पिछले एक दशक में बॉलीवुड में रीमेक फिल्मों का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। कभी साउथ इंडस्ट्री की सुपरहिट फिल्मों को हिंदी में ढाला जा रहा है, तो कभी 70, 80 और 90 के दशक की क्लासिक फिल्मों को नए अंदाज़ में पेश किया जा रहा है। ‘कबीर सिंह’ जो साउथ की ‘अर्जुन रेड्डी’ की रीमेक है, ‘दृश्यम’ भी इसी नाम क एक मलयालम फिल्म का रीमेक है।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या बॉलीवुड में मौलिक कहानियों की कमी हो गई है, या यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। आइये जानते हैं कि इसके पीछे क्या-क्या कारण हो सकते हैं।
सेफ गेम खेल रहा बॉलीवुड
फिल्म इंडस्ट्री पूरी तरह रिस्क पर टिकी होती है। एक बड़े बजट की फिल्म में करोड़ों रुपये दांव पर लगते हैं। ऐसे में निर्माता-निर्देशक उन कहानियों को प्राथमिकता देते हैं जो पहले से किसी अन्य भाषा में सफल साबित हो चुकी हैं।
रीमेक फिल्में एक तरह से सेफ होती है, क्योंकि उसकी कहानी, प्लॉट से दर्शक पहले से ही जुड़े होते हैं। इससे फिल्म के फ्लॉप होने का जोखिम कम हो जाता है।
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पैन-इंडिया सिनेमा का बढ़ता प्रभाव
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और ओटीटी के दौर में भाषा की सीमाएं काफी हद तक खत्म हो चुकी हैं। अब दर्शक ‘पुष्पा’, ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों को सबटाइटल्स के साथ देख रहे हैं। इसका असर यह हुआ कि बॉलीवुड ने साउथ की हिट फिल्मों को हिंदी में रीमेक कर बड़े बाजार को टारगेट करना शुरू कर दिया है।
पुरानी यादों को भुनाने की कोशिश
पुरानी फिल्मों के रीमेक का एक बड़ा कारण नॉस्टेल्जिया फैक्टर है। उदाहरण के तौर पर ‘कूली नंबर 1’ का रीमेक और ‘जुड़वा’ की ‘जुड़वा 2’। ये ऐसी फिल्में हैं जो दर्शकों की पुरानी यादों को ताजा करने के लिए बनाई गईं।
इसके पीछे का कारण ये भी हो सकता है कि फिल्ममेकर्स को लगता है कि पुराने हिट फॉर्मूले को नए सितारों और आधुनिक तकनीक के साथ पेश करने से दर्शकों का जुड़ाव बढ़ेगा।
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क्या सच में क्रिएटिविटी की कमी है?
रीमेक फिल्मों की बढ़ती संख्या को लेकर अक्सर यह आलोचना होती है कि बॉलीवुड में ओरिजिनल कंटेंट की कमी हो रही है। हालांकि, यह पूरी तरह सच नहीं है। इंडस्ट्री में आज भी नई कहानियां बन रही हैं, लेकिन बड़े बजट और बड़े सितारों वाली फिल्मों में निर्माता जोखिम लेने से बचते हैं। छोटे बजट की फिल्मों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ओरिजिनल कंटेंट ज्यादा देखने को मिलता है, जबकि थिएटर रिलीज के लिए टेस्टेड फॉर्मूला अपनाया जाता है।
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स्टार पावर और मार्केटिंग का खेल
रीमेक फिल्मों में अक्सर बड़े सितारों को कास्ट किया जाता है, जिससे फिल्म को पहले से ही चर्चा मिल जाती है। साथ ही, मार्केटिंग के दौरान यह कहना आसान होता है कि फिल्म एक ब्लॉकबस्टर रीमेक है, जिससे दर्शकों के बीच उत्सुकता बढ़ती है।
हर रीमेक हिट नहीं होता
यह भी सच है कि हर रीमेक सफल नहीं होता। कई बार दर्शक मूल फिल्म से तुलना करने लगते हैं और अगर नई फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती, तो उसे दर्शक पसंद नहीं करते।
लाल सिंह चड्ढा है बड़ा उदाहरण
आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ इस बात का बड़ा उदाहरण है। जो साल 1994 में आई अमेरी कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ‘फॉरेस्ट गंप’ का रूपांतरण है। इस फिल्म को दर्शकों का खराब रिस्पॉन्स मिला था और साथ ही आमिर खान को भी इस फिल्म के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था।
नई कहानियां भी हो रही सुपरहिट
हालांकि रीमेक फिल्मों के बढ़ते दौर के बीच ‘धुरंधर’ ने यह साबित कर दिया है कि दमदार कंटेंट और नई सोच आज भी दर्शकों को आकर्षित कर सकती है। जहां एक तरफ बॉलीवुड पुरानी या दूसरी भाषाओं की हिट कहानियों पर फिल्में बना रहा है, वहीं ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में ये साबित करती हैं कि ओरिजिनल आइडियाज की ताकत अभी खत्म नहीं हुई है। फिल्म की अलग कहानी, मजबूत परफॉर्मेंस और ताजगी भरा नजरिया दर्शकों को कुछ नया देखने का मौका देता है, जो इसे रीमेक्स की भीड़ में खास बनाता है।
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ओटीटी के कारण फेल हो सकते हैं रीमेक
ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने दर्शकों की पसंद को काफी बदल दिया है। अब दर्शक नई और अलग कहानियों की तलाश में रहते हैं। यही कारण है कि जहां एक ओर थिएटर में रीमेक फिल्में बन रही हैं, वहीं ओटीटी पर ओरिजिनल कंटेंट का बोलबाला है। यह बदलाव बॉलीवुड के लिए एक संकेत है कि सिर्फ रीमेक के भरोसे लंबे समय तक टिकना मुश्किल हो सकता है।
हालांकि रीमेक फिल्मों का ट्रेंड पूरी तरह गलत नहीं है। यह एक मजबूत बिजनेस रणनीति है जो फिल्ममेकर्स को जोखिम से बचाती है और बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचने में मदद करती है। लेकिन अगर बॉलीवुड को लंबे समय तक दर्शकों का भरोसा बनाए रखना है, तो उसे रीमेक और ओरिजिनल कंटेंट के बीच संतुलन बनाना होगा। क्योंकि आखिरकार वही फिल्में इतिहास बनाती हैं, जो नई सोच, नई कहानी और नए अनुभव के साथ आती हैं।
