दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ पिछले कुछ समय से विवादों में घिरी हुई है। फिल्म को पहले लंबे समय तक सेंसरशिप से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, फिर यह चुपचाप ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज हुई और उसके बाद अचानक हटा दी गई। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित यह फिल्म 3 जुलाई को जी5 पर रिलीज हुई थी।
हालांकि, रिलीज के 48 घंटे के भीतर ही इसे भारत में ब्लॉक कर दिया गया। बाद में फिल्म को दुनिया भर में प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया। अब फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत की है।
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फिल्म की रिलीज काफी चुपचाप हुई। यहां तक कि जी5 पर रिलीज के बाद टीजर भी आए। इसके पीछे क्या वजह थी?
यह फैसला मेरे प्रोड्यूसर्स और प्लेटफॉर्म ने लिया था, क्योंकि जब भी हमने रिलीज की घोषणा की, तो सरकार की तरफ से दबाव डाला गया और हमें रिलीज रोकनी पड़ी। इसलिए यह पूरी तरह से उनका फैसला था कि इसे बिना किसी प्रोमो के ही रिलीज किया जाए। मुझे रिलीज के बारे में कुछ दिन पहले ही पता चला। प्रोड्यूसर्स ने फोन करके बताया कि जी5 ‘पंजाब ’95’ को किसी दूसरे टाइटल के साथ रिलीज करना चाहता है। मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं थी। मैंने बस उनसे कहा कि फिल्म में कोई कट नहीं होना चाहिए। वे मान गए, तो मैंने उन्हें बताया कि हमारे पास ‘सतलुज’ नाम भी रजिस्टर्ड है। फिर हमने इसे रिलीज कर दिया।
कुछ लोग कह रहे हैं कि आखिरी समय में फिल्म का नाम बदल दिया गया क्योंकि ‘पंजाब 95 नाम पर बात अटक गई थी।
नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। जब सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने मुझसे ओरिजिनल टाइटल ‘घल्लूघारा’ बदलने के लिए कहा, तो मैंने उन्हें 2-3 नाम दिए, जिनमें ‘पंजाब 95’ और ‘सतलुज’ शामिल थे। ‘सतलुज’ नाम तो शुरू से ही था… तो यह CBFC से मंजूर हुआ टाइटल था, न कि कोई नया नाम जो अचानक सामने आया।
क्या सरकार को रिलीज के बारे में पता था? उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?
नहीं, मुझे नहीं लगता कि सरकार को रिलीज के बारे में पता था… मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। जहां तक उनकी प्रतिक्रिया की बात है, तो वह साफ है… दुनिया देख सकती है। मुझे उनकी तरफ से कोई फोन नहीं आया। मेरा इसमें कोई रोल नहीं था। न तो मेरे प्रोड्यूसर्स को और न ही मुझे कोई फ़ोन आया। लेकिन जी5 को (I&B) मिनिस्ट्री से फिल्म रोकने के लिए एक लेटर मिला।
रिलीज होने के 48 घंटे के अंदर ही भारत में फिल्म पर रोक लगा दी गई और बाद में इसे दुनिया भर में जी5 से हटा दिया गया। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?
मेरा दिल टूट गया था… बैन आपको एक कोने में धकेल देता है और आप खुद से यह पूछने पर मजबूर हो जाते हैं… क्या हम सच में किसी लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं? देखिए, 31 साल पहले पंजाब पुलिस ने जसवंत सिंह खालड़ा को अगवा करके मार डाला था। उस समय उन्हें न्याय दिलाने में केंद्र सरकार ने बड़ी भूमिका निभाई थी। आज 31 साल बाद खालड़ा को फिर से अगवा किया जा रहा है। मैं केंद्र सरकार से बस यही गुजारिश करता हूं कि वे बड़ा दिल दिखाएं, हमारे प्रति दयालु बनें और हमें उनकी कहानी दुनिया को बताने दें। खालड़ा को दोबारा अगवा न करें। मैं चाहता हूं कि केंद्र सरकार बड़ा दिल दिखाए और उन्हें आजादी दे… उनकी कहानी लोगों तक पहुंचने दे। सरकार ने उनके साथ जैसा बर्ताव किया है, उससे उन्हें निराशा हुई है। इस फिल्म की किस्मत कुछ अलग थी। लेकिन हमें खुशी है कि यह कहानी दुनिया भर में लोगों को पसंद आ रही है। दर्शकों से हमें बहुत जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है।
सरकारी पैनल का कहना है कि इस फिल्म का इस्तेमाल विरोधी ताकतें, पाकिस्तान या अलगाववादी समूह कर सकते हैं?
