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Bahubali 2 Audience Review: खूबसूरती देखने वालों को खलेगी 3-D वर्जन की कमी, जानिए फिल्‍म के स्‍ट्रांग और वीक प्‍वॉइंट्स

Bahubali 2 Review: बाहुबली-2 की कहानी पहले भाग के मुकाबले कमजोर लगी। फिल्‍म कुछ जगहों पर खासी धीमी हो जाती है।

Author April 28, 2017 17:13 pm
साल 2017 में आई फिल्म बाहुबली-2 का पोस्टर।

एसएस राजमौली की बाहुबली- द कंक्‍लूजन अपने पहले भाग से थोड़ी धीमी है। ऐसा पहले हॉफ तक नहीं लगता, मगर इंटरमिशन के बाद जब फिल्‍म शुरू होती है तो राजमहल में षड़यंत्रों की एक श्रृंखला सी बन जाती है। बाहुबली को अपने विजुअल इफेक्‍ट्स के लिए खूब सराहा गया था, दूसरा भाग इस मामले में उससे भी आगे निकल गया है। नदियां, झरने और पहाड़ इस भाग में भी हैं मगर राजमहल की वास्‍तुकला अद्भुत है। पहले भाग में भल्‍लालदेव को महत्‍वाकांक्षी मगर चतुर दिखाया गया था, मगर दूसरे भाग में वह कपटी हो जाता है। पहला हॉफ अमरेन्‍द्र बाहुबली की गाथा में गुजर जाता है। महेन्‍द्र बाहुबली के हिस्‍से में जंग और शानदार एक्‍शन सीक्‍वेंस आए हैं। फिल्‍म दर्शकों को इतना नहीं चौंकाती, जितना हाइप बनाया गया है। दर्शक अगले कदम का अंदाजा आसानी से लगा सकता है। चाहे वो देवसेना से विवाह करने का भल्‍लालदेव का दांव हो या फिर अमरेन्‍द्र का अपनी मां के खिलाफ जाकर धर्म का पालन करना। धर्म के पालन और स्‍वामी भक्ति की मिसाल बनाए गए कटप्‍पा पूरी सहानुभूति बटोरते हैं। फिल्‍म के कुछ अहम पक्षों पर मेरी राय जरा अलग है।

सिनेमैटोग्राफी और विजुअल इफेक्‍ट्स:

पीरियड फिल्‍मों के साथ सबसे बड़ी समस्‍या उस समय की जीवन-शैली और उपकरणों को सही तरीके से दर्शाना होता है। फिर चाहे वो अमरेन्‍द्र बाहुबली द्वारा लोगों की मदद करने के लिए बनाया गया यंत्र हो या देवसेना को माहिष्‍मती लाते वक्‍त पानी के जहाज का अचानक हवा में उड़ने लगना। कई चीजें ऐसी थीं जो मेरे अलावा थियेटर में मौजूद अन्‍य लोगों के गले भी नहीं उतरीं। भल्‍लालदेव का युद्ध वाहन या यूं कहें चकरी-रथ अपने नए रूप में सामने आया। एक ही तरह तीन वैसे ही तेज धार वाले यंत्र रथ में लगे दिखे, मगर चौंकाया उससे निकलने वाले तीरों ने। एक्‍शन सीन शानदार तरीके से शूट किए गए हैं। इसके अलावा कैमरा आपको वो दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं। यकीनन फिल्‍म की एडिटिंग पर खासी मेहनत की गई है।

कहानी:

बाहुबली-2 की कहानी पहले भाग के मुकाबले कमजोर लगी। फिल्‍म कुछ जगहों पर खासी धीमी हो जाती है, देवसेना और अमरेन्‍द्र का रोमांस बनावटी लगता है। थियेटर से बाहर निकलते वक्‍त एक शख्‍स ने मुझसे कहा, ”एकता कपूर की स्क्रिप्‍ट को राजमौली ने डायरेक्‍ट किया लगता है।” मगर सिंहासन के लिए षड़यंत्र न हो, ऐसा तो किसी महान गाथा में देखने को नहीं मिला। दूसरे भाग में भल्‍लादेव के कैरेक्‍टर को अंडरप्‍ले किया गया है। वरना एक राजा 25 साल तक शासन करे और कुंवारा रह जाए, ऐसा तो नहीं होता। वह भी तब जब देवसेना हमेशा उसके कब्‍जे में रही। तर्क को भावनाओं से ऊपर रखने में राजमौली कामयाब रहे हैं। शिवगामी देवी के चरित्र की आभा उसी तरह चमकती नजर आती है। अब बात करते हैं अमरेन्‍द्र बाहुबली की। पहले हाफ तक फिल्‍म अमरेन्‍द्र के इर्द-गिर्द ही घूमती है, मगर उनका किरदार साउथ की फिल्‍मों के सामान्‍य हीरो जैसा डेवलप किया गया है। दूसरे हाफ में महेन्‍द्र बाहुबली के रूप में एक नया चरित्र सामने आता है, मगर वह अमरेन्‍द्र की परछाई भर है, उस परिधि से बाहर पूरी फिल्‍म में नहीं आ पाता।

