इस वक्त दिलजीत दोसांझ स्टारर फिल्म ‘सतलुज’ इस वक्त विवादों में है। 3 सालों तक थिएटर में रिलीज करने की मंजूरी नहीं मिलने के बाद इसे ओटीटी पर रिलीज किया गया। मगर 48 घंटों के अंदर ही ‘सतलुज’ को ओटीटी से हटा दिया गया। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन की ओर से कहा गया कि फिल्म को प्रमाणपत्र के बगैर ही रिलीज कर दिया गया था। इसके अलावा ‘जन नायकन’ फिल्म को भी सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन की तरफ से हरी झंडी नहीं मिली है।

इन फिल्मों के कारण एक बार फिर CBFC की कार्यप्रणाली और फिल्म प्रमाणन प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हो गई है। अक्सर जब किसी फिल्म की रिलीज सर्टिफिकेशन के कारण अटकती है या उसमें कटौती की खबरें सामने आती हैं, तब यह सवाल उठता है कि आखिर बोर्ड किन आधारों पर फिल्मों को सर्टिफिकेट देता है और किन बातों को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाता है।

इसी बीच, इस पूरे मुद्दे पर पहले CBFC बोर्ड के सदस्य राज मिश्रा ने विस्तार से बताया था कि फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया कैसे काम करती है। उन्होंने समझाया था कि किसी भी फिल्म को सर्टिफिकेट देने से पहले दिशा-निर्देशों दिए जाते हैं और सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाता है।

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विमर्श-नारद टीवी से बातचीत में राज मिश्रा ने कहा, “सीबीएफसी (CBFC) के प्रमाणन के बिना किसी फिल्म को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना अपराध है। यह कानूनन दंडनीय है।”

उन्होंने बोर्ड की कार्यप्रणाली समझाते हुए बताया कि सीबीएफसी के अध्यक्ष की नियुक्ति सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय करता है। वर्तमान में इस पद पर प्रसून जोशी हैं।राज मिश्रा के मुताबिक, किसी भी फिल्म को सबसे पहले पांच सदस्यीय एग्जामिनिंग कमेटी देखती है। यदि पांच में से कम से कम तीन सदस्य फिल्म के पक्ष में होते हैं, तो उसे प्रमाणपत्र जारी कर दिया जाता है।

किस कैटेगरी में होते हैं सर्टिफिकेट?

राज मिश्रा ने बताया कि सीबीएफसी मुख्य रूप से तीन तरह के प्रमाणपत्र जारी करता है-

U (यूनिवर्सल): इस कैटेगरी की फिल्में हर उम्र के दर्शक बिना किसी प्रतिबंध के देख सकते हैं।
A (एडल्ट): यह प्रमाणपत्र केवल 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के दर्शकों के लिए होता है।
UA (पैरेंटल गाइडेंस): इस कैटेगरी की फिल्में बच्चे किसी वयस्क की निगरानी या मार्गदर्शन में देख सकते हैं।

किस आधार पर मिलते हैं सर्टिफिकेट

मिश्रा ने बताया कि किसी फिल्म को कौन-सा सर्टिफिकेट मिलेगा, यह उसकी उसमें दिखाए गए सीन पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा, “अगर किसी फिल्म में अपराध और हिंसा प्रमुख रूप से दिखाई गई है, तो उसे आमतौर पर ‘A’ (एडल्ट) सर्टिफिकेट दिया जाता है। वहीं, यदि हिंसा या अपराध के दृश्य सीमित और हल्के हों, तो फिल्म को ‘UA’ सर्टिफिकेट मिल सकता है, जिससे बच्चे अभिभावकों की निगरानी में उसे देख सकते हैं। यह दर्शकों की सुरक्षा के लिए रखा गया प्रावधान है। फिलहाल यही तीन तरह के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं।” U सर्टिफिकेट ऐसी फिल्म को दिया जाता है, जिसमें कोई आपत्तिजनक या बोल्ड सीन व डायलॉग नहीं हो।

अगर CBFC की समिति फिल्म को मंजूरी न दे तो क्या होता है?

राज मिश्रा ने बताया कि यदि शुरुआती पांच सदस्यीय समिति किसी फिल्म को मंजूरी नहीं देती, तो निर्माता दोबारा समीक्षा के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके बाद फिल्म की जांच 11 सदस्यीय समिति करती है। यदि वहां भी फिल्म को मंजूरी नहीं मिलती, तो निर्माता दिल्ली स्थित संबंधित ट्रिब्यूनल का रुख कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि ऐसे मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं।

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फिल्म को सर्टिफिकेट देने के लिए CBFC किन बातों का ध्यान रखता है?

राज मिश्रा के मुताबिक, बोर्ड यह देखता है कि फिल्म का विषय और उसे प्रस्तुत करने का तरीका मौजूदा समय और समाज के अनुरूप है या नहीं। उन्होंने कहा, “समय के साथ नियम और सामाजिक सोच बदलती रहती है। आज हल्की-फुल्की हिंसा को आम तौर पर स्वीकार किया जाता है, लेकिन यदि किसी फिल्म में अत्यधिक क्रूर और वीभत्स हिंसा दिखाई जाती है, जैसे किसी का जबड़ा उखाड़ने जैसा दृश्य, तो हमें यह सुनिश्चित करना होता है कि ऐसे दृश्य दर्शकों, खासकर समाज पर नकारात्मक प्रभाव न डालें।”

देश द्रोही नहीं होना चाहिए कंटेंट

राज मिश्रा ने कहा कि फिल्म को प्रमाणन देते समय सीबीएफसी इस बात का भी ध्यान रखता है कि उसमें राष्ट्र-विरोधी विचारों को बढ़ावा न दिया गया हो।

उन्होंने कहा, “किसी फिल्म में ऐसे विचार नहीं होने चाहिए जो राष्ट्र-विरोधी हों या देश और उसकी नीतियों का अपमान करते हों। फिल्म मनोरंजन का माध्यम हो सकती है, लेकिन उसे अशांति फैलाने या लोगों को भड़काने का काम नहीं करना चाहिए। फिल्मकारों को अपनी बात कहने की पूरी कलात्मक आजादी है, लेकिन उसकी भी कुछ सीमाएं हैं।”

क्या नेताओं का होता है हस्तक्षेप?

जब उनसे पूछा गया कि क्या फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया में राजनेताओं का कोई दबाव या हस्तक्षेप होता है, तो राज मिश्रा ने इससे साफ इनकार किया।

उन्होंने कहा, “मैं अभी भी सीबीएफसी का कार्यरत सदस्य हूं और आज तक मुझे किसी भी फिल्म को लेकर किसी नेता या प्रभावशाली व्यक्ति का फोन नहीं आया। हमें पहले से यह भी नहीं बताया जाता कि किस फिल्म या किस निर्माता की फिल्म का प्रमाणन करना है। स्क्रीनिंग के लिए पहुंचने के बाद ही फिल्म की जानकारी दी जाती है। किसी फिल्म को राजनीतिक समर्थन मिल सकता है, लेकिन उसका असर बोर्ड की कार्यवाही पर नहीं पड़ता।”

अपनी बात समाप्त करते हुए राज मिश्रा ने कहा, “सीबीएफसी की जिम्मेदारी सिर्फ इतनी है कि कोई फिल्म एक तय सीमा से अधिक लोगों की भावनाओं को आहत न करे। बोर्ड का काम इसी दायरे तक सीमित है।”