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फिल्म इंडस्ट्री में नहीं आना चाहते थे दिलीप कुमार, राज कपूर ने बनाया था दबाव, पहली बार मिले थे 1250 रुपये

जब दिलीप कुमार कॉलेज में आए तो उनकी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जिनकी वजह से उनकी जिंदगी ही बदल गई।

दिलीप कुमार और राज कपूर (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस आरकाइव)

लेजेंड दिलीप कुमार ने हिंदी सिनेमा में दौलत, शोहरत, इज्जत सब कमाया। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब दिलीप कुमार फिल्मी दुनिया में नहीं आना चाहते थे। उस वक्त तो उनका सपना एक फुटबॉल प्लेयर बनने का था। जी हां, दिलीप कुमार को फुटबॉल खेलना बहुत पसंद था। अपने स्कूल के सबसे होशियार बच्चों में से एक रहे दिलीप कुमार एक बेहतरीन फुटबॉल प्लेयर थे।

वह स्कूल फुटबॉल एसोसिएशन के सेक्रेटरी भी थे। लेकिन उनके पिता नहीं चाहते थे कि वह फुटबॉल खेलें। बल्कि दिलीप कुमार के पिता उन्हें शतरंज खेलते और जीतते देखना चाहते थे। जब दिलीप कुमार कॉलेज में आए तो उनकी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जिनकी वजह से उनकी जिंदगी ही बदल गई। दरअसल, दिलीप कुमार जिस कॉलेज में पढ़ते थे उसी कॉलेज में राज कपूर भी पढ़ते थे।

उस समय राज कपूर कोई फिल्म मेकर नहीं थे। लेकिन दिलीप कुमार और राज कपूर की दोस्ती जरूर गहरा गई थी। दोनों खालसा कॉलेज में पढ़ते थे। एक दिन राज कपूर ने दिलीप कुमार को कह दिया था कि तुम स्टार बन सकते हो। राज कपूर ने दिलीप कुमार को एक्टिंग ट्राय करने के लिए कहा। ऐसे में ये कहना गलत न होगा कि दिलीप कुमार को राज कपूर ने डिसकवर किया था।

आज हम लेजेंड एक्टर को दिलीप कुमार के नाम से जानते हैं, लेकिन जब वे राज कपूर से मिले थे तब तक दिलीप युसूफ खान थे। जी हां, फिल्मी दुनिया में आने के बाद ही युसूफ खान ने अपना नाम बदल कर दिलीप कुमार कर लिया था।

दिलीप कुमार ने जब बॉलीवुड में कदम रखा तो उन्होंने सबसे पहले बॉम्बे टॉकीज के लिए काम किया। देविका रानी ने उन्हें Bombay Talkies के लिए हायर किया था। तभी उन्हें दिलीप कुमार नाम मिला था।

दिलीप कुमार अच्छे अदाकार तो थे ही वह बहुत बढ़िया गाना भी गाते थे। साल 1957 में आई फिल्म मुसाफिर के लिए उन्होंने एक गाना गाया था- ‘लागी नहीं छूटे रामा।’ दिलीप कुमार की उर्दू बहुत शानदार थी, यही वजह थी कि उन्हें बॉम्बे टॉकीस में काम मिला। साल 1942 में दिलीप कुमार ने अपने करियर की शुरुआत बतौर स्क्रिप्ट राइटर की थी। उस वक्त दिलीप साहब को 1250 रुपए महनताना मिलता था।

 

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