अभिनय:

बाहुबली के किरदार में प्रभास जंचते हैं। उनकी आंखें फिल्‍म की भाव-भंगिमा के बारे में बहुत कुछ कहती हैं। भावुक दृश्‍यों में उनका अभिनय जरा कमजोर पड़ता है मगर जहां पराक्रम दिखाने और एक्‍शन की बात आती है, मेरे हिसाब से प्रभास से बेहतर इस किरदार को सिर्फ रजनीकांत ही निभा सकते थे। भल्‍लालदेव के रूप में राणा दग्‍गूबाती के करियर का यह सर्वश्रेष्‍ठ परफॉर्मेंस है। अपने किरदार के साथ वह बेहद सहज नजर आते हैं। चेहरे पर कुटिलता के भाव दर्शक आसानी से पढ़ पाता है। देवसेना का किरदार अदा करने वाली अनुष्‍का पहले हॉफ में बेहद मजबूत दिखती हैं मगर दूसरे हॉफ में अपने किरदार की तरह उनका अभिनय भी मंद पड़ जाता है। तमन्‍ना के पास इस फिल्‍म में कुछ करने को नहीं था, उन्‍हें बमुश्किल 2 मिनट का स्‍क्रीन टाइम मिला है। कटप्‍पा के रोज में सत्‍य राज एक बार फिर सब पर भारी पड़ते हैं। शिवगामी भावुक दृश्‍यों में बेहद अधिकारपूर्ण नजर आती हैं।

निर्देशन:

बाहुबली की शानदार सफलता के बाद राजमौली पर दूसरे भाग में उसी कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती थी। वह इस चुनौती को पार करते दिखते हैं, मगर कुछ जगहों पर फिल्‍म की धीमी रफ्तार निराश करती है। एक शानदार पीरियड फिल्‍म बना चुके राजमौली के लिए दूसरी को आगे बढ़ाना थोड़ा आसान था, लेकिन कुछ सीक्‍वेंस को हटा भी दिया जाता तो कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मसलन पुरानी फिल्‍म के कई शॉट्स इस फिल्‍म में याद दिलाने के लिए इस्‍तेमाल किए गए हैं जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। बाहुबली ने भारतीय सिने दर्शकों के दिल में जो छाप छोड़ी थी, वह इतनी मजबूत थी कि फिल्‍म को करीब 10 मिनट छोटा किया जा सकता था। खैर, फिल्‍म का ट्रीटमेंट शानदार है और किरदार निर्देशक के हिसाब से चलते नजर आते हैं।

संगीत:

फिल्‍म में संगीत के नाम पर ज्‍यादा प्रयोग नहीं किए गए हैं। बैकग्राउंड म्‍यूजिक पहले भाग जितना आकर्षक नहीं है। पहले भाग के क्‍लाइमेक्‍स के दौरान जैसा बैकग्राउंड स्‍कोर था, इस बार वैसा कुछ सुनने को नहीं मिला। फिल्‍म के हिंदी वर्जन में तीन गाने हैं जो कर्णप्रिय हैं, मगर याद नहीं रहते।

Watch Bahubali 2: The Conclusion Movie Trailer here

द कंक्‍लूजन:

मेरी राय में फिल्‍म मनोरंजक है, अगर आप तर्क किनारे रखकर फिल्‍म देखते हैं तो। कई सीन विज्ञान को चुनौती देते हैं, इसलिए दिमाग पर जोर डालने की कोशिश न करे। मुझे उम्‍मीद थी कि फिल्‍म थ्री-डी में बनती तो शानदार विजुअल इफेक्‍ट्स और उभर कर आते। खैर, 2-डी में भी बाहुबली-द कंक्‍लूजन आपको आ‍कर्षित करने में कतई पीछे नहीं रहती। इफेक्‍ट्स के मामले में फिल्‍म अपने पिछले भाग से एक कदम आगे है। इसलिए मेरी राय में फिल्‍म को एक बार देखा ही जाना चाहिए।

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