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हमारी याद आएगीः एक मसखरे का आखिरी मजाक

‘जौहर महमूद इन गोवा’, ‘जौहर इन कश्मीर’, ‘जौहर इन बॉम्बे’, ‘मेरा नाम जौहर’, ‘जौहर महमूद इन हांग कांग’ जैसी फिल्मों से उन्होंने खूब लोकप्रियता बटोरी थी। बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म ‘अफसाना’ (1951) की कहानी जौहर ने लिखी थी।

अभिनेता इंद्र सेन जौहर

इंद्र सेन जौहर ऐसे हंसोड़ थे, जिन्हें हंसाने के साथ दर्शकों को चौंकाना अच्छा लगता था। पढ़े-लिखे थे। अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में एमए। फिर एलएलबी। महमूद, जॉनी वाकर जैसे हास्य कलाकार खूब मशहूर हुए, मगर जौहर की बात ही कुछ और थी। आपातकाल और नसबंदी में हुई ज्यादतियों पर बनी ‘नसबंदी’ (1978) उनके द्वारा निर्देशित आखिरी फिल्म थी। 1949 से लेकर 1984 तक फिल्मों में सक्रिय रहे जौहर निर्माता यश जौहर (करण जौहर के पिता) के बड़े भाई थे। रविवार को उनकी सौवीं जयंती है।

खुद को श्रेष्ठ मानने वाले आइएस जौहर दूसरों की फिल्मों का मखौल उड़ाते थे। कहते थे मेरी फिल्में कम से कम लोगों को हंसाती तो हैं। कहानियां खुद लिख लेते थे, निर्देशन, एक्टिंग भी खुद कर लेते थे। स्टार सिस्टम में भरोसा नहीं था। कोई फिल्म स्टार हिट हुआ तो जौहर ने अपनी फिल्म में उसका डुप्लीकेट खड़ा कर दिया। जौहर ने अपने नाम से बनी फिल्मों की लाइन लगा दी थी। ‘जौहर महमूद इन गोवा’, ‘जौहर इन कश्मीर’, ‘जौहर इन बॉम्बे’, ‘मेरा नाम जौहर’, ‘जौहर महमूद इन हांग कांग’ जैसी फिल्मों से उन्होंने खूब लोकप्रियता बटोरी थी। बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म ‘अफसाना’ (1951) की कहानी जौहर ने लिखी थी। बीआर के छोटे भाई और जानेमाने निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा जौहर के असिस्टेंट थे। उन्हीं से यश चोपड़ा ने फिल्म निर्माण के गुर सीखे। यश चोपड़ा की शुरुआती फिल्मों (धूल का फूल 1959 और धर्मपुत्र 1961) में जौहर के तेवर थे। जब दोनों फिल्में विवादों में फंसी तो यश चोपड़ा ने रोमांटिक फिल्में बनानी शुरू कर दी थी।

अपनी फिल्मों में महंगे स्टारों को साइन करने के बजाय जौहर ने उनकी शक्ल से मिलते-जुलते कलाकारों को अनिताभ बच्चन (अमिताभ बच्चन), शत्रुबिन सिन्हा (शत्रुघ्न सिन्हा), राकेश खन्ना (राजेश खन्ना), सेवानंद (देव आनंद), कनौज कुमार (मनोज कुमार) नाम से अपनी फिल्मों ‘नसबंदी’ और ‘5 राइफल्स’ में पेश किया। ‘5 राइफल्स’ में अजीज नाजां का गाया ‘झूम बराबर झूम शराबी…’ खूब लोकप्रिय हुआ था।

‘एक थी लड़की’ (1949) से अभिनय में उतरे जौहर ने इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल और नसबंदी योजना को लेकर एक मजाकिया फिल्म ‘नसबंदी’(1978) बनाई थी। फिल्म इंदीवर के लिखे गाने ‘गांधी तेरे देश में ये कैसा अत्याचार…जो भी हुकूमत जुल्म करेगी उसकी होगी हार…’ (किशोर कुमार) से शुरू होती है। गाने में आपातकाल, मीसा कानून और नसबंदी योजना का जमकर मखौल उड़ाया था। मगर मशहूर मसखरे का यह मजाक आखिरी मजाक बन गया। मजाक करना तो दूर, उन्होंने फिल्म निर्देशन ही छोड़ दिया।

‘गांधी तेरे…’ गाने की शुरुआत में आपातकाल, मीसा और नसबंदी की आलोचना और अंतिम हिस्से में इसके विरोध में लड़ने वाले नेताओं का गुणगान था। इंदिरा गांधी की सरकार बदल गई थी। मोरारजी देसाई की सरकार में तब सूचना और प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवानी थे। मगर सत्ता का मिजाज नहीं बदला और जौहर की फिल्म भी सेंसर में फंसी। उसमें काटपीट भी हुई। इस गाने का अंतिम हिस्सा सेंसर ने काट दिया और सिर्फ जयप्रकाश नारायण की फोटो भर रहने दी क्योंकि वह सरकार का हिस्सा नहीं थे।

गाने के इस अंतिम हिस्से में… प्रकाश लेकर जयप्रकाश आए… विजयलक्ष्मी पंडित ने जनता का मनोबल बढ़ाया, राजनारायण ने नामुमकिन को मुमकिन बनाया, प्रजातंत्र को नवजीवन देने आए जगजीवनराम, इल्जामों की जंजीरें तोड़कर आए जॉर्ज फर्नाडिज, मोरारजी के आने से तकदीरें चमक उठीं, चरण सिंह और चंद्रशेखर ने दिलों को जीता, अटलबिहारी, आडवानी, नाना ने किया उद्धार… जैसी लाइनें थीं। गाया था किशोर कुमार ने, जिनके गाने आपातकाल के दौरान ऑल इंडिया रेडियो पर बैन कर दिए गए थे। सेंसर ने यह पूरा हिस्सा काट डाला। आहत जौहर ने इसके बाद फिल्में बनानी ही छोड़ दी।

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