बोल्ड और इंटिमेट सीन आज फिल्मों और वेब सीरीज का आम हिस्सा बन चुके हैं। इन सीन की शूटिंग के दौरान सेट पर इंटिमेसी डायरेक्टर से लेकर तय प्रोटोकॉल तक का पालन किया जाता है। लेकिन अक्सर रिलीज से पहले सेंसर बोर्ड इस तरह के सीन पर कैंची चला देता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब सेंसर के नियम पहले से मौजूद हैं, तो फिर मेकर्स ऐसे सीन शूट ही क्यों करते हैं? क्या उन्हें पहले से नियमों की जानकारी नहीं होती या इसके पीछे कोई और वजह होती है? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए हमने इंटिमेसी डायरेक्टर आस्था खन्ना से खास बातचीत की।

आस्था खन्ना ने बताया कि सेंसर बोर्ड की सर्टिफिकेशन प्रक्रिया सिर्फ लिखे हुए नियमों पर नहीं चलती। किसी सीन को उसके संदर्भ, उसे फिल्माने के तरीके और पूरी फिल्म पर उसके असर को देखकर फैसला लिया जाता है।

फिल्म मेकर्स को सेंसर बोर्ड (CBFC) के नियमों की जानकारी होती है। लेकिन हर सीन को अलग तरीके से देखा जा सकता है। इसलिए मेकर्स कई बार अपनी रचनात्मक सोच के हिसाब से बोल्ड या इंटिमेट सीन शूट करते हैं। उन्हें यह भी पता होता है कि फिल्म की सर्टिफिकेशन के समय सेंसर बोर्ड कुछ सीन पर आपत्ति जता सकता है या उनमें बदलाव करने के लिए कह सकता है।

अगर सेंसर बोर्ड के नियम पहले से तय हैं, तो मेकर्स ऐसे सीन शूट क्यों करते हैं जिन पर आपत्ति हो सकती है? इस सवाल पर आस्था खन्ना ने कहा, “फिल्म बनाना एक रचनात्मक प्रक्रिया है। इसमें कई फैसले कहानी को बेहतर बनाने, किरदारों को वास्तविक दिखाने और भावनाओं को सही तरीके से पेश करने के लिए लिए जाते हैं। सेंसर बोर्ड के नियम एक दिशा जरूर देते हैं, लेकिन फिल्म की कहानी की जरूरत के हिसाब से मेकर्स कई बार ऐसे सीन भी शूट करते हैं जो उन्हें सही और जरूरी लगते हैं।”

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उनका कहना हैक कि कई बार कोई सीन अलग से देखने पर बोल्ड लगता है, लेकिन पूरी फिल्म के संदर्भ में वही सीन कहानी का अहम हिस्सा होता है। इसलिए मेकर्स पहले उसे शूट करते हैं और बाद में सर्टिफिकेशन के दौरान अगर जरूरत पड़े, तो उसमें बदलाव भी करते हैं।

Intimacy Director Astha Khanna

क्या मेकर्स को शूटिंग के दौरान अंदाजा होता है कि कुछ सीन सेंसर बोर्ड बदलवा सकता है या हटवा सकता है? इस सवाल पर उन्होंने कहा, “हां, फिल्म मेकर्स को अक्सर यह अंदाजा होता है कि कुछ सीन सर्टिफिकेशन के दौरान चर्चा का विषय बन सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि वे सीन जरूर हटाए जाएंगे।”

क्या मेकर्स जानबूझकर ज्यादा बोल्ड सीन शूट करते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि बाद में सेंसर कुछ हिस्सा काट देगा? जब आस्था से ये सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, “ऐसा कई बार होता है कि फिल्म मेकर्स एक ही सीन के दो या उससे ज्यादा वर्जन शूट करते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे पहले से सोचकर ऐसा करते हैं कि सेंसर बोर्ड कुछ हिस्सा हटा देगा।”

असल में, यह फिल्म बनाने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। अलग-अलग वर्जन होने से एडिटिंग के समय मेकर्स चुन सकते हैं कि कहानी के लिए कौन-सा सीन सबसे सही रहेगा। अगर बाद में सेंसर बोर्ड किसी बदलाव की सलाह देता है, तो उनके पास पहले से दूसरा विकल्प भी मौजूद होता है।

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सेंसर बोर्ड के फैसलों का फिल्म की क्रिएटिव आजादी पर पड़ने वाले असर को लेकर जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि
सेंसर बोर्ड के फैसलों का असर इस बात पर जरूर पड़ता है कि फिल्म दर्शकों तक किस रूप में पहुंचेगी। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री लगातार यह कोशिश करती है कि रचनात्मक आजादी, सेंसर के नियमों और दर्शकों की भावनाओं के बीच सही संतुलन बना रहे। ज्यादातर फिल्म मेकर्स चाहते हैं कि उनकी कहानी बिना उसकी मूल भावना खोए दर्शकों तक पहुंचे, इसलिए वे सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया के दायरे में रहकर काम करते हैं।

क्या सेंसर बोर्ड के कट्स से कहानी और किरदारों पर असर पड़ता है?

इस सवाल पर उन्होंने कहा, “हां, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जिस सीन में बदलाव किया गया है, वह फिल्म के लिए कितना अहम था। कई बार छोटे-मोटे बदलाव से कहानी पर कोई खास असर नहीं पड़ता, लेकिन कुछ सीन ऐसे होते हैं जो किरदारों की सोच, उनकी भावनाओं या कहानी के महत्वपूर्ण पहलुओं को समझाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसे सीन हटने या बदलने से फिल्म का असर कुछ हद तक बदल सकता है।”

केवल बोल्डनेस दिखाना नहीं होता मेकर्स का मकसद

आस्था ने आगे कहा, “खासकर इंटिमेसी सीन के बारे में मेरा मानना है कि उनका मकसद सिर्फ बोल्डनेस दिखाना नहीं होता, बल्कि उनके जरिए दर्शकों को किरदारों के रिश्ते, भावनाएं और उनकी सोच समझाई जाती है। इसलिए मैं कोशिश करती हूं कि ऐसे सीन शुरू से ही सेंसर बोर्ड के दिशा-निर्देशों के अनुसार बनाए जाएं, ताकि वे फाइनल फिल्म का हिस्सा बन सकें और कहानी को मजबूत करें।”

क्या फिल्म मेकर्स फिल्म जमा करने से पहले सेंसर बोर्ड से अनौपचारिक सलाह लेते हैं? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि सीधे तौर पर सेंसर बोर्ड (CBFC) से अनौपचारिक सलाह ली जाती है या नहीं, इस पर कुछ कहना मुश्किल है। हालांकि, फिल्म इंडस्ट्री में निर्माता, निर्देशक और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया की जानकारी रखने वाले लोगों के बीच अक्सर चर्चा होती रहती है। इन चर्चाओं से मेकर्स को नियमों को बेहतर ढंग से समझने और फिल्म की शूटिंग व एडिटिंग के दौरान सही फैसले लेने में मदद मिलती है।