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खुद ‘बैजू बावरा’ बनाना चाहते थे भारत भूषण

‘बैजू बावरा’ को भारत भूषण खुद बनाना चाहते थे, क्योंकि उन्हें संगीत से भी लगाव था। लोगों ने समझाया कि क्यों संखिया (जहर) खाने पर तुले हो। हीरोइन नई और फिल्म का विषय शास्त्रीय संगीत... इसे कौन देखेगा?

Author Published on: June 14, 2019 1:43 AM
‘बैजू बावरा’ को बॉलीवुड की धर्मनिरपेक्षता के उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता है।

गणेशनंदन तिवारी

चेहरे पर अजीब शांति, अपार करुणा, शाश्वत भलमनसाहत के साथ भारत भूषण ने कई ऐतिहासिक किरदारों को परदे पर उतारा। अक्सर उनकी आलोचना होती थी कि उनके चेहरे पर कोई भाव आते ही नहीं। बावजूद इसके भारत भूषण ने फक्कड़ कबीर हो या संगीत प्रेमी बाज बहादुर, बदले की आग में जलने वाला बावरा बैजू हो या मिर्जा गालिब सभी के साथ न्याय किया और जनता ने उन्हें खूब पसंद भी किया।

भारत भूषण के करिअर में आए उत्थान और पतन की कहानी तो हमेशा ही सुनाई जाती है कि कैसे एक के बाद एक हिट देकर खूब पैसा कमाने, मुंबई और पुणे में घर, आलीशान कारें खरीदने वाले भारत भूषण का मुफलिसी में निधन हुआ। उन्होंने सारी फिल्में अपने भाई के नाम से बनाई। उनके नाम पर कुछ नहीं था। मगर इस किस्से में कहीं भारत भूषण के संगीत, साहित्य का शौक और सिनेमा की दुनिया को दिया गया उनका योगदान हाशिए पर चला जाता है। यह बात उपेक्षित रह जाती है कि बंगले और कारें बिकने का जितना मलाल भारत भूषण को नहीं हुआ, उतना अपनी किताबें बेचने पर हुआ था।

‘बैजू बावरा’ को बॉलीवुड की धर्मनिरपेक्षता के उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता है। फिल्म का ‘भजन ओ दुनिया के रखवाले…’ मोहम्मद रफी ने गाया, नौशाद ने उसकी धुन बनाई थी और साहिर लुधियानवी ने उसे लिखा था और तीनों ही मुसलमान थे। मगर ‘बैजू बावरा’ इसलिए भी उल्लेखनीय थी क्योंकि इस फिल्म ने भारत भूषण और मीना कुमारी को फिल्मजगत में जमा दिया था। संगीतकार नौशाद की फिल्म जगत पर पकड़ मजबूत की थी। साथ ही इस धारणा को ध्वस्त कर दिया था फिल्मों में शास्त्रीय संगीत नहीं चलता है।

उस्ताद आमिर खान और डीवी पलुस्कर जैसे शास्त्रीय गायकों की जुगलबंदी ‘आज गावत मन मेरो झूम के…’ फिल्म का आकर्षण थी। ‘बरसात’ (1949) से हिंदी सिनेमा-संगीत का रुख मोड़ देने वाले वाले शंकर- जयकिशन ने ‘बैजू बावरा’ से प्रभावित होकर भारत भूषण की बनाई ‘बंसत बहार’ में अविस्मरणीय संगीत दिया। बैजू और तानसेन की जुगलबंदी से प्रभावित होकर निर्देशक एसएन त्रिपाठी ने 1957 में ‘रानी रूपमति’ में रूपमति और तानसेन की जुगलबंदी करवाई और शास्त्रीय संगीत की ताकत सिनेमा के जरिए सामने रखी। एक तरह से ‘बैजू बावरा’ का असर बाद की कई फिल्मों और उनके संगीत पर हुआ।

‘बैजू बावरा’ को भारत भूषण खुद बनाना चाहते थे, क्योंकि उन्हें संगीत से भी लगाव था। लोगों ने समझाया कि क्यों संखिया (जहर) खाने पर तुले हो। हीरोइन नई और फिल्म का विषय शास्त्रीय संगीत… इसे कौन देखेगा? फाइनेंसर इसमें पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं थे। भारत भूषण खूब भटके। अंत में फिल्मकार विजय भट्ट के पास गए। विजय भट्ट इसमें नरगिस और दिलीप कुमार को लेना चाहते थे। नरगिस साइन की जा चुकी थी। दिलीप कुमार के महंगे मेहनताने को देखते हुए उन्होंने भारत भूषण को फिल्म का हीरो बना दिया। बड़े भाई शंकरभाई भट्ट ने भी विजय भट्ट को रोकने की कोशिश की। तमाम विरोधों के बावजूद ‘बैजू बावरा’ बनी और उसने सफलता के झंडे गाड़ दिए।

फिल्म ने डायमंड जुबिली (60 हफ्ते) मनाई। इसके बाद तो भारत भूषण चोटी के हीरो में शुमार किए जाने लगे थे। निर्माता के रूप में भारत भूषण ने अपने भाई का नाम फिल्मों में दिया था। उन्होंने ‘मीनार’ (1954), ‘बसंत बहार’ (1956, जिसमें भीमसेन जोशी से गवाया) ‘बरसात की रात’ (1960), ‘दूज का चांद’ (1964) जैसी फिल्में बनाई। करिअर के आखिरी दौर में एक्स्ट्रा कलाकार का काम तक करना पड़ा।

भारत भूषण ने ‘कबीर’, ‘सुहागरात’, ‘बैजू बावरा’, ‘बसंत बहार’, ‘रानी रूपमति’, ‘मिर्जा गालिब’, ‘चैतन्य महाप्रभु’, ‘बरसात की एक रात’ जैसी कई फिल्मों में काम किया। लगातार सफलता ने उन्हें चोटी का हीरो बना दिया था। भारत भूषण अभिनीत ‘बैजू बावरा’ हिंदी सिनेमा की उल्लेखनीय फिल्म मानी जाती है, जिसका असर बाद की कई फिल्मों पर दिखाई दिया।

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