Ishq, Dard & Cinema: हिंदी सिनेमा लंबे समय तक कहानियां एकतरफ़ा नज़रिए से सुनाता आया है। खासकर तब, जब कहानी में एक पुरुष और दो महिलाएं होती हैं। यहां एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को कभी मजबूरी कहा गया, कभी हालात की देन और कई बार तो इसे सीधे-सीधे हंसी का ज़रिया बना दिया गया।

लेकिन इन सबके बीच एक पैटर्न बार-बार दोहराया गया। जब कहानी में एक आदमी और दो औरतें होती हैं, तो कुर्बानी हमेशा… औरत से ही मांगी जाती है।

आज हम ऐसी तीन फिल्मों का ज़िक्र करने वाले हैं जिसमें कुर्बानी देने वाली औरत का नाम होता है- राधा।

इन फिल्मों में औरत के पास ना ग़ुस्सा है, ना बाहर निकलने का रास्ता, ना नई ज़िंदगी शुरू करने का हक़। पुरुष की बेवफ़ाई को “गलती”, “मजबूरी” या “सिचुएशन” कहा गया, और औरत के रिएक्शन को “ओवर इमोशनल”।

आज हम बात करेंगे बॉलीवुड की 80 की दशक में आई तीन ऐसी फिल्मों की, जहां हर बार राधा ने मौत को चुना, और आदमी… हर बार बच निकला।

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नसीब अपना अपना (1986)

ऋषि कपूर के किरदार किशन की शादी उसके पिता उसकी मर्ज़ी के खिलाफ गांव की सीधी-सादी लड़की चंदो से करा देते हैं। वो उसे पसंद नहीं करता, शहर आता है और राधा (फराह नाज़) से प्यार कर बैठता है। बिना सच्चाई बताए, उससे शादी भी कर लेता है।

चंदो पति को ढूँढते हुए शहर आती है और उसी घर में नौकरानी बनकर रहने लगती है- जहां राधा उसे “मॉडर्न” बनाती है। फिल्म ये जताती है कि चंदो के मॉडर्न होते ही किशन को अपनी “गलती” का एहसास होता है। और जब राधा को सच्चाई पता चलती है, तो वो खुद को गोली मार लेती है।

सवाल ये नहीं कि राधा मरी। सवाल ये है कि उसके पास इस रिश्ते से बाहर निकलने का विकल्प क्यों नहीं था? चंदो भी अपनी ज़िंदगी चुन सकती थी। लेकिन दोनों के लिए रास्ता सिर्फ़ त्याग और मौत ही क्यों था?

सौतन (1983)

राजेश खन्ना, टीना मुनीम और पद्मिनी कोल्हापुरे की इस फिल्म में श्याम और रुक्मिणी की लव मैरिज होती है। लेकिन रुक्मिणी मां नहीं बन सकती। उसके सेल्फ रिस्पेक्ट को घमंड कहा गया और मां ना बन पाने को कमी बताया गया। श्याम, राधा के करीब जाता है- मगर इसे ना धोखा कहा जाता है, ना गुनाह। वो तो बस… हालात हैं।

राधा खुद को “दासी” कहती है। रुक्मिणी-श्याम के रिश्ते को “मंदिर”। वो कहती है कि श्याम, रुक्मिणी के पति हैं और मेरे परमेश्वर हैं। अंत में, राधा ज़हर खाकर जान दे देती है। उसकी मौत के बाद पति-पत्नी फिर एक हो जाते हैं। यहां भी एक औरत मरती है तभी घर बचता है।

मांग भरो सजना (1980)

रेखा, मौसमी चटर्जी और जीतेंद्र कुमार की फिल्म- मांग भरो सजना। इसमें प्रेमिका को मरा समझकर पुरुष दूसरी शादी कर लेता है। बच्चा भी हो जाता है। लेकिन जब उसकी प्रेमिका राधा लौटती है, तो वो उसे भी पत्नी की तरह दूसरे घर में रखता है। यहां तक कि वो गर्भवती भी हो जाती है। सच्चाई सामने आती है… और यहाँ भी राधा ज़हर खाकर मर जाती है। उसका बच्चा पहली पत्नी पालती है। और पति एक बार फिर सुरक्षित रहता है।

ये सिर्फ़ संयोग नहीं है। ये एक साफ पैटर्न है। तीनों फिल्मों में- शादीशुदा पुरुष अफेयर करता है। दूसरी औरत को कुर्बान किया जाता है। पहली पत्नी को इस तरह “न्याय” मिलता है। और पुरुष से कभी जवाबदेही नहीं मांगी जाती। वो तो बस एक ट्रॉफी बन जाता है- देखो, कौन जीतेगा? और कौन अपनी जान देगा?

और भी उदाहरण हैं जैसे- बसेरा में राखी गुलज़ार का किरदार मानसिक बीमारी से जूझता है। शशि कपूर उसकी बहन रेखा से शादी कर लेता है। जब पहली पत्नी ठीक होकर लौटती है- तो उसे नई ज़िंदगी चुनने का मौका नहीं दिया जाता। फिल्म में दिखाया जाता है कि वो बहन की खुशी के लिए “मेंटल अनस्टेबल” होने का अभिनय करती है और वापस मेंटल हॉस्पिटल चली जाती है। अगर यही रिवर्स करके देखें तो क्या पुरुष के मेंटल हॉस्पिटल में एडमिट होने पर उसकी पत्नी को ये हक मिलता कि वो किसी और से शादी कर ले।

स्मिता पाटिल, श्रीदेवी और राजेश खन्ना की फिल्म नज़राना में भी श्रीदेवी, “घर बचाने” के लिए आत्महत्या कर लेती है।

राधा-कृष्ण की प्रेम कहानी का गलत प्रेज़ेंटेशन

इन फिल्मों में राधा मरते-मरते कहती है- “राधा कभी कृष्ण की हो नहीं सकती।” लेकिन कृष्ण-राधा के प्रसंग में जो कहानी सामने है उसमें कृष्ण के जाने के बाद राधा ने खुद को खत्म नहीं किया था। और कृष्ण ने कभी किसी को धोखा नहीं दिया।

हिंदी सिनेमा ने राधा के नाम पर पुरुषों की चीटिंग को जस्टिफाई किया और औरत की मौत को महिमा मंडित किया।

बाद में सिनेमा बदला… थोड़ा सा

90 के दशक तक आते-आते औरतों का मरना कम हुआ। लेकिन कुर्बानी अब भी औरत ही देती रही। जुदाई में उर्मिला मातोंडकर ज़िंदा तो रहती है, मगर कॉन्फिडेंस से भरी औरत अंत में सिंगल मदर बनकर अकेली लौटती है।

साजन चले ससुराल, बीवी नंबर वन, मस्ती, नो एंट्री और बाद में किस किसको प्यार करूं– यहाँ शादी के रिश्ते का मज़ाक बनाया गया। पुरुष की चीटिंग को कॉमेडी और धोखे को बस एक “गलती” कहा गया।

सिनेमा ये कहता है कि वो समाज से कहानियां उठाता है। और समाज कहता है कि वो सिनेमा से सीखता है। ये ब्लेम गेम चलता रहेगा- और सोच… यूं ही ज़हर पीती रहेगी।