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Bhabhi Ji Ghar Par Hain: पहले नहीं बनी थी ‘टीका- मलखान’ की जोड़ी, दीपेश भान ने सुनाई जोड़ी बनने की दिलचस्प कहानी

टीका- मलखान की जोड़ी के मलखान यानि दीपेश भान ने बताया कि उनकी जोड़ी पहले शो में दो या तीन दिन ही आती थी लेकिन जब लोगों ने पंसद करना शुरू किया तो वे हर एपिसोड में आने लगे। पहले दोनों की जोड़ी भी नहीं बनी थी और टीका एक तांत्रिक के किरदार में नज़र आए थे।

bhabhi ji ghar par hain, deepesh bhan, tika malkhanटीका- मलखान की जोड़ी के मलखान यानि दीपेश भान

‘भाभी जी घर पर हैं’ शो कई सालों से दर्शकों का पसंदीदा शो बना हुआ है। इसका हर कलाकार अपनी एक अलग पहचान रखता है। शो में ‘टीका- मलखान की जोड़ी का कोई सानी नहीं है। दोनों साथ रहकर जो हरकतें करते हैं, मनमोहन तिवारी, विभूति नारायण से थप्पड़ खाते हैं, उससे दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाते। इस जोड़ी के बनने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। मलखान का किरदार निभाने वाले दीपेश भान ने ‘द मोई ब्लॉग’ को दिए एक इंटरव्यू में इस जोड़ी के बनने की कहानी बताई।

दीपेश भान ने कहा, ‘शो में मेरा पहला सीन था, टीका और मैं साथ में नहीं थे। और हमें पता भी नहीं था कि हम दोस्त बनेंगे। मेरा पहला सीन अलग शूट हुआ था। उसके बाद एक सीन आता है जिसमें मैं तिवारी जी को लेकर टीका के पास जाता हूं। तब हम एक दूसरे से मिले भी नहीं थे। तिवारी जी को मैं एक पुड़िया देता हूं और कहता हूं कि इससे आपके काम बनेंगे। मैं आपको एक तांत्रिक बाबा के पास लेकर चलता हूं। तांत्रिक का किरदार टीका निभा रहा होता है। दोनों गए वहां और वो सीन अच्छा हुआ। उस सीन के अच्छा होने के बाद हमें दोस्त बना दिया गया।’

दीपेश भान ने बताया कि टीका और मलखान का किरदार शो की शुरुआत में नियमित नहीं था लेकिन जब लोगों ने पसंद करना शुरू किया तो इस जोड़ी को हर एपिसोड में जगह मिलने लगी। उन्होंने बताया, ‘शुरू के चार पांच महीने हम शो में बस तीन चार दिन आते थे और मैं किसी और सीरियल के लिए शूट करता था। लेकिन कहते हैं न कि भगवान हमेशा मदद करते हैं तो शायद मेरी भी भगवान ने सुन ली। ये किरदार तीन चार दिन की जगह 18- 20 दिन आने लगे।’

दीपेश भान का कहना है कि उनकी जोड़ी शो में नमक की तरह है जिसके बिना हर एपिसोड अधूरा है। दीपेश शो में एक जिस बोली का इस्तेमाल करते हैं उनके पीछे की तैयारी के बारे में उनका कहना है, ‘मैंने दिल्ली में चार पांच साल थियेटर किया है। दिल्ली में हर जगह के लोग बसते हैं जिनकी बोली भी अलग- अलग होती है। कुछ लोग थियेटर में भी आते थे तो हमें सिखाया जाता था कि उनसे बात करते वक्त उनकी बोली को भी समझो और सीखो। मैंने सबकी बोली को सीखना शुरू किया और आज मुझे उसका फायदा हो रहा है।’

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