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हमारी याद आएगीः सलीम-जावेद की बनी जोड़ी राजेश खन्ना को मिला बंगला

बदन पर सिर्फ लुंगी, सोने की फ्रेम का चश्मा, माथे पर त्रिपुंड, शरीर पर चंदन के पाउडर का लेप करने वाले निर्माता चिनप्पा देवर एक अनोखे निर्माता थे। तमिल फिल्में बनाने वाले देवर को हिंदी फिल्मों के दर्शक नहीं जानते हों मगर उनकी हिंदी फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’, ‘जानवर और इनसान’, ‘गाय और गौरी’, ‘मां’ खूब लोकप्रिय थीं। भगवान मुरुगन के अनन्य भक्त देवर ने अपनी लिखी एक ही पटकथा पर पांच सालों में तीन फिल्में बनार्इं। जिनमें ‘हाथी मेरे साथी’ के कारण राजेश खन्ना ने बंगला खरीदा और पहली बार सलीम-जावेद की जोड़ी बनी। आठ सितंबर को देवर की 42वीं पुण्यतिथि थी।

देवर 1956 में निर्माता बन गए और तमिल फिल्मों के अभिनेता एमजी रामचंद्रन को लेकर 16 फिल्में बनाईं।

चिनप्पा देवर (28 जून, 1915  – 8 सितंबर, 1978)

कुल पांच जमात पढ़े मरुदर मरुदाचलमूर्ति अयव्वो चिनप्पा देवर ने नौ रुपए महीने में मिल में काम किया, कुछ दिन दूध का धंधा किया, चावल बेचे फिर फिल्मों में छिटपुट भूमिकाएं करने लगे। पहली बार 1944 में तमिल फिल्म ‘तिलोत्तमा’ में उन पर लड़ाई का जो दृश्य फिल्माया गया था, उसमें कैमरा उन पर नहीं, जमीन पर पड़ने वाले उनकी परछाईं ही दिखाता रहा। सो परछाईं के जरिए परछाइयों की दुनिया में उतरे देवर 1956 में निर्माता बन गए और तमिल फिल्मों के अभिनेता एमजी रामचंद्रन को लेकर 16 फिल्में बनाईं। वे इतने अच्छे मित्र बन गए थे कि दोनों के बीच मौखिक अनुबंध हो गया कि उनकी हर फिल्म में एमजी रामचंद्रन काम करेंगे। मगर फिल्मी दुनिया में ‘कस्में वादे प्यार वफा सब वादे हैं वादों का क्या…’ चलता है। हालात सब कुछ बदल देते हैं।

जब एमजी रामचंद्रन फिल्मों के साथ राजनीति में सक्रिय हो गए, तो उनके पास देवर की फिल्मों के लिए समय नहीं बचा। देवर ने तब खुद की लिखी कहानी पर बनी असफल फिल्म ‘देवाचेयल’ (1967) की पटकथा उठाई और जा पहुंचे मुंबई हिंदी फिल्म बनाने। मगर उनकी वेशभूषा को देखकर कोई जल्दी मिलने के लिए तैयार नहीं था। किसी तरह राजेश खन्ना से मीटिंग तय हुई। तब ‘आराधना’ रिलीज नहीं हुई थी। खन्ना का दिल डिंपल बंगले पर आ गया था, मगर कुछेक लाख कम पड़ रहे थे। देवर ने उनका पूरा पेमेंट नकद कर उन्हें ‘हाथी मेरे साथी’ में साइन कर लिया और खन्ना ने बंगला खरीद लिया।

सलीम-जावेद, जो तब सिप्पी फिल्म में मासिक तनख्वाह पर काम कर रहे थे, ने देवर की लिखी पटकथा को ठीक करने का जिम्मा संभाला, इस शर्त पर कि फिल्म में दोनों का नाम साथ जाएगा। इस बीच ‘आराधना’ रिलीज हुई और हिट हो गई तो देवर सूटकेस लेकर खन्ना के पास जा पहुंचे कि अब खन्ना अपना मेहनताना बढ़ा देंगे। पूछा और कितना पैसा उन्हें देना है। खन्ना ने बढ़ा हुआ मेहनताना लेने से इनकार कर दिया।

‘हाथी मेरे साथी’ बनी। इसका पहला प्रिंट देवर ने भगवान मुरुगन के चरणों में रख दिया। फिल्म रिलीज हुई लेकिन बहुत ठंडा रिस्पांस था। खन्ना ने फोन कर देवर को दिल्ली बुलाया। जब मद्रास से देवर दिल्ली पहुंचे, तब तक फिल्म हिट हो चुकी थी। इसकी सफलता इतनी जबरदस्त थी कि राजेश खन्ना ने उसका फायदा उठाते हुए ‘आराधना’ के निर्माता शक्ति सामंत के साथ मिलकर फिल्म वितरण कंपनी खोल ली और ‘हाथी मेरे साथी’ मुंबई में रिलीज कर अच्छी कमाई की।

इस तरह देवर की लिखी एक ही कहानी पर तमिल फिल्म देवाचेयल (1967) के बाद दूसरी फिल्म हिंदी में ‘हाथी मेरे साथी’ (1971) बनी। बाद में इसी ‘हाथी मेरे साथी’ को देवर ने फिर तमिल में ‘नल्ला नेरम’(1972) नाम से बनाया और इस फिल्म के हीरो थे उनके परम मित्र भारत रत्न एमजी रामचंद्रन जो 1977 से 1987 तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। ‘नchinnappa devar ल्ला नेरम’ एमजीआर के साथ देवर की आखिरी फिल्म थी।

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