ताज़ा खबर
 

बच्चों के समग्र विकास वाली शिक्षा हो : निशा पेशिन

स्कूलों में विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान तो दिया जाता है, पर इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि उन्हें इस तरह का प्रशिक्षण भी दिया जाए कि वे इस अर्जित ज्ञान को जीवन में कहां और कैसे इस्तेमाल करें।

नई दिल्ली की निदेशक (शैक्षिक) डॉ. निशा पेशिन

वंदना

स्कूलों में विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान तो दिया जाता है, पर इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि उन्हें इस तरह का प्रशिक्षण भी दिया जाए कि वे इस अर्जित ज्ञान को जीवन में कहां और कैसे इस्तेमाल करें। स्कूल के बाद कॉलेज की पढ़ाई में भी वही मानसिकता विकसित होती है और जब जीविकोपार्जन का समय आता है तो वही बच्चे अपने हिसाब से उस ज्ञान का इस्तेमाल करते हैं। कोई सही तो कोई गलत रास्ते से इसी विद्या के सहारे अपनी जीविका कमाता है। यह बात डीएवी सीएमसी, नई दिल्ली की निदेशक (शैक्षिक) डॉ. निशा पेशिन ने जनसत्ता से विशेष बातचीत में कही। वे यहां दो दिवसीय हंसराज पार्लियामेंटेरियन डिबेट का उद्घाटन करने आर्इं थीं।

डॉ. निशा का मानना है कि हर बच्चे को उसकी मानसिक और शारीरिक योग्यता के आधार पर आंकना चाहिए। डिटेंशन और नो-डिटेंशन मुद्दे पर विवाद की बजाय शिक्षाविदों को ऐसी शिक्षा नीति पर जोर देना चाहिए जिसमें हर बच्चे के विकास और उन्नति की गुंजाइश हो। प्राथमिक कक्षाओं से ही बुनियाद मजबूत होनी चाहिए। अगर ऐसा हो तो वह किसी भी परीक्षा में फेल नहीं होगा। ऐसे में अयोग्य बच्चे को जबरन पास करने या न करने का विवाद ही बेवजह है। हर बच्चे में अलग विशेषता होती है।
उन्होंने कहा कि शिक्षाविदों को कोई भी नीति बनाते समय ऐसा हल तलाशना चाहिए जिनसे हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत हो जाए कि बच्चे को पास या फेल करने की जरूरत न पड़े। हर बच्चे को उसकी रुचि के हिसाब से शिक्षित किया जाना चाहिए ताकि वह जीवन की हर परीक्षा में अव्वल रहे। डॉ. निशा के मुताबिक शिक्षा नीति पर होने वाली चर्चाओं, बहस-मुबाहिसों में राजनीतिक दखलअंदाजी नहीं होनी चाहिए और न ही इसे राजनीतिक विवाद बनाने की इजाजत दी जानी चाहिए। एनसीआरटी की किताबें जरूरी करने के मसले पर उन्होंने कहा-‘मेरा मानना है कि एनसीआरटी की ओर से उठाया गया मुद्दा एकदम सही है। इसमें कोई शक नहीं है कि कई स्कूलों में निजी प्रकाशक इसका व्यावसायिक फायदा लेते हुए ऐसी पुस्तकें पढ़वा देते हैं जिनमें हल्की पाठ्य सामग्री ही होती है।’

उन्होंने कहा कि सीबीएसई और एनसीआरटी में जिन मुद्दों को अहमियत दी जाती है, डीएवी संस्थान भी उसी को महत्व देते हैं। डीएवी की शिक्षा नीति में उन्हीं मुद्दों को अहमियत दी जा रही है। हम भी तो यही कहते हैं कि कुछ निजी प्रकाशक शिक्षा का व्यवसायीकरण कर रहे हैं जो कि गलत है। पर इसके साथ हम यह भी सुनिश्चित करते हैं कि विद्यार्थियों को ऐसी श्रेष्ठ पुस्तकें मिलें जिनमें हर साल संशोधन भी हो ताकि उन्हें ज्यादा से ज्यादा ज्ञान मिले। एनसीआरटी की पुस्तकों में इसी चीज की कमी है। ज्ञान में सुधार और संशोधन की गुंजाइश हमेशा रहती है और यह विद्यार्थियों का अधिकार भी है।

शिक्षा प्रणाली में लगातार हो रहे बदलाव का जिक्र करते हुए डॉ. निशा ने कहा, ‘मैं वर्ष 1993 में डीएवी संस्थान से जुड़ी थी। तब से लेकर अब तक शिक्षा ढांचे में कई बदलाव आए। मुझे खुशी है कि इस अवधि में स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था में काफी सुधार आया है। अगर हम विशेष तौर पर डीएवी स्कूलों की बात करें और इनकी निजी व सरकारी स्कूलों से तुलना करें तो निश्चित ही डीएवी स्कूलों के परीक्षा परिणाम बेहतर नजर आएंगे। फिर चाहे शिक्षा हो, खेल या अन्य गतिविधियां। शिक्षा नीति को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाने के मसले पर उन्होंने कहा कि शिक्षा संबंधी सभी मसौदे का दायित्व शिक्षाविदों को सौंपा जाना चाहिए।
शिक्षा को राजनीतिक बहस नहीं बनाया जाना चाहिए। अन्य गतिविधियों की अहमियत पर जोर देते हुए डॉ. निशा ने कहा कि विद्यार्थी के समग्र विकास के लिए ये बेहद जरूरी हैं। पहले विद्यार्जन को ज्यादा अहमियत दी जाती थी, लेकिन अब अन्य गतिविधियों को भी महत्व मिल रहा है।

Next Stories
1 शाहरुख के साथ वाली कौन सी तस्वीर अपने फोन में रखते हैं सलमान खान
2 रणदीप हुड्डा के किस करने पर शूटिंग छोड़ कर गई थीं काजल अग्रवाल
3 पहला सेक्सुअल अनुभव लेने के लिए करण जौहर को चुकाने पड़े थे रुपए
ये पढ़ा क्या?
X