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जब जॉनी ने शोहरत लुटाई, चवन्नी बचाई

मुंबई फिल्मजगत में संघर्ष करने वाला हर कलाकार एक सपना जरूर देखता है कि उसकी फिल्म सिनेमाघर में लगते ही लोग उसके फैन बन जाएं।

Author May 12, 2017 6:03 AM
बदरुद्दीन काजी (जॉनी वाकर)

गणेशनंदन तिवारी
मुंबई फिल्मजगत में संघर्ष करने वाला हर कलाकार एक सपना जरूर देखता है कि उसकी फिल्म सिनेमाघर में लगते ही लोग उसके फैन बन जाएं। फिल्म के प्रेस शो के बाद ही फोटोग्राफर उसकी तसवीरें और पत्रकार उसका इंटरव्यू लेने के लिए टूट पड़े और वह रातोरात चर्चित हो जाए। बदरुद्दीन काजी (जॉनी वाकर)11 भाई बहनों के भरे पूरे परिवार में पले बढ़े। पिता इंदौर (मध्य प्रदेश) मिल में काम करते थे। जब यह मिल बिक गई तो पिता की नौकरी चली गई। परिवार महाराष्ट्र के इगतपुरी, बाद में नासिक और अंत में मुंबई के उपनगर माहिम आ गया। जॉनी वाकर मखदूमशाह बाबा की दरगाह के पास जोकर का भेष बना कर लोगों का मनोरंजन कर कुछ पैसा कमाने लगे।

सहायक निर्देशक याकूब हसन रिजवी की सिफारिश से उन्हें एक फिल्म ‘जश्न’ में काम मिला। फिर ‘हलचल’ में छोटी सी भूमिका की। मगर जॉनी को बड़ी सफलता नहीं मिली। हां, सफल होने का सपना वह जरूर देखते थे। चेतन आनंद की फिल्म ‘आंधियां’ (1955) में जॉनी को एक पियक्कड़ मस्तराम की भूमिका मिली। लिबर्टी सिनेमा में इस फिल्म का प्रीमियर था। जॉनी को उसमें शामिल होना था। परेशानी यह थी कि जॉनी की जेब में सिर्फ एक चवन्नी थी। माहिम से लिबर्टी तक का एक तरफ का ट्रेन का किराया ही चवन्नी था। जॉनी ने लिबर्टी पैदल जाना तय किया ताकि रात को वह ट्रेन से वापस आ सकें।

शाम को प्रीमियर शुरू हुआ। इंटरवल के बाद प्रेस फोटोग्राफर और पत्रकार जॉनी को ढूंढ़ रहे थे क्योंकि मस्तराम की उन्होंने पियक्कड़ मस्तराम की भूमिका को जीवंत कर दिया था। मस्तराम का किरदार शराबी नहीं था। उसका कहना था कि उसके बाप दादाओं ने इतनी पी कि उसका असर उन पर हो गया है। वह बिना पिये ही शराबी नजर आते हैं।
इंटरवल में फोटोग्राफरों और पत्रकारों ने जॉनी को घेर लिया और उनसे कहा कि वह फिल्म खत्म होने के बाद जाए नहीं। उनका इंटरव्यू लेना है इसलिए वे रुके रहें। जॉनी ने रातोरात मशहूर होने का जो सपना देखा था उसके सच होने का समय आ गया था। मगर खुश होने के बजाय जॉनी परेशान हो गए। उन्होंने सोचा कि अगर वह रुके तो आखिरी ट्रेन निकल जाएगी और उन्हें रात में पैदल माहिम तक जाना पड़ेगा।

लिहाजा फिल्म खत्म होने से पहले ही जॉनी बिना किसी को बताए सिनेमाघर से बाहर आ गए। वह ट्रेन पकड़ने जा ही रहे थे कि आशा सचदेव और उनके पति की गाड़ी उनके पास रुकी। आशा ने जॉनी से कहा कि वह उन्हें माहिम छोड़ देंगी क्योंकि वह भी वहीं रहती थीं। इस तरह जॉनी ने चवन्नी बचा ली। मगर इस चवन्नी पर उन्होंने अपने जीवन का सपना और शोहरत कुर्बान करना पड़ा था, जिसका उन्हें जीवन भर अफसोस रहा।

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