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Movie Review दिल धड़कने दो: परिवार में उलझे किरदार

निर्देशक जोया अख्तर की फिल्म में जो एक बात सबसे काबिलेतारीफ होती है वह यह कि फिल्मांकन और आंखों को सुकून देने वाले दृश्यों की नजर से वह परिपूर्ण होती है।

Author June 5, 2015 5:33 PM
बॉलीवुड की ‘देसी गर्ल’ प्रियंका चोपड़ा से लेकर ‘पीके गर्ल’ अनुष्का शर्मा, रणवीर सिंह फरहान अख्तर, अनिल कपूर सभी इस फिल्म में एक अलग ही रूप में नज़र आ रहे हैं। जोया की यह फिल्म आपसी रिश्तों की उस सच्चाई को दर्शाती है जो असलियत में कुछ और है लेकिन ऊपर से बहुत खूबसूरत नजर आते हैं। (फोटो: बॉलीवुड हंगामा)

निर्देशक : जोया अख्तर
कलाकार : अनिल कपूर, रणवीर सिंह, प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख्तर, अनुष्का शर्मा, राहुल बोस, शेफाली शाह
इस फिल्म को देखते हुए दर्शक को शक हो सकता है कि वह किसी टीवी चैनल पर चलने वाले धारावाहिक की लगातार छह कड़ियां एक साथ देख रहा है। यहां वह सब कुछ है जो इन धारावाहिकों में होता है-एक धनी परिवार, उसके भीतर की दरारें, पति-पत्नी के बीच तनाव जिसमें पति एक बिगड़ैल शख्स की तरह होता है और अनैतिक संबंधों में ज्यादा दिलचस्पी रखता है। ऐसी संतानें जो अपनी राह पर नहीं चल पातीं और दोहरी जिंदगी में झूलती रहती हैं। और हां, इस परिवार में एक कुत्ता भी है जो कभी नहीं भौंकता।

यह कुत्ता इंसानों से ज्यादा समझदार लगता है। पूरी फिल्म एक कुत्ते की निगाह से कही गई कथा है जिसे सुनते हुए बार-बार यह अहसास होता है कि आदमी से ज्यादा समझदार तो जानवर होता है। फिल्म का परिवार पंजाबी है और पूरी फिल्म में पंजाबीपने पर काफी जोर दिया गया है।

फिल्म मेहरा परिवार की कहानी है जिसमें पति कमल मेहरा (अनिल कपूर) अपनी पत्नी नीलम (शेफाली शाह) से प्यार तो नहीं करता लेकिन उसके साथ जिंदगी के कई साल गुजार देता है। नीलम जानती है कि पति इधर-उधर मुंह मारता है लेकिन क्या करे, कोई और विकल्प जो नहीं है। और फिर एक दिन मेहरा एक क्रूज पर अपनी शादी की सालगिरह का आयोजन करते हैं और अपने दोस्तों को इस मौके पर बुलाते हैं।

मेहरा परिवार का लड़का कबीर (रणबीर) अपने पैतृक व्यवसाय में ज्यादा रुचि नहीं रखता। लेकिन पिता चाहते हैं कि वह बड़ा बिजनेसमैन बने और उसकी शादी एक बड़े बिजनेसमैन की उस बेटी से हो जिसकी मंगनी टूट चुकी है। इससे बिजनेस में फायदा होगा।

आखिर धनी परिवारों में शादी भी तो एक व्यापार है। मेहरा परिवार की बेटी आयशा (प्रियंका चोपड़ा) न तो अपनी शादी से खुश है और न अपने पति मानव (राहुल बोस) से। क्रूज में मेहरा परिवार के अलावा उनके दूसरे दोस्त भी शामिल होते हैं और इसी दौरान कबीर का एक डांसर फरहा (अनुष्का) पर दिल आ जाता है जो मुसलिम है और आजाद खयाल की भी। आगे की कहानी यही है कि मेहरा परिवार का भविष्य इस क्रूज यात्रा के दौरान डूब जाएगा या वे एक-दूसरे की भावनाओं को पहचानेंगे?

 

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बेशक एक पारिवारिक ड्रामा के सारे तत्त्व इसमें हैं। फिर भी यह फिल्म एक टीवी धारावाहिक की तरह एक ऐसी जगह जाकर अटक जाती है जहां निर्देशक को आगे की राह नहीं सूझती है। शायद इसलिए कि निर्देशक को अपने परिवार की भी चिंता थी। भाई फरहान अख्तर को एक भूमिका देना अगर जरूरी ही था तो उन्हें फिल्म का हीरो बना देना चाहिए था। लेकिन निर्देशक जोया को शायद लगा होगा कि फिल्म फरहान के कंधे पर चल नहीं पाएगी।

उनकी आशंका बेबुनियाद नहीं थीं। खैर, अपने भाई के लिए उन्होंने सनी का किरदार गढ़ा जो आयशा का पूर्व प्रेमी है और अचानक ही क्रूज पर आता है। और इस चक्कर में प्रियंका से लेकर अनुष्का तक के किरदार इतने सपाट हो गए हैं कि फिल्म का ड्रामा ही खत्म हो गया है। अनुष्का तो फिल्म के आखिरी हिस्से में गायब ही हो जाती हैं। फिल्म का प्रतीकात्मक अंत होता है और दर्शक को लगता है कि अरे ये क्या हो गया?

क्रूज से बोट पर आकर पूरा मेहरा परिवार हैप्पी फैमिली का फोटो तो खिंचवा लेता है पर कहानी का ऐसा अंत दर्शक को ठगा हुआ महसूस कराता है। लगता है कि फिल्म एक ऐसे फोटो अलबम को तैयार करने के लिए बनाई गई थी जिसमें पिता, पत्नी, बेटा, बेटी के साथ कुत्ता एक साथ समुद्र के बीचोंबीच मुस्कुरा रहे हों।

इतना जरूर है कि ‘दिल धड़कने दो’ भव्यता के साथ बनाई गई फिल्म है। आखिर क्रूज पर फिल्म की शूटिंग का अपना आकर्षण है। इसमें समुद्र के नजारे हैं। हालांकि जितने होने चाहिए उससे कम हैं। फिल्म में नारीवादी सुर भी उठाने की कोशिश की गई है। कुछ जगहों पर तो लगता है कि यह नारीवाद पर एक आंसू भरा आलेख है।

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