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Bhoomi Movie Review: बलात्तकार और बदला

यह संजय दत्त की वापसी वाली फिल्म मानी जा रही है। यानी सजा काटकर आने के बाद उनकी पहली फिल्म।

यह संजय दत्त की वापसी वाली फिल्म मानी जा रही है। यानी सजा काटकर आने के बाद उनकी पहली फिल्म। और इसमें कोई शक नहीं कि निर्देशक की पूरी कोशिश रही है कि उनकी छवि, जो सजा के बावजूद एक हद तक बरकरार है, को भुनाया जाए। क्या इसमें सफलता मिलेगी?
मुश्किल यह है कि कथ्य और विषय के हिसाब से यह पुराने किस्म की फॉर्मूला फिल्म है, जिसमें एक पिता जिसका नाम अरुण सचदेवा (संजय दत्त) है, अपनी बेटी भूमि (अदिति राव हैदरी) के साथ हुए बलात्कार का बदला लेता है। यानी ‘भूमि’ बदले की भावना वाली फिल्म है और इसी कारण इसमें हिंसा के कई दृश्य हैं। हालांकि इसी विषय पर ऋतिक रोशन की फिल्म ‘काबिल’ भी पिछले दिनों आई है लेकिन ‘भूमि’ कुछ अधिक भदेस है। अगर संजय दत्त न होते तो ये अति सामान्य फिल्म मानी जाती।

बहरहाल, फिल्म की कहानी यह है कि सचदेवा की आगरा में जूते की दुकान है। वह विधुर है, लेकिन उसने अपनी बेटी भूमि को बड़े लाड़-प्यार से पाला है। भूमि की शादी होने वाली है और जिस दिन उसका शादी होने वाली है, उसके ठीक एक दिन पहले तीन लोग उसका बलात्कार करते हैं। एक तो है विशाल (पुरु छिब्बर) जो उसके पड़ोस में रहता है लेकिन उससे मन ही मन प्यार करता है। दूसरा है गुलाम, जो एक मवाली है। और तीसरा है धौली (शरद केलकर) जो दोनों का सरदार है।

भूमि का मामला अदालत में जाता है जहां उसे इंसाफ नहीं मिलता। इतनी फिल्म देखने के बाद दर्शकों को अनुमान हो जाता है कि आगे क्या होने वाला है। यानी गैरकानूनी ढंग से बलात्कारियों को सजा दी जाएगी। पर अदालती कार्रवाई और उसके बहुत देर बाद तक इतना रोना-धोना है कि दर्शक के सब्र का बांध टूटने लगता है। गैरकानूनी ढंग से अपराधियों को सजा देने वाला मामला इतना छोटा है कि जो लोग मार-धाड़ और हिंसा वाली फिल्में देखना पसंद भी करते हैं उनको लगता है कि अरे, यह सब इतनी देर से क्यों शुरू हुआ और इतनी जल्दी क्यों खत्म हो गया।

अदालती दृश्य में भी कई तरह की कमजोरियां हैं। आखिर जब बचाव पक्ष की महिला वकील एक बार कह देती है कि मेडिकल जांच में यह साबित हुआ कि बलात्कार हुआ ही नहीं, तो फिर बहस को लंबा करने का क्या औचित्य। क्या इसलिए कि वकील लड़की के चरित्र पर लगातार लांछन लगाए जाए और इससे बदले की पृष्ठभूमि तैयार हो। पर उसके बाद भी रोने-धोने के इतने दृश्य क्यों। फिल्म की लंबाई अगर कुछ कम होती तो यह और बेहतर हो सकती थी।

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