छलचित्र: ‘बागबान’ अमिताभ बच्चन की एक ऐसी फिल्म है, जिसे लेकर बहुत मीम्स बनते रहे हैं। कोई कहता है कि यह एकलौती ऐसी फैमिली फिल्म है जिसे मां-बाप के साथ नहीं देखा जा सकता, तो कहीं यह जोक चलता है कि इसकी एंटीडोट फिल्म ‘तारे ज़मीन पर’ है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या अमिताभ के चारों बेटे वाकई बुरे थे? या फिर सिनेमा ने हमें यहां भी झूठ दिखाया?

क्या है बागबान की कहानी?

राज मल्होत्रा 40 साल बैंक में नौकरी करने के बाद रिटायर हो जाते हैं, लेकिन उनके पास नौकरी के बाद भी बड़ी सेविंग्स नहीं होती। वे कहते हैं, “मेरे फिक्स्ड डिपॉजिट मेरे चार बच्चे हैं।”

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बच्चे अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हैं और माता-पिता की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं होते। इसलिए वे माता-पिता को अलग-अलग रखने की बात करते हैं। राज खुद अपने बंगले में रह सकते थे, लेकिन पत्नी पूजा के कहने पर वे दोनों दो अलग-अलग बेटों के साथ रहने को तैयार हो जाते हैं।

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फिल्म में इस बात को इतनी चतुराई से निगेटिव करार दे दिया जाता है कि बेटे अपनी-अपनी पत्नियों के लिए स्टैंड लेते हैं, व्यक्तिगत स्पेस का सम्मान करते हैं, और अपने भविष्य के लिए सुरक्षित निवेश और सेविंग्स रखते हैं।

एक सीन में पूजा अपने बेटे अजय से कहती हैं कि उन्हें अपनी पत्नी और बेटी पर नजर रखनी चाहिए। तुम्हारे पापा पूरे घर पर कंट्रोल रखते थे, जवाब में अजय कहता है कि सबको अपनी ज़िंदगी जीने की आज़ादी है। लेकिन ये सीन ऐसे दिखाया जाता है कि बेटा गलत है।

राज और पूजा की पोती पायल भले ही रेड-फ्लैग डेट कर रही होती है, लेकिन वह एक वयस्क है और अपनी ज़िंदगी जीने का हक रखती है। मगर इस सीन को भी बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है जैसे किसी लड़की को प्यार करने और बॉयफ्रेंड बनाने का हक नहीं है।

एक और सीन में संजय अपने पिता से निवेश और सेविंग्स के बारे में बात करता है। बैकग्राउंड में उदास म्यूजिक चलता है, जैसे उसने बहुत ही मीन बात कही हो कि नौकरी के साथ ही हमें फ्यूचर के बारे में भी सोचना चाहिए जिससे किसी पर डिपेंड ना होना पड़े।

राज मल्होत्रा जब आधी रात में टाइपराइटर से टाइप कर रहे होते हैं, और संजय कहता है कि उसे सुबह ऑफिस जाना है और वह अपनी पत्नी का सपोर्ट करता है और कहता है कि वो सुबह सबसे पहले उठकर राहुल को संभालती है हम सबके लिए खाना बनाती है, यह दिखाता है कि बच्चे अपने परिवार के प्रति जिम्मेदार हैं। लेकिन यहां भी बेटे को विलेन की तरह पेश कर दिया जाता है।

बहू एक जगह कहती है कि पहले पति को ऑफिस जाना है तो उन्हें पहले पेपर पढ़ लेने दीजिए, वो प्रैक्टिकल बात करती है मगर उसे यहां गलत ठहराया जाता है।

ऐसा नहीं है कि बच्चों का व्यवहार हर जगह सही है, मगर वे ऑनेस्ट, प्रैक्टिकल और अपने फ्यूचर की सुरक्षा करने वाले हैं। वे पैट्रियार्की को रिजेक्ट करते हैं, लेकिन फिल्म जिस तरह से उन्हें पेश करती है ऐसा लगता है कि सभी निहायत बुरे बेटे हैं।

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बच्चों को इन्वेस्टमेंट मानना नहीं है समझदारी

राज और पूजा ने बच्चों की परवरिश में सब कुछ लगा दिया, लेकिन अपनी फाइनेंशियल प्लानिंग पर उतना ध्यान नहीं दिया। यहां फिल्म एक जरूरी सवाल छूती है- क्या बच्चों को “इन्वेस्टमेंट” मान लेना जोखिम नहीं है?

बच्चे अपने भविष्य की सुरक्षा चाहते हैं। वे स्वतंत्र हैं। वे अपने फैसले लेते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वे स्वार्थी और बुरे हैं।

2026 में क्या यह कहानी वैलिड है?

जब ‘बागबान’ आई थी, उस वक्त मिडिल क्लास का एक बड़ा डर था- “बुढ़ापे में बच्चे छोड़ देंगे।”

इस फिल्म ने उसी डर को छुआ, और उस भावना को और गहरा कर दिया। लेकिन शायद अब लोग समझते हैं कि रिश्ते गिल्ट पर नहीं टिकते हैं।

‘बागबान’ एक इमोशनल फिल्म है। लेकिन यह संतुलित फिल्म नहीं है। फिल्म ने जेनरेशन गैप को समझने की कोशिश नहीं की और एक पीढ़ी को कटघरे में खड़ा कर दिया।