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सिनेमाघरों तक नहीं पहुंची ये फिल्में लेकिन इंटरनेट पर हैं मौजूद, जानिए क्या रहीं न रिलीज होने की वजहें

जब भी किसी फिल्म से गलत संदेश, अश्लीलता, नफरत फैलाने वाली विषयवस्तु की गंध आती है, सेंसर बोर्ड उस फिल्म को या तो प्रदर्शन के लिए प्रतिबंधित कर देता है या फिर उसके दृश्यों पर कैंची चला देता है।
Author नई दिल्ली | July 5, 2017 15:59 pm
भारत के सौ बरस के सिनेमाई इतिहास में कई ऐसी फिल्में बनीं जिनको प्रदर्शन के लिए पर्दा नसीब नहीं हुआ

फिल्म निर्माण के मामले में बॉलीवुड दुनिया के सबसे बड़े उद्योग के रुप में शुमार है। हर साल यहां बड़ी मात्रा में फिल्में बनती और रिलीज होती हैं। कुछ फिल्में फ्लॉप होती हैं, कुछ हिट होती हैं तो कई ऐसी भी फिल्में होती हैं जो बनती तो हैं मगर पर्दे पर नहीं आ पातीं। भारत में फिल्मों को सेंसर करने वाली एक संस्था है सेंसर बोर्ड। जब भी किसी फिल्म से गलत संदेश, अश्लीलता, नफरत फैलाने वाली विषयवस्तु की गंध आती है, सेंसर बोर्ड उस फिल्म को या तो प्रदर्शन के लिए प्रतिबंधित कर देता है या फिर उसके दृश्यों पर कैंची चला देता है। भारत के सौ बरस के सिनेमाई इतिहास में कई ऐसी फिल्में बनीं जिनको प्रदर्शन के लिए पर्दा नसीब नहीं हुआ। हालांकि इंटरनेट के जमाने में यह फिल्में दर्शकों से दूर नहीं रह सकीं और सिनेमा हॉल की बजाय यूट्यूब जैसी साइट्स पर खूब देखी गईं।

इनमें अधिकांशतः अश्लीलता फैलाने या फिर विवादास्पद मसले पर बनने के कारण बड़े पर्दे पर रिलीज नहीं हो पाईं। 1994 में बनीं शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ को उस दौर के हिसाब से कुछ आपत्तिजनक सीन्स होने की वजह से बैन कर दिया था। यह फिल्म कुख्यात डकैत फूलन देवी के जीवन पर आधारित थी। 1996 में दो महिलाओं के बीच परस्पर लेस्बियन रिश्तों पर आधारित कहानी वाली दीपा मेहता की फिल्म ‘फायर’ को धार्मिक कट्टरपंथियों के विरोध करने के चलते बैन कर दिया गया था।हालांकि बाद में इस फिल्म के कई दृश्यों में कांट छांट करके उसे फिर रिलीज कर दिया गया। फिल्म में नंदिता दास और शबाना आजमी मुख्य भूमिका में हैं।

1997 के जोशी-अभ्यंकर सीरियल मर्डर पर बनी अनुराग कश्यप की फिल्म ‘पांच’ को अत्यधिक हिंसक दृश्यों, आपत्तिजनक भाषा और नशे संबंधी विषयवस्तु के चलते बैन कर दिया था। एस हुसैन जैदी की किताब ‘ब्लैक फ्राइडे- द ट्रू स्टोरी ऑफ द बॉम्बे बम ब्लास्ट’ पर बनीं अनुराग कश्यप की फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ भी बॉम्बे हाइकोर्ट के स्टे-ऑर्डर की वजह से आज तक रिलीज नहीं हो सकी। 2005 में गुजरात दंगों पर बनीं फिल्म ‘पॉरजानिया’ को राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बाद भी रिलीज होने की अनुमति नहीं मिली।

इसी विषय पर बनीं एक और फिल्म ‘फिराक़’ को भी पहले रिलीज की अनुमति नहीं मिली थी लेकिन बाद में जब फिल्म रिलीज हुई तो समीक्षकों से लेकर दर्शकों तक सबने इसकी सराहना की। एक भारतीय विधवा के जीवन के श्याम-पृष्ठ को दिखाने वाली फिल्म ‘वॉटर’ को भी काफी विवादों का सामना करना पड़ा था। और इस तरह अनुराग कश्यप की एक और फिल्म विवादों की भेंट चढ़ गई थी। इस फिल्म का विरोध इतना तीव्र था कि कट्टरपंथियों ने फिल्म के सेट्स तक को भारी नुकसान पहुंचाया था।

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