क्या इस बात का कोई आधार है? उनका कहना है कि मेरी फ़िल्म से पंजाब में कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। इसके उलट, मेरी फ़िल्म ने तो पंजाब को एकजुट किया है। आप पंजाब जाकर देखिए, लोग साथ मिलकर फिल्म देख रहे हैं। वे कहते हैं कि मेरी फिल्म समाज में बंटवारा कर रही है और हिंदुओं और सिखों को अलग कर रही है, लेकिन असल में पंजाब के हिंदू और सिख साथ मिलकर फिल्म देख रहे हैं। इसका मकसद किसी को भड़काना नहीं था। मेरी फिल्म उन लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने का काम करती है जिन्होंने बहुत दुख झेले हैं… मुझे नहीं लगता कि इसे बैन करने की कोई वजह थी।
शुरुआती 48 घंटों तक लोग शांति से अपने घरों में मेरी फिल्म देख रहे थे। कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन सरकार ने फिल्म पर बैन लगा दिया और अब यह एक आंदोलन बन गया है। 10 दिन हो गए हैं, हर कोई शांति और भाईचारे के साथ फिल्म देख रहा है और उन्हें ‘लंगर’ भी खिलाया जा रहा है।
इस देश की कानून-व्यवस्था के लिए क्या ज्यादा नुकसानदायक है? मेरी फिल्म जिसने लोगों को जोड़ा है, या नेताओं के नफरत भरे भाषण जिनका मकसद हमें बांटना है? प्रोपेगैंडा फिल्मों को सरकार का समर्थन मिलता है। अगर आप यह भी कहें कि मेरी फिल्म प्रोपेगैंडा फिल्म है, तो इसे भी वैसे ही रिलीज होने दें जैसे आपने दूसरी प्रोपेगैंडा फिल्में रिलीज की थीं। फर्क क्यों? हम बहुत बड़ा देश हैं। एक फिल्म हमारे सामाजिक ताने-बाने को नुकसान नहीं पहुंचा सकती।
क्या आप सरकारी पैनल से मिले?
हां, मैं इंटर-डिपार्टमेंटल कमिटी (IDC) पैनल के साथ हुई एक चर्चा में शामिल हुआ था, मैंने बस उन्हें बताया कि यह फिल्म मेरे लिए क्यों जरूरी थी। लेकिन दो दिन बाद जी5 ने मुझे बताया कि IDC ने कहा है कि फिल्म पर बैन लगाओ। तो जब मैंने सुना कि IDC फिल्म पर बैन लगा रही है, तो मैंने सोचा कि ठीक है, अब क्या करें? इस देश की राजनीति को हर चीज को इतना ध्रुवीकृत करने की जरूरत क्यों है? मुझे समझ नहीं आता।
कुछ लोग कहते हैं कि फिल्म एकतरफा है।
मेरी फिल्म एकतरफा कैसे है? अगर आपको लगता है कि मेरी फिल्म एकतरफा है, तो साफ है कि आपने इसे पूरा नहीं देखा है। एक फिल्ममेकर के तौर पर, मैं गर्व से कहता हूं कि अगर आप मेरी कला की आलोचना करना चाहते हैं, तो पहले उसे पूरा देखें। क्योंकि अगर आप इसे देखेंगे, तो आप सुग्गा (सुविंदर विक्की) और CBI अफसर (अर्जुन रामपाल) के बीच हुई बातचीत सुनेंगे, जहां सुग्गा उनसे कहता है कि हमारी एक-एक गोली यहां हजारों गोलियों के बदले चलती है। या फिर मुख्यमंत्री और DGP बिट्टा के किरदारों के बीच हुई बातचीत, जहां बिट्टा उनसे कहता है कि उनके बिना पंजाब में उग्रवाद खत्म नहीं होता। मैं एक फिल्ममेकर हूं।
मैं अपने किरदारों को खुद अपनी बात कहने देता हूं। अगर वे दूसरी तरफ की बात कह सकते हैं, तो मुझे ढोल बजाने की क्या जरूरत है। मैंने फिल्म में यह भी बताया है कि प्रॉक्सी वॉर में हज़ारों पुलिसकर्मी मारे गए थे। लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तो आप कैसे कह सकते हैं कि मेरी फिल्म दूसरी तरफ के बारे में चुप है? फिल्म दूसरी तरफ के बारे में साफ-साफ बात कर रही है। अगर आप फिल्म को ध्यान से देखें, तो मेरे मुख्य किरदार दूसरी तरफ के बारे में बात कर रहे हैं।
DSP जगपाल का किरदार कहता है कि रात की खबरें सुनते हो न, कितने हथियारों से लड़ रहे हैं हम?” ऐसा नहीं है कि हम इस बारे में बात नहीं कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक मंशा वाले लोग इसे नजरअंदाज करना चाहते हैं। मैं कोई बयान नहीं देना चाहता। मेरी फ़िल्म ही मेरा बयान है। मेरा काम खुद बोलता है। सब कुछ उसमें है।
कुछ लोगों का कहना है कि पंजाब में एनकाउंटर में 25,000 लोगों की मौत का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है।
मेरी फिल्म किस पर आधारित है… यह खालड़ा पर आधारित है। वे हमेशा 25,000 एनकाउंटर की बात करते थे। उनके भाषण भी इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इसलिए मुझे उनकी सच्चाई दिखानी थी। लेकिन साफ तौर पर बात रखने और एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, मैंने फिल्म में यह भी बताया है कि यह एक अनुमानित आंकड़ा है। जहां भी दिलजीत इसका जिक्र करते हैं, वे कहते हैं अनुमानित 25,000 एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याएं।
आलोचक यह भी कह रहे हैं कि आपने खालड़ा की राजनीति या खालिस्तान आंदोलन के लिए उनकी सक्रिय वकालत को नहीं दिखाया। ऐसा क्यों है?
