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नंदाः बेटी तो पढ़ना चाहती थी मगर…

दुनिया मनमोहन देसाई की फैन थी और मनमोहन देसाई नंदा के। वे नंदा से खामोशी से मोहब्बत करते थे। लंबा समय लगा मनमोहन देसाई को नंदा से यह कहने में कि वह उनसे प्यार करते हैं। दोनों ने 1992 में सगाई की। मगर शादी से पहले ही मनमोहन देसाई दुनिया छोड़ गए और नंदा वापस अपनी दुनिया में एकाकी हो गई। नंदा को गुजरे परसों छह साल हो गए।

Author Published on: March 27, 2020 1:56 AM
नंदा की रुचि एक्टिंग में नहीं थी। वह पढ़ना चाहती थी।

गणेशनंदन तिवारी
फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी कई अभिनेत्रियां रही हैं जिन्हें मजबूरी में अभिनय की दुनिया में आना पड़ा। मीना कुमारी, मधुबाला, नरगिस ऐसी ही अभिनेत्रियां थीं, जो परिवार को आर्थिक संकटों से बचाने के लिए मुंह पर मेकअप लगा आर्कलाइटों के सामने खड़ी हुईं। उन्होंने परिवार को आर्थिक संकटों से उबारा और समाज में प्रतिष्ठा दिलाई। ऐसी ही एक अभिनेत्री थी नंदा। नंदा फिल्मी परिवार से थी। भारत की आजादी के चार दिन बाद 19 अगस्त, 1947 को उनके अभिनेता, निमार्ता, निर्देशक पिता मास्टर विनायक का निधन हो गया।

नंदा पढ़ना चाहती थी। 1947 में उनके पिता मराठी फिल्म ‘मंदिर’ बना रहे थे। फिल्म में एक लड़के की भूमिका थी, जिसे वह नंदा से करवाना चाहते थे। मगर नंदा की रुचि एक्टिंग में नहीं थी। वह पढ़ना चाहती थी। पिता के जोर देने पर नंदा ने रो-रो कर मां से शिकायत की तो मां सुशीला ने कहा कि यह तुम्हारी पहली और आखिरी फिल्म होगी। इसके बाद एक्टिंग नहीं। नंदा ने उसमें लड़के की भूमिका निभाई।

पिता के निधन के बाद पता चला कि उन्होंने फिल्म बनाने के लिए कर्ज लिया है। लिहाजा परिवार को उसे चुकाना पड़ा। बंगला, गाड़ी सब बिक गए। परिवार सड़क पर आ गया। सात संतानों को लेकर मां सुशीला मुंबई के ताड़देव इलाके में बहन के पास गई, जहां उन्हें रहने की जगह मिल गई। इसके बाद पैदा हुए हालात ने नंदा को पढ़ाई के बजाय मुंह पर मेकअप लगाने पर मजबूर कर दिया। नंदा के पढ़ने और आगे बढ़ने का सपना कहीं खो गया। 1948 में ‘मंदिर’ रिलीज हुई, तो नंदा को मराठी फिल्मों में काम मिलने लगा। मास्टर विनायक के भाई वी शांताराम ने उन्हें फिल्म ‘तूफान और दिया’ (1956) में हीरोइन बनाया। फिर मिली एवीएम की ‘छोटी बहन’ (1957) जिसमें ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना…’ जैसा गाना हिट हुआ।

हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह अनोखी घटना थी। आमतौर पर हीरो-हीरोइनों को खून से खत लिखने के खूब किस्से हैं। मगर ‘छोटी बहन’ देखकर देश भर से नंदा के लिए राखियां आईं। नंदा अपने ऑटोग्राफ के साथ उन राखियों को भेजने वालों को लौटाती थीं। आज भी रक्षाबंधन पर यह गाना खूब बजता है। नंदा की ‘भाभी’ हिट हुई और उसका गाना ‘चली चली रे पतंग मेरी चली रे…’ खूब लोकप्रिय हुआ। नंदा इसके बाद बहन और भाभी की भूमिकाओं में कैद होने लगीं। महत्वाकांक्षी न होने के कारण नंदा ने धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, मनोज कुमार, शशि कपूर, जगदीप जैसे नए कलाकारों की हीरोइन बनना कबूल किया। शशि कपूर के साथ उन्होंने आठ फिल्में साइन की थी। इनमें से ‘जब जब फूल खिले’ सुपर हिट हुई। इसका गाना ‘परदेसियों से न अंखियां मिलाना…’ ट्रेनों में गवैयों ने खूब गाया। यह गाना आज भी ट्रेनों में सुनने को मिल जाता है। एक ओर नंदा ने सुरीले गानों वाली फिल्में कीं, तो दूसरी ओर बिना गानों वाली ‘कानून’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी हिट फिल्में भी। मगर नंदा का दिल फिल्मी दुनिया में नहीं लगा। 1993 की ‘मजदूर’ के बाद उन्होंने फिल्मों की दुनिया से खुद को अलग कर लिया और बाद में संन्यासिनों-सा जीवन जिया।

नंदा (8 जनवरी, 1939- 25 मार्च 2014)

 

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