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‘धड़क’ फिल्म समीक्षा: एक दुखांत प्रेम कहानी

दूसरी उत्सुकता मराठी फिल्म ‘सैराट’ (2016) के निर्देशक नागराज मंजुले को लेकर है, जिनकी इस फिल्म पर ‘धड़क’ बनी है। ‘सैराट’ दलित विमर्श को सिमेनाई दुनिया में लानेवाली फिल्म थी। क्या ‘धड़क’ भी वैसी ही है? इसका जवाब है ‘नहीं’। इसमें जाति को लेकर सामाजिक पूर्वग्रह का प्रसंग जरूर आता है लेकिन वैसा नहीं, जैसा ‘सैराट’ में है।

निर्देशक- शशांक खेतान, कलाकार- जाह्नवी कपूर, ईशान खट्टर, आशुतोष राणा।

‘धड़क’ को लेकर फिल्म प्रेमियों को दो तरह की उत्सुकताएं होंगी। एक, श्रीदेवी की बड़ी बेटी जाह्नवी कपूर इसमें कैसी लगी हैं और वे अपनी मां की विरासत को आगे बढ़ाने वाली हैं या नहीं। ‘धड़क’ की जाह्नवी में भोलापन है। उनमें सहज प्रतिभा है और उन्होंने शुरू से अंत तक अपने किरदार को शिद्दत से जिया है। हालांकि श्रीदेवी जैसी चपलता कम-से-कम इस फिल्म में तो नहीं दिखी है। दूसरी उत्सुकता मराठी फिल्म ‘सैराट’ (2016) के निर्देशक नागराज मंजुले को लेकर है, जिनकी इस फिल्म पर ‘धड़क’ बनी है। ‘सैराट’ दलित विमर्श को सिमेनाई दुनिया में लानेवाली फिल्म थी। क्या ‘धड़क’ भी वैसी ही है? इसका जवाब है ‘नहीं’। इसमें जाति को लेकर सामाजिक पूर्वग्रह का प्रसंग जरूर आता है लेकिन वैसा नहीं, जैसा ‘सैराट’ में है। फिल्म को ‘ऑनर किलिंग’ यानी जातीय सम्मान के लिए हत्या वाले मसले में तब्दील कर दिया है। यानी ‘सैराट’ में जो बहस है, उसे महीन बनाकर पेश किया गया है।

‘धड़क’ मिजाज और बनावट के स्तर पर एक प्रेम कहानी है।  ‘धड़क’ के निर्देशक शशांक खेतान ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ (2014) और ‘बद्र्रीनाथ की दुल्हनिया’ (2017) जैसी शादी-ब्याह मार्का फिल्म पहले भी निर्देशित कर चुके हैं। फिल्म की कहानी राजस्थान के उदयपुर से शुरू होती है, जहां मधु (ईशान खट्टर) अपने पिता के साथ होटल चलाता है। मधु के सपने में पार्थवी (जाह्नवी कपूर) आती है। घूंघट में और लाल लिपस्टिक लगाए। एक भोजन प्रतियोगिता में मधु पार्थवी से मिलता है, जो अपने सामंती पृष्ठभूमि और सोच वाले पिता (आशुतोष राणा) के साथ वहां आती है। मधु घेवर और मिर्ची जैसे खाद्य पदार्थ जम के खाने की प्रतियोगिता में विजयी होता है तो पार्थवी के हाथों उसे इनाम मिलता है। यहीं से दोनों में प्रेम शुरू होता है। लेकिन जब अगला चरण चुंबन पर पहुंचने को होता है तो हंगामा हो जाता है और दोनों की जान पर बन आती है। लड़की का सामंती परिवार मधु के खून का प्यासा हो जाता है। फिल्म का अंत लगभग वैसा ही है, जैसा ‘सैराट’ में है। हां, थोड़ा- सा बदलाव जरूर है।

फिल्म उदयपुर की झीलों की प्राकृतिक सुंदरता तो दिखाती ही है साथ ही कोलकाता की सैर भी कराती है और बंगालियों की जीवनशैली को भी सामने लाती है। निर्देशक शशांक खेतान ने अपनी विनोदप्रियता दिखाने के लिए कुछ प्रयोग भी किए हैं। जैसे प्रेम निवेदन के संदेशवाहक और संदेशवाहिका को स्कूली बच्चों का ड्रेस पहनाया है। ईशान खट्टर भी दर्शकों का मन मोहते हैं। हालांकि फिल्म न तो सामंतवाद और न ही जातिवाद को लेकर कोई बहस जगाती है। हां, फिल्म का एक गाना अवश्य मन को मोहनेवाला है, ‘केसरिया म्हारो बालमा पधारा म्हारी कंट्री मा रे…’। इसे फिल्माया भी बेहतरीन तरीके से गया है। ‘धड़क’ महानगरीय युवा वर्ग के बीच लोकप्रिय होगी। जाह्नवी के प्रशंसकों का नया वर्ग भी तैयार होगा, लेकिन ‘सैराट’ जैसा बौद्धिक आकर्षण इसमें नहीं है।

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