70-80 के दशक में ऐसी कई फिल्में आईं, जिनकी वजह से बॉलीवुड में काफी बदलाव आया। कुछ मूवीज ऐसी भी थीं, जिन्होंने कई बॉलीवुड सितारों के डूबते हुए करियर को बचाया और उन्हीं में से एक मूवी ‘दीवार’ थी। 1975 में आई यह मूवी न सिर्फ अमिताभ बच्चन के लिए बेहतरीन साबित हुई, बल्कि हिंदी सिनेमा का टर्निंग पॉइंट भी बन गई। ‘दीवार’ का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था और इसकी कहानी उस समय की मशहूर जोड़ी सलीम खान और जावेद अख्तर ने लिखी थी।

सलीम खान ने ही अमिताभ बच्चन के डूबते करियर को बचाया और उनके साथ न सिर्फ ‘दीवार’ बल्कि ‘त्रिशूल’, ‘काला पत्थर’, ‘जंजीर’ और ‘शोले’ समेत कई फिल्मों में काम किया। उन्होंने पहले बिग बी को ‘जंजीर’ में एंग्री यंग मैन के रूप में दिखाया और फिर ‘दीवार’ ने उनकी इस इमेज को और भी पक्का कर दिया। अमिताभ बच्चन ने इस मूवी में विजय का किरदार निभाया। वहीं, शशि कपूर उनके भाई रवि के रोल में नजर आए। यह मूवी सिर्फ दो भाइयों की नहीं थी, बल्कि इसमें गरीबी, सिस्टम से नाराजगी और गुस्सा साफ नजर आया।

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‘दीवार’ ने दी  हीरो की नई परिभाषा

अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘दीवार’ उस दौर की कल्ट क्लासिक फिल्मों में से एक रही है। इसमें दर्शकों को धांसू डायलॉग्स, एक्शन, पॉपुलर गाने और रिश्तों का ताना-बाना सब देखने को मिला, जिसने इसे और शानदार बना दिया। इस मूवी से पहले हिंदी सिनेमा का हीरो अधिकतर रोमांटिक और आदर्शवादी हुआ करता था, लेकिन बिग बी का किरदार विजय वर्मा एक टूटा हुआ, आहत और अंदर से जलता हुआ शख्स था।

बचपन में पिता पर लगे देशद्रोह के आरोप, समाज की बेइज्जती, गरीबी और अपमान- ये सब विजय के मन में गुस्से की आग बनकर जमा हो जाते हैं। वह सिस्टम पर भरोसा नहीं करता। वह भगवान से भी सवाल करता है। ‘दीवार’ ने पहली बार दर्शकों को ऐसा नायक दिया, जो कानून का पालन नहीं करता, बल्कि अपने नियम खुद बनाता है।

फिल्म में दिखा विचारधाराओं का टकराव

फिल्म का सबसे बड़ा कॉन्फ्लिक्ट सिर्फ पुलिस बनाम अपराधी नहीं है, बल्कि विचारधारा का टकराव है। एक तरफ जहां ‘विजय’ हालात का शिकार, कानून तोड़ने वाला है। वहीं, ‘रवि’ कानून में विश्वास रखने वाला है।

घंटों होती थी मंदिर वाले सीन की तैयारी

फिल्म का सबसे फेमस सीन मंदिर वाला है, जहां विजय भगवान में विश्वास नहीं करता और अपनी मां की जान बचाने के लिए मंदिर जाता है। इसके बारे में बात करते हुए अमिताभ बच्चन ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ शो में एक किस्सा सुनाया था। बिग बी इस सीन को शूट करने से पहले वह सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकले थे।

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उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि एक ऐसा इंसान, जो भगवान को नहीं मानता, वह कैसे प्रार्थना करेगा। सिर्फ इतना ही नहीं, उस समय अमिताभ ‘शोले’ की शूटिंग भी साथ-साथ कर रहे थे। वह सुबह एक फिल्म की शूटिंग करते और रात में दूसरी। उन्होंने मंदिर वाले सीन के लिए शीशे के सामने खड़े होकर प्रैक्टिस की।

ग्लैमर और बदलता बॉलीवुड

परवीन बाबी के किरदार में 70 के दशक की आधुनिक महिला की झलक देखने को मिली थी। वह स्वतंत्र है, क्लब जाती है, सिगरेट पीती है और ट्रेडिशनल हेरोइनों से अलग नजर आईं। यह उस समय के बदलते दौर को दिखा रहा था, जहां पश्चिमी इन्फ्लुएंस तेजी से बढ़ रहा था। हालांकि, लास्ट में उनकी कहानी भी ट्रैजिक हो जाती है, जो यह दिखाती है कि अपराध की दुनिया में भावनाओं की जगह नहीं होती।

फिल्म में दिखा अंडरवर्ल्ड का बैकग्राउंड

1970 के दशक में मुंबई में तस्करी का बोलबाला था। उस समय सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेशी सामान की अवैध तस्करी आम थी। दर्शकों ने विजय का स्मगलर बनना उस दौर की हकीकत से जुड़ा हुआ माना। हालांकि फिल्म किसी वास्तविक व्यक्ति पर आधारित होने का दावा नहीं करती, लेकिन दर्शकों को यह कहानी बेहद वास्तविक लगी।

पलट गया था क्लाइमैक्स

उस दौर में ज्यादातर फिल्मों के क्लाइमैक्स अच्छी एंडिंग के साथ खत्म होते थे, लेकिन इसका अंत अच्छा नहीं था। विजय पुलिस की गोली से घायल होकर मां की गोद में दम तोड़ देता है। इस सीन ने दर्शकों को इमोशनल कर दिया। हालांकि, इसका मैसेज साफ था कि अपराध का रास्ता चाहे मजबूरी में क्यों न चुना जाए, उसका अंत दुखद ही होता है।

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