हां, मैंने उनके बारे में विस्तार से पढ़ा है और मुझे उनकी राजनीति के बारे में भी पता है। लेकिन मैं किसी के व्यक्तित्व की पड़ताल करने के लिए फिल्म नहीं बना रहा था… मेरा फोकस उनके मानवाधिकारों से जुड़े काम पर था। क्या उनकी राजनीति उस काम को गलत साबित करती है? खालरा के खिलाफ कभी कोई केस दर्ज नहीं हुआ। यहां तक कि पुलिस की गवाही में भी पुलिस वाले कहते हैं कि खालड़ा इतने अच्छे इंसान थे, हम उन्हें क्यों अगवा करते? तो सवाल यह है कि अगर वे इतने अच्छे इंसान और कानून का पालन करने वाले नागरिक थे, तो पुलिस ने उन्हें क्यों अगवा किया और मार डाला?
आप तरनतारन में बड़े हुए- जो उग्रवाद और एनकाउंटर से सबसे बुरी तरह प्रभावित जगहों में से एक था। क्या आपने बड़े होते हुए ऐसी घटनाएं सुनीं या देखीं?
हां, यह सब हमारे आस-पास ही हो रहा था। बहुत कम लोग जानते हैं कि मैंने अपना बचपन पंजाब के मुख्य इलाके तरनतारन में सातवीं कक्षा तक बिताया। मेरे पड़ोस और बड़े परिवार में भी पुलिस एनकाउंटर और उग्रवाद ही बातचीत का मुख्य विषय होता था। मैंने अनगिनत कहानियां सुनी हैं। मैं उनके बारे में बात नहीं करना चाहता। लेकिन मुझे लगता है कि मेरी फिल्म मेरी तरफ से बात कर रही है। यह उन सभी चीजों को दिखाती है जो मैंने देखी थीं… मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं बचा है।
एक कहानीकार के तौर पर आपके लिए ‘रेड लाइन्स’ क्या हैं?
मैं एक बहुत जिम्मेदार नागरिक और फिल्म निर्माता हूं। मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी के साथ पाबंदियों से ज्यादा जिम्मेदारी आती है। लेकिन मैं चीजों को अपने नजरिए से देखने की कोशिश करता हूं। मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनता हूं। मैं कभी भी ऐसी कोई सीमा पार नहीं करता जो कानूनी रूप से गलत हो। लोगों को लगता है कि कोई भी आकर फिल्म बना सकता है, ऐसा नहीं होता है। हमारी सभी स्क्रिप्ट्स को पहले लॉ फर्म्स से मजूरी दिलवाई जाती है। मेरी स्क्रिप्ट को भी एक लीगल फर्म ने मंजूरी दी थी।
हमने पक्का किया कि हम जो भी कर रहे हैं, वह देश के कानूनों के हिसाब से हो। उसके बाद ही हमने इसे प्रोड्यूस किया… CBFC ही हम पर दबाव डाल रहा है। हमने हाई कोर्ट में केस किया, लेकिन मेरे प्रोड्यूसर्स को केस वापस लेने के लिए मजबूर किया गया। अगर आपको सच में कानूनी सिस्टम पर भरोसा है, तो आपने न्याय का रास्ता क्यों नहीं अपनाया? कोर्ट के आदेश का इंतज़ार क्यों नहीं किया? प्रोड्यूसर्स से केस वापस लेने के लिए क्यों कहा? यह बहुत दुखद स्थिति है। हम बहुत बड़ा देश हैं; एक फ़िल्म हमें बर्बाद नहीं कर सकती।
आपने केस क्यों वापस लिया? प्लीज विस्तार से बताएं।
शुरू में, CBFC ने 21 कट का सुझाव दिया। हम सहमत नहीं थे; हमने कहा कि वे सही नहीं हैं। फिर, हम (बॉम्बे) हाई कोर्ट गए। जुलाई 2023 तक, हम लगभग जीत की स्थिति में थे। बस एक सुनवाई बाकी थी। लेकिन, CBFC ने दबाव डाला… और हमसे कोर्ट के बाहर समझौता करने के लिए कहा गया। लेकिन बातचीत के दौरान, उन्होंने 21 के बजाय 127 कट करने को कहा। फिर, हमने इसे इंटरनेशनल लेवल पर रिलीज़ करने का फ़ैसला किया। हमने हाई कोर्ट से केस वापस ले लिया ताकि CBFC यह तर्क न दे सके कि मामला कोर्ट में चल रहा है।
