सिनेमाघर मेरे लिए मंदिर की तरह है : राजमौलि

भले ही मैं भगवान को नहीं मानता लेकिन थियेटर को मंदिर मानता हूं….

एसएस राजमौलि।

आरती सक्सेना

भले ही मैं भगवान को नहीं मानता लेकिन थियेटर को मंदिर मानता हूं…. मैं दिल से चाहता हूं कि जितनी भी फिल्में रिलीज हो रही हैं, वे सभी हिट हों ताकि फिल्मोद्योग की आर्थिक स्थिति सुधरे। ज्यादा से ज्यादा दर्शक सिनेमाघरों में आएं।’ यह कहना है उस निर्देशक का जिसने अपनी कल्पना से जहां ‘बाहुबली’ जैसी भव्य फिल्म बनाई, वहीं एक मक्खी को हीरो बनाकर बदले की कहानी ‘मक्खी’ रच डाली। कन्नड़ मूल के राजमौलि ने तेलुगू सिनेमा कारोबार को नई ऊंचाई दी है। उनकी तेलुगू में बन रही ताजा फिल्म है ‘आरआरआर’, जो हिंदी में ‘राइज, रोअर ,रिवोल्ट’ नाम से 7 जनवरी को रिलीज होगी। राजमौलि ने यहां फिल्में बनाने को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

क्या कभी राजमौलि ने अपनी फिल्म को ओटीटी पर रिलीज करने के बारे में भी सोचा,‘नहीं। छोटे परदे या मोबाइल पर फिल्में देखने में वह मजा नहीं आता, जो सिनेमाघर में आता है। मुझे बचपन से ही फिल्में देखने का शौक रहा है। हमें दूसरे शहर जाना पड़ता था फिल्में देखने। महीने में एक फिल्म ही देख पाते थे। सिनेमाघर में अंधेरा होते ही मैं रोमांचित हो जाता था। मैं भगवान में भरोसा नहीं करता, मगर थियेटर मेरे लिए किसी मंदिर की तरह है।’ क्या उन्हें लगता है कि उनकी फिल्म ‘बाहुबली’ भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव लेकर आई है?

राजमौलि कहते हैं,‘अगर वाकई कोई बदलाव हुआ और सही दिशा में हुआ है, तो मैं इसे अपनी खुशनसीबी कहूंगा। खूब पैसा कमाया फिल्म ने तो यह कोई बदलाव नहीं है।’ ‘बाहुबली’ की सफलता को राजमौलि अपनी मेहनत मानते हैं या अपना भाग्य? सवाल पर वह तुरंत कह उठते हैं,‘मैं भाग्य में भरोसा नहीं करता। मैं दर्शकों की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करता हूं। ‘बाहुबली’ के दौरान मैं सब कुछ भूलकर फिल्म बनाने में जुटा रहा था। मेरी इच्छा है कि कभी मुझे महाभारत पर फिल्म बनाने का मौका मिले। उसमें वह सब कुछ है, जो एक कहानीकार को अपनी कहानी में चाहिए होता है।

राजमौलि की नई फिल्म ‘आरआरआर’ में तेलुगु फिल्म स्टार जूनियर एनटीआर और रामचरन के साथ पहली बार आलिया भट्ट और अजय देवगन काम करने जा रहे हैं। राजमौलि की टीम और पीवीआर सिनेमा के प्रबंध निदेशक अजय बिजली फिल्म के प्रदर्शन की रणनीति तैयार कर रहे हैं। राजमौलि से मुलाकात हुई तो इस गठबंधन के बारे में उन्होंने कहा कि वे जब किसी से दोस्ती करते हैं, तो उसे निभाते भी हैं। लिहाजा यह गठबंधन आगे भी जारी रहेगा। बीते दो सालों से फिल्मोद्योग को मुश्किलों से गुजरना पड़ा है।

ऐसे में हमारी कोशिश फिलमोद्योग के हित में काम करना है। कोरोना काल राजमौलि ने कैसे बिताया, इस सवाल पर मशहूर निर्देशक ने कहा, ‘सिनेमा के रूपहले परदे के पीछे जैसा अंधेरा होता है, कुछ वैसा ही अंधेरा हमारे जीवन में आ गया था। मेरे साथ कुछ बुरा तो नहीं हुआ मगर इस दौरान आगे क्या करना है इसे लेकर काफी सोच विचार किया।’

‘बाहुबली’ जैसी फिल्म बनाने के बाद ‘आरआरआर’ जैसी फिल्म बनाने के पीछे सोच क्या थी। राजमौलि कहते हैं, ‘यह दो योद्धाओं अल्लूरी सीताराम राजूचरण और कोमाराम भीमाराव से प्रभावित काल्पनिक कहानी है, जो युद्ध के बाद अपने घर जाते हैं और तीन-चार साल बाद लौटते हैं। फिर साथ मिलकर अंग्रेजों और हैदराबाद के निजाम से लड़ते हैं।

मैंने इसे अपनी कल्पना से तैयार किया है।’ अजय देवगन और आलिया भट्ट जैसे हिंदी फिल्मों के कलाकारों को फिल्म में लेने की वजह के बारे में राजमौलि कहते हैं कि वे भाषा या स्थान को ध्यान में रखकर फिल्में नहीं बनाते हैं। मैं चाहता हूं पूरा भारत मेरी फिल्म देखे। कलाकारों को कहानी और किरदार को ध्यान में रखकर चुनता हूं। अजय को मैं ‘सन आफ सरदार’ फिल्म से जानता हूं जो दक्षिण भारतीय फिल्म की हिंदी रीमेक थी। अजय, आलिया किरदार में फिट थे, इसलिए उन्हें चुना। उन्हें कहानी पसंद थी, इसलिए वे तैयार हो गए। दोनों ने फिल्म में मेहनत से काम किया।

लेकिन क्या हिंदी फिल्म कलाकारों के साथ काम करना एक अलग अनुभव है, अलग तरह के अनुशासन की मांग करता है? राजमौलि ने इस पर दो टूक कहा, ‘मेरी फिल्म मेरा असली हीरो होती है। मैं अपने तरीके से फिल्म बनाता हूं। मैं सभी कलाकारों से अपनी पटकथा तैयार करने के बाद मिलता हूं और उन्हें बता देता हूं कि मुझे क्या चाहिए। कलाकार भी मुझे सम्मान देते हैं क्योंकि मैंने ‘बाहुबली’ जैसी सफल फिल्म बनाई।’

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