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छबि पर फिल्मकारों का ‘विश्वास’

नाटकों से फिल्मों की दुनिया में छबि बिस्वास आए 1936 की ‘अन्नपूर्णार मंदिर’ से। न्यू थियेटर्स की कई फिल्मों में उन्होंने काम किया। जब देविका रानी को लेकर भागे नजमुल हसन को बॉम्बे टाकीज से निकाला, तो हसन ने मुंबई से कोलकाता आकर न्यू थियेटर्स में काम करना शुरू कर दिया था।

नाटकों से फिल्मों की दुनिया में छबि बिस्वास आए 1936 की ‘अन्नपूर्णार मंदिर’ से।

शौक का क्या है लग जाता है। छबि बिस्वास को भी भर जवानी में नाटकों का शौक लग गया था। शिशिर बिस्वास जैसे निर्देशक-अभिनेता की संगत का असर उनके सिर चढ़ कर बोला था। 1924 में ‘सीता’ नाटक के मंचन के बाद शिशिर का दबदबा इतना बढ़ा था कि उन्हें आधुनिक रंगमंच में सहजता-सरलता लाने वाला क्रांतिकारी माना गया। शिशिर के संपर्क में आने के बाद छबि को भी एक्टिंग का शौक लग गया। लगता था कि बस मंच पर ही बने रहें। ‘नादेर निमाई’ नाटक से उनका नाम हो गया। फिर कभी बीमा कंपनी में काम किया तो कभी धंधा रोजगार चलाने की जुगत भिड़ाई। मगर शौक कहीं पीछा छोड़ता है। उसने जब आवाज दी तो छबि बिस्वास नौकरी-धंधा छोड़ वापस रंगमंच पर उतरे। और इस बार कमर कस कर ऐसे उतरे कि उनके हुनर पर सत्यजीत राय और राज कपूर का विश्वास पुख्ता हुआ था। राज कपूर का कहना था कि ऐसा अभिनेता हिंदी में क्यों नहीं है। छबि से प्रभावित राज कपूर ने अपनी ‘जागते रहो’ (1956) को जब बांग्ला में ‘एकदिन रात्रे’ नाम से बनाया तो उसमें मुख्य भूमिका छबि बिस्वास को दी थी।

40 और 50 के दशक में बांग्ला फिल्मों का देश-दुनिया में डंका बज रहा था। बीते 12 सालों से किसी बांग्ला फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार न जीता हो, मगर पचास के दशक में बांग्ला फिल्मों का राष्ट्रीय पुरस्कारों में बोलबाला था, जो ‘पथेर पांचाली’ (1955) से ही शुरू हो गया था। छबि बिस्वास की मुख्य भूमिका वाली ‘काबुलीवाला’ ने 1957 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और इसी साल उनकी फिल्म ‘एकदिन रात्रे’ को ‘सर्टिफिकेट आॅफ मेरिट’ दिया गया था।

नाटकों से फिल्मों की दुनिया में छबि बिस्वास आए 1936 की ‘अन्नपूर्णार मंदिर’ से। न्यू थियेटर्स की कई फिल्मों में उन्होंने काम किया। जब देविका रानी को लेकर भागे नजमुल हसन को बॉम्बे टाकीज से निकाला, तो हसन ने मुंबई से कोलकाता आकर न्यू थियेटर्स में काम करना शुरू कर दिया था। हसन की 1940 में प्रदर्शित ‘नर्तकी’ में छबि बिस्वास ने जबरदस्त काम किया था।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिस्वास का दबदबा बना ‘काबुलीवाला’, ‘जलसाघर’, ‘देवी’, ‘कंचनजंगा’, ‘दादा ठाकुर’ जैसी बंगाली फिल्मों से। सत्यजीत राय उनसे इतने प्रभावित थे कि अपनी तीन फिल्में ‘जलसाघर’, ‘देवी’ और ‘कंचनजंगा’ उन्होंने बिस्वास को दिमाग में रख कर ही लिखी थी। राय ने जब पहली बार खुद ‘कंचनजंगा’ की पटकथा लिखी, तो प्रमुख भूमिका छबि बिस्वास को ही दी थी। 1962 में जब एक सड़क हादसे में बिस्वास का निधन हुआ तो राय को बहुत धक्का लगा था। उनका कहना था कि छबि बिस्वास के निधन के बाद उन्होंने अपनी फिल्म में अधेड़ उम्र के ऐसे किरदार ही रखना बंद कर दिए, जिनमें छबि जैसे अभिनेता की जरूरत पड़ती थी।

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