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Blackmail Movie Review: अपारंपरिक हास्य

कुछ साल पहले जब अभिनय देव ने ‘डेल्ही बेली’ का निर्देशन किया था, तो उसे एक काला हास्य यानी ‘ब्लैक ह्यूमर’ के रूप में सराहा गया था। यानी ऐसी हास्य फिल्म जिसमें हंसी के लिए कुछ विचित्र और अपारंपरिक तरीके इस्तेमाल किया जाते हों।

इमरान खान

कलाकार-इरफान खान, कीर्ति कुल्हारी, दिव्या दत्ता, अरुणोदय सिंह, ओमी वैद्य, गजराज राव, उर्मिला मातोंडकर

कुछ साल पहले जब अभिनय देव ने ‘डेल्ही बेली’ का निर्देशन किया था, तो उसे एक काला हास्य यानी ‘ब्लैक ह्यूमर’ के रूप में सराहा गया था। यानी ऐसी हास्य फिल्म जिसमें हंसी के लिए कुछ विचित्र और अपारंपरिक तरीके इस्तेमाल किया जाते हों। उनकी नई फिल्म भी उसी शैली की है। सोचिए किसी और फिल्म में ऐसा हो सकता है कि कोई पति अपनी पत्नी को खुश करने के लिए गुलदस्ता देना चाहे तो उसे कब्रिस्तान से चुराए। ‘ब्लैकमेल’ में ऐसा होता है क्योंकि शहर में बाजार बंद हो चुका है और पत्नी को खुश करने के लिए गुलदस्ता देने के लिए कोई और रास्ता नही हैं। हास्य पैदा करने के और कई अपारंपरिक तरीके इस फिल्म में हैं।

‘ब्लैकमेल’ कॉमेडी है। लेकिन साथ ही यह थ्रिलर भी है और इसमें तीन हत्याएं भी होती हैं। ये देव (इरफान खान) नाम के एक ऐसे व्यक्ति के इर्दगिर्द घूमती है जो टॉयलेट पेपर बनाने वाली एक कंपनी में काम करता है। देव एक आम आदमी है और अपने बॉस (ओमी वैद्य) की अजीबोगरीब सनक के मुताबिक काम करने को बाध्य है। उसकी निजी जिंदगी भी रसमय नहीं हैं। एक दिन वह पाता है उसकी पत्नी रीना (कीर्ति कुल्हारी) रंजीत (अरुणोदय सिंह) नाम के एक शख्स के इश्क कर रही है। साधारण आदमी तो ये देखकर गुस्से से पागल जाएगा या किसी का खून कर देगा। लेकिन देव ऐसा नहीं करता। वह अपनी पत्नी के प्रेमी को ब्लैकमेल करना शुरू करता है। और इसके बाद कई लोग एक दूसरे से ब्लैकमेल ब्लैकमेल खेलने लगते हैं। रंजीत अपनी प्रेमिका यानी रीना से ही ब्लैकमेल करने लगता है। उधर देव के आॅफिस के दो लोग उससे यानी देव को ही ब्लैकमेल करने की कोशिश करते है। ब्लैकमेल से मिलने वाले पैसे की चोरी भी होने लगती है। इनमें से एक शख्स ब्लैकमेलर को पकड़ने के लिए एक निजी जासूस की सेवाएं लेता है। आगे चलकर मालूम होता है कि वह निजी जासूस खुद में ब्लैकमेलर है और हथियारों का सप्लायर भी।

‘ब्लैकमेल’ में बड़े सूक्ष्म तरीके से समाज पर टिप्पणी भी है। लेकिन मजाकिया अंदाज में। कैसे एक शख्स हालात के दबाव में अपराध की तरफ जाता है। लेकिन साधारण आदमी अपराध भी करता है तो बहुत जल्द उसमें फंस भी जाता है। जैसा देव के साथ होता है। देव एक आम आदमी है। लेकिन बीवी की बेवफाई उसे एक छोटा-मोटा अपराधी बना देती है।
इरफान ने अपनी जिंदगी का एक और शानदार अभिनय किया है। बिना चुटकुलेबाज हुए वे हास्य पैदा करत देते हैं। उनके साथ अरुणोदय सिंह ने भी बहुत अच्छा काम है। उनके चरित्र में दोनों चीजें हैं। थोड़ी-सी खलनायकी और थोड़ा सा मसखरापन। कीर्ति कुल्हारी के पास करने के लिए कुछ खास नहीं है, सिवा एक बेवफा बीवी का किरदार निभाने के। दिव्या दत्ता की भूमिका रंजीत की पत्नी के रूप में छोटी है, पर असरदार है। एक निजी जासूस के रूप में गजराज राव ने भी अच्छी भूमिका निभाई है।

पर साथ में यह भी जोड़ना पड़ेगा कि चावला नाम के जिस शख्स के इर्दगिर्द इस जासूसी किरदार को बुना गया है उसमें एक खास तरह का निर्देशकीय कौशल है। गजराज राव के इस आशय कई संवाद हैं कि ‘चावला ये कम करा देगा चावला हथियार भी बेचता है.. पर चावला कौन है यह साफ नहीं होता। हालांकि दर्शकों को लगता है कि चावला वही यानी गजराज है। बेशक यह निर्देशक का दिमाग है जो साधारण किरदार को भी थोड़ा रहस्यमय बना देता है। फिल्म में उर्मिला मातोंडकर पर एक आइटम नंबर भी फिल्माया गया है। ‘ब्लैकमेल’ एक बदलते वक्त की कॉमेडी है जो बेवफाई के माहौल में रची गई है। इस तरह की सोच पहले मुश्किल थी कि कोई पत्नी अपनी बेवफा बीवी के आशिक को ब्लैकमेल करेगा या आॅफिस की कोई लड़की अपने सहकर्मी को ब्लैकमेल करने का प्रयास करेगी। लड़कों के साथ लड़किया भी ब्लैकमेलर हो सकती है इस तरह की कल्पना कुछ समय पहले तक के भारतीय समाज में कठिन थी। लेकिन जिस तरीके जमाना बदल रहा है उसमें अपराधी और अपराध के अंदाज भी बदल रहे हैं। कौन कब मौका मिलते अपराध की तरफ चल पड़े, कह नहीं सकते। ‘ब्लैकमेल’ इधर भी संकेत करती है।

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