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बॉलीवुड को पता है सियासत कितनी और कैसे करनी है

राजीव गांधी के आह्वान पर ही सुपर स्टार राजेश खन्ना कांग्रेस में आए। 1991 में लाल कृष्ण आडवानी से वे मात्र 1589 वोटों से हारे। बाद में 1992 में हुए उपचुनाव में उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा को 25 हजार वोटों से हराया। मगर जल्दी ही उन्हें भी पता चल गया कि सियासत कितनी करनी है।

बच्चन ने 1984 के चुनावों में हेमवतीनंदन बहुगुणा को हराया।

चीन से युद्ध के बाद देश की जनता और सेना का मनोबल गिरा हुआ था, लिहाजा निराशा का वातावरण दूर करने के लिए सरकार ने फिल्मवालों की मदद लेनी तय की। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के फिल्मवालों से अच्छे रिश्ते थे। तब के सुपर स्टार पृथ्वीराज कपूर को नेहरू पसंद करते थे। दोनों की निकटता को लेकर एक किस्सा है कि एक दिन नेहरू ने कपूर को खाने पर बुलाया, मगर उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह अपनी नाटक मंडली के साथ हैं इसलिए नहीं आ सकते। तब नेहरू ने अगले दिन कपूर और उनकी 60 लोगों की यूनिट को तीन मूर्ति भवन में व्यक्तिगत उपस्थिति में दावत दी।
पृथ्वीराज कपूर के बाद की पीढ़ी में राज कपूर, दिलीप कुमार, महबूब खान, देव आनंद, सोहराब मोदी नेहरू के निकट थे।

चीन से युद्ध के बाद जब सेना और देश का मनोबल बढ़ाने की बात उठी, तो तय किया गया कि गणतंत्र दिवस पर एक बड़ा कार्यक्रम दिल्ली में किया जाए और भारत-चीन युद्ध पर ऐसी फिल्म बनवाई जाए जिससे सेना के साथ देश में फैला निराशा का वातावरण दूर हो। लिहाजा 27 जनवरी, 1963 को दिल्ली में एक कार्यक्रम रखा जिसका खूब प्रचार किया गया। 26 जनवरी, 1963 को बोलचाल बंद होने के बावजूद संगीतकार सी रामचंद्र ने अपनी प्रिय गायिका लता मंगेशकर को समारोह में गाने के लिए एक गाने का कैसेट भिजवाया। समय कम था लिहाजा लता मंगेशकर ने विमान में ही गाने का रिहर्सल किया।

विमान में लता के साथ महबूब खान, दिलीप कुमार, राज कपूर, संगीतकार शंकर-जयकिशन, मदन मोहन आदि दिल्ली रवाना हुए। 27 जनवरी को नेशनल स्टेडियम में जब लता की आवाज में ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ गूंजा तो न सिर्फ सुनने वालों बल्कि नेहरू की आंखें भी नम हो गई। सेना और जनता का मनोबल बढ़ाने की मुहिम में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो और नेहरू की प्रेरणा से गुरुकुल कांगडी में पढ़कर निकले चेतन आनंद ने ‘हकीकत’ फिल्म शुरू की जिसे बैंक से कर्ज स्वीकृत कर बनवाया गया। भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म का गाना ‘कर चले हम फिदा जान ओ तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों …’ खूब लोकप्रिय हुआ।

