आज की फिल्मों में VFX सिर्फ सपोर्टिंग टूल नहीं, बल्कि कहानी कहने का अहम हिस्सा बन चुका है। philmCGI के Co-founder & MD अर्पण गगलानी ने स्क्रीन से बात करते हुए बताया कि उनका काम ऐसी चीज़ें बनाना है जो सेट पर मौजूद ही नहीं होतीं।
अर्पण गगलानी ने कहा: ”हम ऐसी दुनिया बनाते हैं जो असल में होती ही नहीं चाहे ‘अवतार’ जैसा काल्पनिक प्लैनेट हो या ‘जुबली’ जैसा पीरियड सेटअप। आज VFX स्टोरीटेलिंग का बेसिक हिस्सा बन चुका है, सिर्फ फिल्मों में ही नहीं, बल्कि टीवी और विज्ञापनों में भी।”
बजट सबसे बड़ा चैलेंज
आनंद भनुशाली (Co-founder & MD, philmCGI) ने इंडस्ट्री की सबसे बड़ी समस्या पर खुलकर बात की। आनंद भनुशाली ने कहा: ”हर प्रोड्यूसर की पहली लाइन यही होती है- बजट कम है। लेकिन फर्क तब पड़ता है जब VFX टीम शुरुआत से जुड़ी हो। तब हम पहले से प्लान कर लेते हैं कि क्या रियल बनाना है और क्या VFX से करना है।”
वो आगे बताते हैं कि कई बार पूरा सेट बनाने के बजाय उसका कुछ हिस्सा ही बनाया जाता है और बाकी डिजिटल तरीके से पूरा किया जाता है।
VFX टीम को देर से जोड़ना पड़ता भारी
आनंद भनुशाली ने यह भी कहा: ”अक्सर हमें शूट के बाद जोड़ा जाता है, जिससे कई बार गलत शूटिंग की वजह से समय और पैसा दोनों बर्बाद होते हैं। अगर VFX सुपरवाइजर सेट पर हो, तो वो शूटिंग के दौरान ही गाइड कर सकता है।”
स्क्रिप्ट स्टेज से शुरू होता है असली काम
अर्पण गगलानी के मुताबिक: ”सब कुछ स्क्रिप्ट पढ़ने से शुरू होता है। हम कई बार बैठकर डिस्कस करते हैं और अगर कुछ बहुत महंगा लग रहा हो, तो उसे स्क्रिप्ट में ही बदल दिया जाता है ताकि बजट में फिट हो सके।”
जिगरा में बना फेक सिंगापुर
अर्पण गगलानी ने बताया: आलिया भट्ट की फिल्म ‘जिगरा’ में हमें सिंगापुर जैसा सेटअप बनाना था। विदेश में शूट करना बहुत महंगा पड़ता, इसलिए हमने मुंबई के कांदिवली में लोकेशन ढूंढकर वहीं पूरा सेट तैयार किया और VFX से उसे सिंगापुर जैसा बनाया।”
Jubilee में भी बदला प्लान
गगलानी ने बताया कि पहले श्रीलंका में शूट करने का प्लान था, लेकिन जब लोकेशन काम की नहीं निकली, तो टीम ने मुंबई के बोरीवली में बड़ा सेट बनाकर काम पूरा किया।
सेट पर VFX सुपरवाइजर क्या करता है?
अर्पण गगलानी ने साफ किया: ”अच्छे VFX के लिए सेट पर पहले दिन से मौजूद रहना जरूरी है। खासकर एक्शन सीन्स में सेफ्टी सबसे अहम होती है।”
उन्होंने धुरंधर’ का उदाहरण देते हुए बताया: ”जो ब्लास्ट आप ट्रेलर में देखते हैं, वो असल में छोटे और कंट्रोल्ड होते हैं। असली इफेक्ट हम बाद में VFX से बढ़ाते हैं।”
सीन्स लेयर्स में बनते हैं
अर्पण गगलानी ने समझाया: ”अगर किसी सीन में आदमी ब्लास्ट से उड़ता दिखता है, तो उसे असल में ब्लास्ट से नहीं उड़ाया जाता। उसे हार्नेस से सुरक्षित तरीके से शूट किया जाता है और बाद में VFX से जोड़ा जाता है।”
टाइमलाइन का दबाव: आखिरी रात तक काम
आनंद भनुशाली ने धुरंधर’ के प्रोजेक्ट पर कहा: ”हमारे पास सिर्फ 3 महीने थे। पार्ट 1 के लिए 1000 से ज्यादा शॉट्स बनाए। फिल्म गुरुवार को रिलीज हुई और हमने आखिरी शॉट बुधवार रात को डिलीवर किया।”
रियल एलिमेंट्स vs ग्रीन स्क्रीन
अर्पण गगलानी का मानना है: ”अच्छे फिल्ममेकर हमेशा रियल एलिमेंट्स के साथ काम करना पसंद करते हैं। मैं खुद कोशिश करता हूं कि 60–70% शूटिंग रियल हो और बाकी VFX से एनहांस किया जाए। ग्रीन स्क्रीन सिर्फ तब इस्तेमाल होती है जब कोई और ऑप्शन नहीं होता।”
हॉलीवुड जैसा स्केल क्यों नहीं?
अर्पण गगलानी ने बताया: ”हमारे पास टैलेंट और टेक्नोलॉजी दोनों हैं, लेकिन फर्क पड़ता है प्रोसेस से। हॉलीवुड में प्री-प्रोडक्शन और प्लानिंग बहुत मजबूत होती है। अगर हम भी वैसा डिसिप्लिन फॉलो करें, तो वही स्केल यहां भी हासिल कर सकते हैं।”
