर और सिनेमा को अपना सहारा बनाया। उस समय उनके पास न कोई एजेंट था, न कास्टिंग डायरेक्टर और न ही कोई बड़ी फिल्म इंडस्ट्री। उनके पास सिर्फ उनकी प्रतिभा, उनकी बेटी और आगे बढ़ने का हौसला था। उन्होंने कैमरे के सामने खड़े होने का फैसला किया और उनके बाद फिल्मों में आने वाली हर भारतीय अभिनेत्री के लिए उन्होंने एक रास्ता खोल दिया।
