रणवीर सिंह की ‘धुरंधर: द रिवेंज’ रिलीज हुई तो कई लोगों को रहमान डकैत की याद आई। धुरंधर में रहमान डकैत के रोल में अक्षय खन्ना ने लोगों का खूब प्यार हासिल किया था। दर्शकों को उम्मीद थी कि शायद कोई थ्रोबैक उन्हें रहमान डकैत का मिलेगा।

वहीं धुरंधर 2 के बाद उजैर बलोच को लेकर भी लोगों के मन में दया जागी। सोशल मीडिया पर लोग उसके सपोर्ट में लिख रहे हैं-
‘उसके साथ गलत हुआ…’
‘उजैर बलोच के लिए बुरा लग रहा है।’
‘भरोसे की बात आती है तो मैं भी उजैर बलोच बन जाता हूं…’ वगैरह वगैरह।

ये सब तो विलेन हैं… फिर ऐसा क्यों है कि पब्लिक इनसे अटैच है और इनके लिए दया दिखा रही है? ह्यूमन साइक्लॉजी से इसका गहरा कनेक्शन है।

साइक्लॉजिस्ट ने क्या कहा?

इसे समझने के लिए हमने काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट और चूज़ योर थेरेपिस्टके फाउंडर दीपक कुमार से बात की। उन्होंने Leon Festinger की Cognitive Dissonance Theory का उदाहरण दिया।

इसके मुताबिक, जब कोई अपराधी हमें रिलेटेबल लगता है, तो हम अपने नैतिक डिस्कम्फर्ट को कम करने के लिए उसके लिए सिम्पैथी बना लेते हैं।

उन्होंने ये भी कहा, ‘डरा हुआ इंसान फैसले नहीं लेता, बस बचने की कोशिश करता है। और उसी कोशिश में वो किसी और के कंट्रोल में आ जाता है। क्योंकि उस पल उसे सच नहीं, सुरक्षा चाहिए होती है- और जो सुरक्षा का वादा करता है, वही उसकी सोच को दिशा देने लगता है।’

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विलेन नहीं, इंसान की तरह पेश किया गया

आदित्य धर ने जब धुरंधर बनाई, तो उन्होंने किरदारों को सिर्फ विलेन के तौर पर नहीं बल्कि इंसान के तौर पर दिखाया। चाहे वो रहमान डकैत हो या उजैर बलोच।

रहमान भले ही बेरहम किलर हो, मगर उसकी कहानी हमें पता है। उसे परिस्थितियों का शिकार दिखाया गया है- उसके बेटे की मौत, उसका परिवार और पत्नी के लिए प्यार और सम्मान… ये सब देखकर हमारी एम्पैथी एक्टिवेट हो जाती है।

हमने हमेशा सुना है कि कोई भी खलनायक जन्म से खलनायक नहीं होता, बल्कि परिस्थितियां उसे वैसा बना देती हैं। जब फिल्मों में किरदार ग्रे शेड्स में दिखाया जाता है, तो वो ज्यादा अटैच करता है क्योंकि असल जिंदगी भी ब्लैक एंड वाइट नहीं होती।

ट्रॉमा और इमोशनल कनेक्शन

साइक्लॉजी कहती है कि दुख बांटने से इमोशनल कनेक्शन बनता है। विलेन के ट्रॉमा, धोखे और अन्याय से दर्शक खुद को रिलेट करने लगते हैं और उनके दर्द को अपने अंदर देखने लगते हैं।

फिल्म में जब हमज़ा की बैकस्टोरी दिखाई जाती है, तो हम उससे भी अटैच हो जाते हैं। उसने एक पूरे परिवार को AK-47 से खत्म कर दिया, उसे उम्रकैद होती है फिर भी लोग उसके लिए दुखी होते हैं।

क्यों? क्योंकि उसने ये सब अपनी बहन को बचाने के लिए किया था। जहां इमोशन जुड़ते हैं, वहां कनेक्शन बनता है।

जब सिस्टम फेल हो जाए

जसकीरत का अन्याय भी हमें न्याय जैसा लगता है। क्योंकि जहां सिस्टम उसकी बहन को बचाने में फेल हो जाता है, वहां उसका बदला लेना जस्टिफाइड लगता है। इसलिए जब कानून कमजोर लगे, अपराधी ही हीरो दिखने लगता है।

पिक्चराइजेशन का खेल

फिल्मों में पिक्चराइजेशन भी बहुत बड़ा रोल प्ले करता है। सोशल मीडिया पर आपने ऐसे कई वीडियो देखे होंगे, जहां सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक बदलने से पूरा सीन बदल जाता है।

जैसे- अगर किसी लड़के को चुपके से लड़की के घर में घुसते हुए रोमांटिक म्यूजिक के साथ दिखाया जाए, तो वो हीरो लगेगा। लेकिन वही सीन हॉरर म्यूजिक के साथ दिखे, तो डरावना बन जाएगा।

बैकग्राउंड म्यूजिक, स्लो मोशन शॉट्स और डायलॉग- ये सब हमारी परसेप्शन को कंट्रोल करते हैं।

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मॉरल कॉम्प्लेक्सिटी और दर्शक

आज का दर्शक लेयर्ड स्टोरी पसंद करता है। अब कहानी सिर्फ अच्छाई बनाम बुराई नहीं रह गई है। हर इंसान के अंदर एक डार्क साइड होती है, जिसे महान साइकोलॉजिस्ट Carl Jung ने ‘शैडो’ कहा है। यही वजह है कि हम ग्रे किरदारों से ज्यादा कनेक्ट करते हैं।

डायरेक्टर का विज़न

डायरेक्टर का विज़न तय करता है कि कहानी किस नजरिए से दिखाई जाएगी। अगर विलेन की बैकस्टोरी को ज्यादा स्पेस दिया जाए, तो उससे सिम्पैथी बढ़ती है।

इसी वजह से ‘बाज़ीगर’ और ‘डर’ जैसी फिल्मों में हम शाहरुख ख़ान के किरदारों के लिए भी दुखी होते हैं।

‘धुरंधर 2’ हमें ये दिखाती है कि हर अपराध के पीछे एक इंसानी कहानी होती है- चाइल्डहुड ट्रॉमा होता है, परिस्थितियां होती हैं। शायद इसी वजह से हम उन खलनायकों के लिए भी दया महसूस करने लगते हैं, जिनसे हमें नफरत करनी चाहिए।

डिसक्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल, मनोवैज्ञानिक या कानूनी सलाह नहीं है। कृपया संवेदनशील मामलों में विशेषज्ञ से सलाह लें। Jansatta.com किसी भी अपराध का समर्थन नहीं करता।