छलचित्र: बॉलीवुड हमें सालों तक कई झूठ बेचता आया है… और उनमें से एक बड़ा झूठ ये है कि चश्मा लगाने वाली लड़कियां खूबसूरत नहीं होतीं।

ना जाने कितनी फिल्मों में हमने ये पैटर्न देखा है- हीरोइन को पहले “कम अच्छी शक्ल” वाला दिखाया जाता है। बाल बंधे हुए, आंखों पर बड़ा-सा चश्मा, सिंपल कपड़े… और फिर एक दिन वही लड़की बाल खोलती है, चश्मा उतारती है- बैकग्राउंड म्यूज़िक बदल जाता है, लोग उसे घूरने लगते हैं, और अचानक वो “सबसे हसीन” बन जाती है।

सनम तेरी कसम (Sanam Teri Kasam)

इस फिल्म में सरस्वती “सरू” पार्थसारथी (मावरा होकेन) को उसकी शक्ल और चश्मे की वजह से लड़के रिजेक्ट कर देते हैं। उसे देखने के लिए आए लोग उसकी छोटी बहन को पसंद कर लेते हैं। फिर उसकी जिंदगी में इंदर (हर्षवर्धन राणे) की एंट्री होती है।

जो उसका मेकओवर कराता है- हीरोइन के बाल खुलते हैं, चश्मा उतरता है और वही सरस्वती अचानक “खूबसूरत” घोषित कर दी जाती है। जिन्होंने रिजेक्ट किया था, वही अब पीछे लाइन लगाते हैं।

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गॉड तुस्सी ग्रेट हो (God Tussi Great Ho)

इस फिल्म में अरुण (सलमान खान) की बहन का किरदार पहले अनग्लैमरस दिखाया जाता है। वो उसे मेकओवर के लिए ले जाता है।
फिर वही फॉर्मूला — चश्मा उतरता है, बाल खुलते हैं – और लोग कहते हैं, “पहले भयंकर दिखती थी, अब भयंकर लग रही है।”
यानी खूबसूरती का पैमाना बस लुक बदलते ही बदल गया।

कल हो ना हो (Kal Ho Naa Ho)

यहां नैना कैथरीन कपूर (प्रीति ज़िंटा) गुस्सैल, सख्त और चश्मा लगाने वाली लड़की है। फिर उसकी जिंदगी में अमन (शाहरुख खान) आता है। धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलता है… और एक दिन चश्मा भी गायब हो जाता है। अब वही नैना “खूबसूरत” हो जाती है।

यारियां (Yaariyan)

रकुल प्रीत सिंह का किरदार शुरुआत में चश्मा और सिंपल लुक में है। बाद में उसकी ग्लैमरस एंट्री के साथ पूरी vibe बदल जाती है।

और कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जहां चश्मा नहीं, लेकिन टॉमबॉय लुक को “कम खूबसूरत” दिखाया जाता है।

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कुछ कुछ होता है (Kuch Kuch Hota Hai)

कॉलेज वाली अंजलि (काजोल) शॉर्ट हेयर, स्पोर्टी कपड़ों में है- राहुल उसे दोस्त समझता है। सालों बाद जब वही अंजलि साड़ी और लंबे बालों में आती है- राहुल को अचानक प्यार हो जाता है।

मैं हूं ना (Main Hoon Na)

संजना बख्शी (अमृता राव) को पहले टॉमबॉय अंदाज़ में दिखाया जाता है। जैसे ही वो साड़ी और “गर्लिश” लुक में आती है, लक्ष्मण उर्फ लकी की नज़र बदल जाती है।

तो सवाल वही है- क्या चश्मा सच में प्रॉब्लम है? या हमें अपनी नज़र बदलने की ज़रूरत है? कब तक बॉलीवुड ये स्टीरियोटाइप बेचता रहेगा कि खूबसूरती सिर्फ खुले बाल और बिना चश्मे में है?