हॉरर जॉनर की फिल्में देखना बहुत से लोगों को काफी पसंद है। ऐसे में आजकल मेकर्स भी उन्हीं की पसंद को ध्यान में रखते हुए मूवीज बनाते हैं। हालांकि, अगर बात हॉरर की हो रही हो, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि अब भूतिया फिल्मों को दिखाने का तरीका काफी बदल गया है। पहले की हॉरर फिल्में ऐसी होती थीं, जिन्हें लोग अकेले थिएटर्स में देख नहीं सकते थे। उनमें डर की ऐसी कहानी दिखाई जाती थी, जिसपर लोग यकीन करते थे।

फिर समय बदलने के साथ-साथ इसमें बदलाव हो गया। अब मेकर्स डर के साथ कॉमेडी का तड़का लगा देते हैं। वहीं, कई बार तो ऐसे सितारे भूतिया रूप में नजर आते हैं, जिन्हें देखकर डर कम और हंसी ज्यादा आती है। ऐसे में अगर आप हॉरर फिल्में देखना पसंद करते हैं, तो चलिए आज हम आपको अपने सिनेमा डिकोड कॉलम में फिल्म ‘वीराना’ के बारे में बताते हैं।

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क्या थी फिल्म वीराना की कहानी?

जिन लोगों को हॉरर फिल्में पसंद है, उन्होंने ‘वीराना’ जरूर देखी होगी। इस फिल्म की कहानी ‘नाकिता’ नाम की एक चुड़ैल के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे ठाकुर महेंद्र प्रताप और उनके छोटे भाई गांव वालों के साथ मिलकर मार देते हैं, लेकिन सालों बाद वह फिर से वापस आती है और महेंद्र प्रताप की बेटी जैस्मीन के शरीर पर कब्जा कर लेती है।

आत्मा के प्रभाव में जैस्मीन एक खूनी पिशाच बन जाती है, जो वीरान रास्तों पर पुरुषों को लुभाती है और मार डालती है। फिल्म में तंत्र-मंत्र, काला जादू और अंत में अच्छाई की बुराई पर जीत दिखाई गई है, जिसमें तांत्रिक बाबा का किरदार भी महत्वपूर्ण है। फिल्म ‘वीराना’ का निर्देशन रामसे ब्रदर्स के नाम से फेमस श्याम रामसे और तुलसी रामसे ने किया था। रामसे ब्रदर्स को हॉरर शैली को मेेन लीड के सिनेमा में लाने का श्रेय जाता है। क्योंकि जब भी डरावनी फिल्मों की बात हो, तो इनका नाम जरूर आता है।

कहानी के साथ लोकेशन और सीन का रखा जाता था ध्यान

आजकल हॉरर फिल्मों को बनाने के लिए अलग-अलग जगह पर शूट किया जाता था, लेकिन पहले यह सब इतना ज्यादा नहीं था। 80s की हॉरर फिल्मों में हवेली खुद एक कैरेक्टर होती थी। ऐसे ही वीराना की भी एक हवेली थी, जिसमें कई सीन अलग-अलग तरीके से शूट किए गए। उस समय हॉरर फिल्मों में लंबे अंधेरे गलियारे, चरमराते दरवाजे,  जाले और धुंध, लाल रोशनी और परछाइयां- सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते थे, जो फिल्म देखने वाले समय दर्शकों के बीच डर को बढ़ा देता था।

सिर्फ इतना ही नहीं, 70s-80s के आसपास रोमांटिक फिल्मों में ही बोल्डनेस देखने को मिलती थी, लेकिन रामसे ब्रदर्स ने उस समय हॉरर फिल्मों में डर के साथ बोल्डनेस दिखाकर एक अलग ही ट्रेंड शुरू कर दिया था। फिल्म में चुड़ैल का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री जैस्मिन धुना अचानक रातों-रात सनसनी बन गईं। ऐसे में कई बार यह सवाल भी खड़ा हुआ कि डराने के लिए ग्लैमर क्यों?

तो बता दें कि 80s में VHS (वीडियो होम सिस्टम) मार्केट बढ़ रहा था। 70 के दशक के अंत से 1990 के दशक के अंत तक घरेलू वीडियो टेप का प्रमुख बाजार था, जहां मैग्नेटिक टेप के जरिये फिल्में और टीवी शो देखे जाते थे। यह 1980/90 के दशक में मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय माध्यम था। ऐसे में छोटे शहरों में बोल्ड कंटेंट बिकता था। फिर कई बार हॉरर और एरोटिक तत्व का मतलब टिकट खिड़की पर गारंटी मानी जाती थी।

मनोवैज्ञानिक और सामाजिक एंगल

अब बात करते हैं फिल्म ‘वीराना’ के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक एंगल की। अगर ध्यान से देखें तो ‘वीराना’ सिर्फ भूत की कहानी नहीं थी। इसमें समाज की सोच भी छुपी हुई थी। फिल्म में जिस औरत को डायन कहा गया, वह अलग थी। खूबसूरत थी, आत्मविश्वासी थी और मर्दों पर उसका असर पड़ता था। गांव वाले उसे समझ नहीं पाते, इसलिए उसे खतरनाक मान कर मार दिया था। यानी जो औरत समाज की तय की हुई सीमा से बाहर दिखती है, उसे ‘डायन’ बना दिया जाता है।

सीधी भाषा में कहें तो ‘वीराना’ ये बताती है कि समाज अक्सर उस औरत से डरता है जो अलग हो, मजबूत हो या अपने हिसाब से जीना चाहती हो। उस डर को ही फिल्म ने भूत और चुड़ैल के रूप में दिखाया। डरावनी कहानी के पीछे छुपा असली डर समाज की सोच का है। उस समय मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसे बी-ग्रेड फिल्म का टैग दिया, लेकिन 60 लाख के बजट में बनी यह फिल्म हिट रही। सिंगल स्क्रीन थिएटरों में यह फिल्म खूब चली। इसकी वजह थी कम टिकट कीमत, बोल्ड सीन की चर्चा और माउथ पब्लिसिटी। ऐसे में इसने कम बजट में अच्छा मुनाफा कमाया।

अब अगर ‘वीराना’ को आज के नजरिए से देखा जाए, तो इसमें लोगों को एक्टिंग ओवरड्रामैटिक लग सकती है। इसके इफेक्ट्स साधारण लगेंगे और कहानी प्रेडिक्टेबल लग सकती हैं, लेकिन उस समय यह मूवी अपने समय से आगे थी-  खासकर ग्लैमर और हॉरर के मिश्रण में।

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