ताज़ा खबर
 

फिल्म समीक्षा: केदारनाथ त्रासदी के बीच बुनी प्रेम कहानी

कई संगठनों ने यह कहकर फिल्म का विरोध किया था कि इसमें ‘लव जिहाद’ की कहानी है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। फिल्म में भले ही एक हिंदू लड़की और मुसलिम लड़के की प्रेम कहानी दिखाई गई है, लेकिन फिल्म के अंत में यह कहानी बाढ़ में फंसे लोगों की जिंदगी की जद्दोजहद पर खत्म होती है। 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ को फिल्म के केंद्र में रखा गया है।

Kedarnath Movie Review: सारा अली खान और सुशांत सिंह राजपूत।

निर्देशक- अभिषेक कपूर
कलाकार- सुशांत सिंह राजपूत, सारा अली खान

इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ‘केदारनाथ’ को लेकर फिल्म प्रेमी खासा उत्सुक हैं इसकी पहली वजह यह है कि अभिनेता सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान इस फिल्म से बॉलीवुड में अपना डेब्यू कर रही हैं। सारा की मां अमृता सिंह भी अभिनेत्री रही हैं। दो मंझे हुए कलाकारों की बेटी अपनी पहली फिल्म में क्या कमाल दिखाती है, यह देखना लाजमी है। इसी फिल्म के आधार पर यह तय होगा कि सारा में उम्दा अभिनेत्री बनने की संभावना है या नहीं। इस फिल्म में वह उमंगों से भरी एक ऐसी लड़की के किरदार में हैं जिसमें जिंदगी को जीने की भरपूर चाहत है। उसमें शरारत भी है और चुलबुलापन भी। फिल्म देखने की उत्सुकता की दूसरी वजह से इसको लेकर उपजा विवाद है। कई संगठनों ने यह कहकर फिल्म का विरोध किया था कि इसमें ‘लव जिहाद’ की कहानी है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। फिल्म में भले ही एक हिंदू लड़की और मुसलिम लड़के की प्रेम कहानी दिखाई गई है, लेकिन फिल्म के अंत में यह कहानी बाढ़ में फंसे लोगों की जिंदगी की जद्दोजहद पर खत्म होती है। 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ को फिल्म के केंद्र में रखा गया है।

‘केदारनाथ’ मध्यांतर तक बेहद धीमी रफ्तार से चलती है। निर्देशक ने हिंदुओं के पवित्र तीर्थ केदारनाथ के आसपास की जिंदगी को दिखाने पर ज्यादा ध्यान दिया है और मूल कहानी पर कम। यानी भूमिका बड़ी हो गई है और कहानी छोटी। फिल्म में एक मुसलिम लड़का है मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत)। वो पिट्ठू का काम करता है। पिट्ठू यानी वे लोग जो बूढ़े या उम्रदराज यात्रियों को अपनी पीठ पर लादकर केदारनाथ के दर्शन कराने ले जाते हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि मुसलिम होते हुए भी मंसूर नाम का यह पिट्ठू भोलेनाथ का भक्त है। एक दिन मंसूर की मुलाकात होती है मुक्कू (सारा अली खान) से। मुक्कू क्रिकेट की शौकीन है और भारत को हारता हुआ नहीं देख सकती। घर वाले मौका न दें तो बाजार में जाकर टीवी पर क्रिकेट मैच देखती है। मंसूर भी क्रिकेट का दीवाना है। दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है, लेकिन परिवार और समाज को उनका प्यार मंजूर नहीं। इसी बीच उत्तराखंड में बाढ़ आ जाती है। सैकड़ों लोग बाढ़ में बह जाते हैं और मकान धराशायी हो जाते हैं। इस बाढ़ में मंसूर और मुक्कू का क्या होगा, यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बेहद अच्छी है, जोकि हिमालय की स्वच्छता और अलौकिकता का अहसास कराती है। एक गाना भी अच्छा है ‘नमो शंकरा’ बोल वाला। सुशांत सिंह राजपूत ने ऐसे शख्स का किरदार निभाया है जो आम पहाड़वासियों की तरह सीधा-सादा और आस्थावान है। फिल्म में एक जगह यह मुद्दा भी उठाया गया है कि हिमालय में बसे तीर्थों पर कितना निर्माण कार्य हो और कितने होटल बनें कि पर्यावरण का संतुलन न बिगड़े। हालांकि यह मुद्दा पूरी तरह से उभर नहीं पाया।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App