हॉरर फिल्मों का जिक्र हो और उसमें रामसे ब्रदर्स का नाम आए ऐसा कैसे हो सकता है। इन्होंने ‘पुरानी हवेली’, ‘दरवाजा’, ‘तहखाना’ और ‘वीराना’ जैसी कई डरावनी फिल्मों का निर्माण किया था, जिसे उस समय लोगों ने काफी पसंद किया था। इसी में से एक मूवी ‘पुराना मंदिर’ भी थी, जिसे मेकर्स ने बेहद ही कम बजट में बनाया और जब यह रिलीज हुई तो इसने करोड़ों में कमाई की थी। आज हम अपने सिनेमा डिकोड कॉलम में इसी के बारे में आपको बताने वाले हैं।

भारतीय सिनेमा का इतिहास सिर्फ बड़े सितारों और भव्य सेटों की कहानियों से नहीं बना है, बल्कि इसमें उन प्रयोगों का भी बड़ा हाथ है, जिन्होंने बेहद सीमित बजट में दर्शकों की नब्ज पकड़कर करोड़ों का कारोबार किया। 1984 में रिलीज हुई फिल्म ‘पुराना मंदिर’ इसी कैटेगरी की सबसे बड़ी मिसाल है। रामसे ब्रदर्स में से श्याम और तुलसी ने मिलकर इस मूवी का निर्माण किया। इस फिल्म ने न सिर्फ अच्छी कमाई की, बल्कि बॉलीवुड में हॉरर फिल्मों को ‘बी-ग्रेड’ के टैग से बाहर भी निकाला।

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भारतीय सिनेमा का सबसे डरावना विलेन

‘पुराना मंदिर’ की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय इसके मुख्य विलेन ‘सामरी’ को जाता है। 6 फीट 7 इंच लंबे अनिरुद्ध अग्रवाल ने जब पर्दे पर अपनी लाल आंखों और भारी आवाज के साथ एंट्री ली, तो सिनेमाघरों में सन्नाटा पसर गया।

उस जमाने में भारत में प्रोस्थेटिक मेकअप की तकनीक बहुत शुरुआती दौर में थी, लेकिन रामसे ब्रदर्स ने अपनी सूझबूझ से सामरी का चेहरा इतना खौफनाक बनाया कि वह बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए एक बुरा सपना बन गया। सामरी ने फिल्म को मैथोलॉजिकल और सुपरनैचुरल गहराई दी।

रामसे ब्रदर्स की अनोखी कार्यशैली

रामसे ब्रदर्स की फिल्मों का अपना एक अलग व्याकरण था, जिसे ‘पुराना मंदिर’ ने पूरी तरह परिभाषित किया। उनके काम करने का तरीका आज के फिल्म निर्माताओं के लिए भी एक मिसाल है। सातों भाई फिल्म निर्माण के अलग-अलग विभागों निर्देशन, एडिटिंग, सिनेमेटोग्राफी, साउंड को संभालते थे, जिससे निर्माण लागत कम रहती थी।

लाइटिंग और कैमरा एंगल

उन्होंने लो-एंगल शॉट्स, नीली-लाल लाइट का कंट्रास्ट और फॉग का इस्तेमाल कर वो माहौल बनाया जो दर्शकों को डराने के लिए काफी था। इसके अलावा उन्होंने पुरानी हवेलियों को ही अपना सेट बना लिया था। ‘पुराना मंदिर’ की शूटिंग के दौरान वे अक्सर वहीं ठहरते थे ताकि समय और पैसा दोनों बच सकें।

संगीत और माहौल का मेल

अक्सर हॉरर फिल्मों में संगीत को नजरअंदाज किया जाता है, लेकिन ‘पुराना मंदिर’ में अजित सिंह का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर कमाल की थी। फिल्म के गानों में रोमांस तो था ही, लेकिन बैकग्राउंड में बजने वाली वो डरावनी धुनें फिल्म की जान थीं। ‘चीख’ और ‘खामोशी’ के बीच का जो संतुलन इस फिल्म में दिखा, वह उस दौर की अन्य हॉरर फिल्मों में गायब था।

बॉक्स ऑफिस का बदलता गणित

उस दौर में जहां मसाला फिल्मों का बजट 50 लाख से 1 करोड़ के पार जा रहा था, रामसे ब्रदर्स ने ‘पुराना मंदिर’ को सिर्फ 2.5 लाख रुपये के आसपास के बजट में तैयार किया। फिल्म की शूटिंग के लिए किसी भव्य स्टूडियो की जगह असली लोकेशंस (जैसे महाबलेश्वर की पुरानी हवेलियां) का इस्तेमाल किया गया।

जब फिल्म रिलीज हुई, तो इसने बॉक्स ऑफिस पर जो धमाका किया, उसकी कल्पना ट्रेड एनालिस्ट्स ने भी नहीं की थी। फिल्म ने लगभग 2.5 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया। आज के संदर्भ में देखें तो यह निवेश पर लगभग 100 गुना रिटर्न था। इस सफलता ने यह साबित कर दिया कि अगर कहानी में दम हो और पेश करने का तरीका नया हो तो वह भी हिट हो सकती है।

‘पुराना मंदिर’ की सफलता ने फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स के बीच हॉरर फिल्मों की मांग बढ़ा दी। इससे पहले डरावनी फिल्मों को सुबह के शो या छोटे शहरों के थिएटरों तक सीमित रखा जाता था। लेकिन सामरी के खौफ ने इस फिल्म को बड़े शहरों के मुख्य सिनेमाघरों (A-list Theaters) के प्राइम टाइम स्लॉट में ला खड़ा किया। डिस्ट्रीब्यूटर्स को समझ आ गया कि हॉरर एक ऐसा जॉनर है जिसकी रिपीट वैल्यू बहुत ज्यादा है।

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