मुंबई के फिल्मवाले जानते हैं कि सियासत कितनी करनी है और कैसे करनी है। यही वजह है कि चाहे अमिताभ बच्चन हो, राजेश खन्ना हो, धर्मेंद्र हो या गोविंदा एक सीमा के बाद उन्होंने खुद को राजनीति से अलग कर लिया। दिलीप कुमार ने कांग्रेस का प्रचार तो किया, मगर सक्रिय राजनीति में हिस्सा नहीं लिया। देव आनंद ने राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा तो की, मगर उससे आगे नहीं बढ़े। इसी तरह शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान, रणवीर सिंह, रणवीर कपूर जैसे आज के सितारों ने खुद को सक्रिय राजनीति से दूर रखा है। जब देश में अन्न संकट और सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा थी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हफ्ते में एक दिन उपवास के साथ जय जवान जय किसान का नारा दिया। उन्होंने मनोज कुमार से इस पर फिल्म बनाने का आह्वान किया तो मनोज कुमार ने ट्रेन में बैठे-बैठे ‘उपकार’ लिख डाली थी। इसका गाना ‘मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती…’ आज भी तब जितना ही लोकप्रिय है। सियासत और सिनेमा के संबंध 1977 में तब तल्ख हुए, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था।

आपातकाल के दौरान चार फिल्में-‘आंधी’, ‘शोले’, ‘किस्सा कुर्सी का’ और ‘नसबंदी’- बुरी तरह से सेंसर में फंसी थीं। ‘आंधी’ पर इसलिए कहर टूटा था क्योंकि उसकी नायिका इंदिरा गांधी से मिलती-जुलती थी। नसबंदी सरकार के परिवार कल्याण विभाग की योजना थी। इसे लागू करने के दौरान ज्यादतियां भी हुर्इं थीं। फिल्मकार आइएस जौहर (यश चोपड़ा जिनके सहायक थे) ने इस पर ‘नसबंदी’ बनाई। यह फिल्म लंबे समय तक सेंसर में फंसी रही और आपातकाल उठने के बाद ही रिलीज हो पाई। आपातकाल का सबसे बुरा असर पड़ा था ‘किस्सा कुर्सी का’ पर। इस फिल्म का मूल प्रिंट तक जला दिया गया था। आपातकाल के बाद इसे दूसरे कलाकारों के साथ फिर से बनाया गया था। इंदिरा गांधी के निधन के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपने करीबी मित्र अमिताभ बच्चन से राजनीति में प्रवेश का आह्वान किया।

बच्चन ने 1984 के चुनावों में हेमवतीनंदन बहुगुणा को हराया। मगर शहंशाह जल्दी ही राजनीति की हकीकत से वाकिफ हो गए। उन्होंने खुद को राजनीति से दूर कर लिया। राजीव गांधी के आह्वान पर ही सुपर स्टार राजेश खन्ना कांग्रेस में आए। 1991 में लाल कृष्ण आडवानी से वे मात्र 1589 वोटों से हारे। बाद में 1992 में हुए उपचुनाव में उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा को 25 हजार वोटों से हराया। मगर जल्दी ही उन्हें भी पता चल गया कि सियासत कितनी करनी है, लिहाजा राजनीति में एक पंचवर्षीय योजना भी ठीक से पूरी नहीं कर पाए। विनोद खन्ना और शत्रुध्न सिन्हा से लेकर हेमा मालिनी और जया प्रदा जैसे कलाकार सक्रिय राजनीति से तबजुड़े, जब उनके सिनेमा करिअर में कोई बड़ी उम्मीद के आसार नहीं थे। चूंकि सब कुछ खरीदने और बेचने की क्रिया पर सिमटने लगा था इसलिए देश के अलग अलग सूबों ने राजस्व बढ़ाने के लिए पर्यटन पर जोर दिया और देखते ही देखते फिल्मों के कई कलाकार प्रदेशों के ब्रांड एंबेसेडर के रूप सक्रिय हो गए। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तभी से फिल्म कलाकारों से उनके अच्छे रिश्ते थे। उनके आग्रह पर अमिताभ बच्चन गुजरात के ब्रैंड एंबेसेडर बने। लोगों ने मोदी के साथ सलमान खान को पतंग उड़ाते देखा। बाद में जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो बॉलीवुड उनकी घोषित योजनाओं पर टायलट एक प्रेम कथा जैसी फिल्में बनाता नजर आया।

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