अगर आप हॉरर फिल्मों के शौकीन हैं, तो रामसे ब्रदर्स के नाम से अच्छी तरह वाकिफ होंगे। जी हां, वही रामसे ब्रदर्स जिन्होंने लगभग दो दशकों तक हॉरर जॉनर पर राज किया। 1949 में आई फिल्म ‘महल’, 60 के दशक की हॉरर फिल्मों जैसे ‘बीस साल बाद’, ‘गुमनाम’ और ‘भूत बंगला’ के बाद सिर्फ इन्हीं की मूवीज लोगों को काफी पसंद आती थी। उन्होंने अपने करियर में ‘पुराना मंदिर’, ‘वीराना’ और ‘दरवाजा’ समेत कई फिल्मों का निर्माण किया। यह फिल्में कम बजट में बनी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर कमाल कर गईं।
पिछली बार हमने अपने सिनेमा डिकोड कॉलम में रामसे ब्रदर्स की फिल्म ‘वीराना’ को डिकोड किया था। चलिए इस बार हम आपको उनकी मूवी ‘दरवाजा’ के बारे में बताते हैं। यह फिल्म साल 1978 में रिलीज हुई थी, जिसमें अनिल धवन, साधना, त्रिलोक कपूर समेत कई सितारे नजर आए थे।
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इस प्रोजेक्ट के लिए रामसे ब्रदर्स- तुलसी रामसे और श्याम रामसे ने इंटरनेशनल लेवल पर मशहूर मेकअप आर्टिस्ट क्रिस्टोफर टकर से संपर्क किया। यह फिल्म इतनी हिट हुई कि डिस्ट्रीब्यूटर्स ने दर्शकों को इसे अकेले थिएटर में देखने का खुला चैलेंज दिया और जो कोई भी ऐसा करने की हिम्मत करता उसे 10 हजार रुपये का कैश प्राइज देने की पेशकश की थी।
जब हॉरर बना बिजनेस मॉडल
बता दें कि 70s के अंत तक हिंदी सिनेमा एक बदलाव के दौर से गुजर रहा था। मल्टीस्टारर फिल्में, एक्शन ड्रामा और पारिवारिक मेलोड्रामा का दबदबा था। बड़े सितारों की फीस बढ़ चुकी थी और प्रोडक्शन लागत लगातार ऊपर जा रही थी। ऐसे में निर्माताओं के लिए टिके रहना मुश्किल होता था। इसी परिस्थिति में कम बजट हॉरर एक सर्वाइवल स्ट्रेटेजी के रूप में सामने आई। इसके बाद इसमें ‘दरवाजा’ जैसी कई फिल्में बनीं, क्योंकि वे कम संसाधनों में तैयार की जा सकती थीं।
क्यों काम कर गया ये दांव?
‘दरवाजा’ का ये दांव इसलिए काम कर गया, क्योंकि इसका बजट कम था। ऐसी फिल्मों की शूटिंग ज्यादातर सीमित लोकेशन पर ही होती थी, जैसे- किसी हवेली में या फिर जंगलों में। इसके अलावा नए चेहरों को कास्ट करना। टेक्निकल खर्च कम, डर और बोल्ड विजुअल्स पर फोकस करना जैसे कई पॉइंट्स रहे, जिनकी वजह से हॉरर- लो रिस्क, हाई रिटर्न फॉर्मूला मजबूत हुआ।
साइकोलॉजी ऑफ फियर
रामसे परिवार की तीसरी पीढ़ी दीपक रामसे और अमित रामसे ने श्रेष्ठ भारत से बात करते हुए बताया था कि आप इसे पब्लिसिटी स्टंट कह सकते हैं, लेकिन एक डिस्ट्रीब्यूटर ने अनाउंस किया कि जो कोई भी थिएटर में अकेले दरवाजा देखेगा, उसे 10 हजार कैश मिलेंगे। यहां तक कि थिएटर के बाहर एक एम्बुलेंस भी खड़ी थी। फिल्म इतनी पॉपुलर थी, लेकिन किसी ने इसे अकेले देखने की हिम्मत नहीं की।
अब इसके पीछे की कहानी समझते हैं। उस दौर में सिंगल स्क्रीन थिएटर हुआ करते थे। वहां कम लाइटिंग, साउंड सिस्टम जो अचानक तेज आवाज देते थे और भरे हुए हॉल में सामूहिक रूप से लोग जब एक साथ चौंकते हैं, तो डर का असर कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में अकेले देखने की हिम्मत इसे कौन ही करता। ये जंप-स्केयर फॉर्मूला आज कॉमन है, लेकिन 1978 में ये नया था।
थिएटर के बाहर एम्बुलेंस की कहानियां फिल्म के माउथ पब्लिसिटी मार्केटिंग का हिस्सा भी मानी जाती। डर जितना बड़ा, टिकट उतने ज्यादा। फिल्म में लंबी खामोशी के बाद अचानक चीख या मॉन्स्टर का क्लोजअप- यह टेंशन बिल्ड-अप और रिलीज तकनीक थी।
मॉन्स्टर, मेकअप और विजुअल सिम्ब्ल
फिल्म का असली केंद्र उसका खलनायक था। कहानी भले सीधी हो, लेकिन खलनायक का चेहरा, उसकी चाल और उसकी उपस्थिति- यही फिल्म की पहचान बन गई। उस दौर में CGI या डिजिटल इफेक्ट्स नहीं थे। सब कुछ प्रैक्टिकल मेकअप और लाइटिंग से हासिल किया जाता था।
लाल आंखें, नुकीले दांत, छाया में खड़ा शरीर- यह सीन सीधे सबकॉन्शियस पर असर डालते थे। भारतीय लोककथाओं के पिशाच और पश्चिमी ड्रैकुला की इमेज का मिश्रण- यही उसका विजुअल आकर्षण था। दर्शकों के लिए यह नया भी था और परिचित भी।
फिल्म को मिला था बी-ग्रेड का टैग
क्रिटिक्स ने इसे बी-ग्रेड कहा, लेकिन यही टैग इसे एडल्ट, थ्रिल ऑडियंस तक ले गया। उस दौर में बी-ग्रेड एक विशेष पहचान भी था। इसका मतलब था कि फिल्म में बोल्ड सीन होंगे, डर खुलकर दिखेगा और कहानी तेजी के साथ चलेगी। यहीं से हॉरर फिल्मों की एक अलग मार्केट छोटे शहरों, लेट नाइट शोज और फ्रंट बेंचर्स के बीच बनी।
‘दरवाजा’ को सिर्फ एक डरावनी फिल्म कह देना आसान है, लेकिन असल में यह हिंदी सिनेमा के आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक बदलाव का प्रतीक थी। इसने दिखाया कि डर बिकता है। सीमित संसाधन भी प्रभावी हो सकते हैं और दर्शक सिर्फ ग्लैमर नहीं, अनुभव भी चाहते हैं। यही कारण है कि 1978 की यह फिल्म आज भी कल्ट कही जाती है, क्योंकि उसने सिर्फ कहानी नहीं सुनाई, बल्कि एक मॉडल बना दिया।
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साल 1975 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘जय संतोषी मां’ ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया था। न तो इसमें बड़े सितारे थे और न ही भव्य सेट, फिर भी इसकी सादगी भरी प्रस्तुति और गहरी धार्मिक कथा ने दर्शकों के दिलों में ऐसी आस्था जगाई कि लोग सिनेमाघरों में ही भक्ति भाव में डूब गए। पूरी खबर यहां पढ़ें।
