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राजेश खन्ना के बंगले में जमीन पर बैठते थे डायरेक्टर- प्रोड्यूसर, जूनियर महमूद ने बताया था- कुछ ऐसा था ‘काका’ का रुतबा

जूनियर महमूद ने एक इंटरव्यू में कहा था कि चाहे वह छोटे प्रोड्यूसर डायरेक्टर हों या बड़े या फिर एक्टर, सब नीचे ही बैठा करते थे और काका थोड़ी ऊंचाई पर बैठ जाते थे। उनका रुतबा बेहद ही अलग था।

rajesh khanna, rajesh khanna lifestyle, rajesh khanna life journeyराजेश खन्ना का रुतबा किसी राजा-महाराजा से कम नहीं था (फोटो क्रेडिट- इंडियन एक्सप्रेस)

बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार कहे जाने वाले राजेश खन्ना ने जैसा स्टारडम देखा वैसा किसी दूसरे स्टार को नसीब नहीं हुआ। 70 के दशक में जब वे सफलता के शिखर पर थे तब उनकी एक झलक पाने के लिए लोग पागल हुआ करते थे। काका का गुरु कुर्ता, नजरें झुका कर और गर्दन टेढ़ी कर बात करने की अदा युवाओं का स्टाइल स्टेटमेंट बन गया था। वो ऐसा दौर था जब राजेश खन्ना फिल्म के हिट होने की गारंटी बन गए थे।

इंडस्ट्री के तमाम दिग्गज डायरेक्टर-प्रोड्यूसर राजेश खन्ना की डेट पाने के लिए तमाम जुगत लगाया करते थे, मिन्नतें किया करते थे। काका के साथ तमाम फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता जूनियर महमूद ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उस दौर में उनके (राजेश खन्ना) के बंगले आशीर्वाद में इंडस्ट्री के तमाम नामी डायरेक्टर-प्रोड्यूसर बैठकी लगाया करते थे।

मेहमान नीचे और खुद ऊपर बैठते थे काका: India Asks को दिये इंटरव्यू में जूनियर महमूद ने कहा था कि राजेश खन्ना के बंगले आशीर्वाद का जो हॉल था, ऐसा हॉल मैंने कोई दूसरा नहीं देखा था। उस हाल में सीटिंग की व्यवस्था नीचे ही थी। काका से मिलने जो भी आता, चाहे वह छोटे प्रोड्यूसर डायरेक्टर हों या बड़े या फिर एक्टर, सब नीचे ही बैठा करते थे। काका दरवाजा खोलकर हाल में एंट्री लेते थे और थोड़ी ऊंचाई पर बैठ जाते थे, एक टेबल पर और एक-एक लोगों से बात करते थे।

सिल्क के लुंगी-कुर्ते में करते थे स्वागत: बकौल जूनियर महमूद, राजेश खन्ना हमेशा अपने घर में सिल्क के कुर्ते और लुंगी में ही नजर आते थे। काका तमाम मेहमानों का स्वागत इसी परिधान में किया करते थे, भले ही वह कितना बड़ा या नामी शख्स क्यों ना हो।

बेहद मूडी थे काका: जूनियर महमूद के मुताबिक राजेश खन्ना बेहद मूडी इंसान थे। अगर उनका मूड ठीक रहता तो सब कुछ अच्छा चलता, दुनिया अच्छी रहती। लेकिन अगर उनका मूड ठीक नहीं होता, कुछ ऊपर-नीचे हो तो अच्छे-अच्छे लोग उनके सामने आने से घबराते थे। काका अपने ही मिजाज के आदमी थे।

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