बॉलीवुड में अलग-अलग जॉनर की फिल्में बनती हैं। इसमें सस्पेंस, थ्रिलर, हॉरर और कॉमेडी सब कुछ शामिल होता है। इस समय जिस जॉनर की मूवी लोगों को ज्यादातर पसंद आ रही है, वह हॉरर और थ्रिलर हैं। हालांकि, हॉरर मूवीज अब वैसी नहीं बनती, जो 60 और 70 के दशक में बना करती थीं। अब मेकर्स हॉरर के साथ कॉमेडी का तड़का लगा देते हैं, लेकिन अगर आप उस दौर की हॉरर फिल्मों को देखने के शौकीन थे, तो चलिए आज हम आपको साल 1965 में आई फिल्म ‘गुमनाम’ के बारे में बताते हैं।

‘गुमनाम’ भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन सस्पेंस-थ्रिलर फिल्मों में से एक मानी जाती है। यह मशहूर लेखिका अगाथा क्रिस्टी के उपन्यास ‘And Then There Were None’ पर आधारित है। राजा नवाथे के निर्देशन और एन.एन. सिप्पी द्वारा निर्मित इस फिल्म में उस समय मनोज कुमार, नंदा, महमूद, प्राण, हेलेन और मदन पुरी समेत कई सितारे नजर आए थे। चलिए अब इस मूवी को डिकोड करते हैं।

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प्लॉट और सेटिंग

फिल्म की कहानी में देखने को मिलता है कि आठ अनजान लोगों को एक लॉटरी जीतने के बहाने अनजान टापू पर बुलाया जाता है। वहां उन्हें एक आलीशान महल दिखाई देता है, जिसमें बटलर (महमूद) के अलावा कोई नहीं रहता, लेकिन कहानी तब पलट जाती है जब एक-एक करके उन लोगों की मौत होने लग जाती है।

इसमें मौजूद हर किरदार का एक अतीत है। फिल्म ‘गुमनाम’ में मनोज कुमार (आनंद) एक फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में ग्रुप के साथ होते है, लेकिन असल में उनकी भूमिका कुछ और ही होती है। नंदा (आशा) फिल्म की हीरोइन होती हैं, जिनका अतीत भी संदेह के घेरे में रहता है। महमूद (रसोइया) यह किरदार फिल्म की जान है। उनका गाना ‘हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं’ आज भी मशहूर है। वह मूवी में डर और कॉमेडी का सही मिश्रण पेश करते हैं।

सिनेमैटोग्राफी और विजुअल स्टाइल

1965 के हिसाब से इस फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट बहुत ज्यादा एडवांस था। फिल्म में ‘लो-की लाइटिंग’ का इस्तेमाल किया गया है। गलियारों में लंबी परछाइयां और चेहरों पर आधा अंधेरा यह दर्शाता है कि हर किरदार का एक ‘डार्क साइड’ है।

साइकोलॉजिकल एंगल: ‘गिल्ट और डर का खेल’

यह फिल्म केवल एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि ‘ह्यूमन साइकोलॉजी’ का एक एक्सपेरिमेंट है। इसमें जब इंसान को समाज से काटकर एक टापू पर छोड़ दिया जाता है, तो उसका असली चेहरा बाहर आता है। फिल्म दिखाती है कि कैसे डर इंसान को क्या से क्या बना देता है। वे एक-दूसरे पर शक करने लगते हैं और उनका आपसी भरोसा टूट जाता है।

संगीत का ‘नैरेटिव’ टूल के रूप में इस्तेमाल

आमतौर पर बॉलीवुड में गाने ब्रेक लेने के लिए होते हैं, लेकिन ‘गुमनाम’ में गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं। ‘गुमनाम है कोई’ यह गाना एक ‘वार्निंग’ की तरह काम करता है। इसमें जो गूंज इस्तेमाल की गई है, वह खाली बंगले के सूनेपन और मौत की आहट को दर्शाती है। ‘हम काले हैं तो क्या हुआ’ यह गाना दर्शकों का ध्यान भटकाने के लिए था। महमूद का फनी अंदाज दर्शकों को रिलैक्स कर देता है ताकि अगले ही पल होने वाला मर्डर और भी ज्यादा चौंकाने वाला लगे।

अगाथा क्रिस्टी बनाम बॉलीवुड अडैप्टेशन

यह फिल्म अगाथा क्रिस्टी के उपन्यास से प्रेरित है, लेकिन इसमें इंडियन मसाला भी जोड़ा गया। ओरिजिनल नॉवेल में कोई हीरो-हीरोइन नहीं था, सब मर जाते हैं। हालांकि, ‘गुमनाम’ में मनोज कुमार और नंदा के बीच रोमांस डाला गया, ताकि दर्शक फिल्म से जुड़ाव महसूस करें। लास्ट में पुलिस की जीत दिखाई गई, जो उस समय के भारतीय सेंसर बोर्ड और दर्शकों की मांग थी।

लगभग 30 लाख में बनी इस फिल्म ने 2.6 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी। ये 1965 की 8वीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी थी। दर्शकों और क्रिटिक्स ने इसकी कहानी और डायरेक्शन की खूब तारीफ की और आज भी ये फिल्म भारतीय सिनेमा की एक कल्ट क्लासिक थ्रिलर मानी जाती है, जिसे मिस्ट्री लवर्स बार-बार देखना पसंद करते हैं। इस फिल्म में टोटल 8 गाने थे… ‘गुमनाम है कोई’, ‘जान पहचान हो’, ‘एक लड़की है जिसने’, ‘गम छोड़ के मनाओ रंगरेली’ , ‘इस दुनिया में जीना है तो’, ‘जवानों की दिल है रानी’, ‘पेशावर से पंजाब’ और ‘हम काले हैं तो क्या हुआ’। 

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‘वीराना’ के बाद अब हम सिनेमा डिकोड में रामसे ब्रदर्स की एक और हॉरर फिल्म को डिकोड करने वाले हैं और उसका नाम है ‘दरवाजा’। चलिए जानते हैं इस मूवी की कहानी से लेकर सब कुछ। पूरी खबर यहां पढ़ें