ऑटो-ट्यून और डिजिटल म्यूजिक के इस दौर में, जहां आवाज को सॉफ्टवेयर से परफेक्ट बनाया जाता है, वहीं पुराने गानों में असली मिठास और जादू हुआ करता था। खासकर जब बातआर.डी.बर्मन की होती है, जिन्हें हम प्यार से पंचम दा कहते हैं। उन्होंने उस समय अपने म्यूजिक से कमाल कर दिखाया, जब ना ऑटो-ट्यून था, ना हाई-टेक स्टूडियो। फिर भी उनके गाने आज तक फ्रेश लगते हैं।
बिना तकनीक के जादू चलाते थे आर.डी.बर्मन
60 से 80 के दशक के बीच पंचम दा ने जो गाने बनाए, वो पूरी तरह असली आवाज और लाइव म्यूजिक पर टिका होता था। उस दौर में किशोर कुमार, लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसे सिंगर्स एक ही टेक में गाना रिकॉर्ड करते थे।
एक्सपेरिमेंट के किंग थे पंचम दा
पंचम दा सिर्फ अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर ही नहीं थे, बल्कि एक्सपेरिमेंट करने में भी नंबर वन थे। उन्होंने बोतल, ग्लास, यहां तक कि सांसों की आवाज से भी म्यूजिक बनाया। ‘शोले’ का बैकग्राउंड हो या ‘तीसरी मंजिल’ के गाने हर जगह उनका अलग अंदाज दिखता है।
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‘अपना देश’ फिल्म का ‘दुनिया में लोगों को’ गाने को पंचम दा ने आशा भोसले के साथ गाया था। इस गाने में कई तरह की आवाज और सुरों के साथ दोनों ने इसे हिट बना दिया था। अगर आज के दौर में इस तरह का गाना बने तो उसमें ऑटो ट्यून का इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन पंचम दा का जादू अलग था।
कंघी से बनाया था म्यूजिक
1968 में आई फिल्म ‘पड़ोसन’ का सुपरहिट गाना ‘मेरे सामने वाली खिड़की में’ आज भी लोगों की जुबान पर है। लेकिन इस गाने को खास बनाता है इसके पीछे छिपी आर.डी.बर्मन की कमाल की क्रिएटिविटी।
इस गाने के म्यूजिक में पंचम दा ने सिर्फ पारंपरिक इंस्ट्रूमेंट्स का ही इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि कंघी जैसी आम चीज से भी अनोखी आवाज निकाली। कंघी को खास तरीके से बजाकर जो साउंड इफेक्ट बनाया गया, उसने गाने में एक अलग ही मजेदार और फ्रेश फील जोड़ दिया। उस समय के हिसाब से ये काफी यूनिक और एक्सपेरिमेंटल आइडिया था।
पंचम दा की खासियत यही थी कि वो म्यूजिक को सिर्फ पारंपरिक इंस्ट्रूमेंट्स तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि गिलास, प्लेट और चम्मच जैसी आम चीज़ों से भी अनोखे साउंड इफेक्ट्स तैयार कर लेते थे। कभी गिलास पर हल्की थाप से रिदम बनाते, तो कभी चम्मच की टकराहट से अलग टोन निकालते और यही उनका अलग अंदाज़ था। फिल्म ‘यादों की बारात’ के सुपरहिट गाने ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ में देखने को मिलता है, जिसकी शुरुआत में गिलास और चम्मच की खनक आज भी लोगों को आकर्षित करती है। उनके ये छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट ही उन्हें बाकी संगीतकारों से अलग बनाते थे और उनके म्यूजिक को हमेशा नया और खास बनाए रखते हैं।
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असली रिकॉर्डिंग का दौर
आज की तरह अलग-अलग ट्रैक जोड़ने वाली टेक्नोलॉजी तब इतनी एडवांस नहीं थी। सारे म्यूजिशियन और सिंगर एक साथ बैठकर लाइव रिकॉर्डिंग करते थे। गिटार, तबला, बांसुरी सब कुछ रियल टाइम में बजता था। इसलिए गानों में एक नैचुरल और रॉ फील आती थी, जो आज के गानों में कम मिलती है।
आज भी क्यों हैं खास?
आज के गानों में टेक्नोलॉजी से आवाज को ठीक किया जाता है, लेकिन पंचम दा के समय टैलेंट ही सबसे बड़ी चीज थी। इसी वजह से उनका म्यूजिक आज भी आउटडेटेड नहीं लगता, बल्कि और भी क्लासिक लगता है।
