मशहूर सिंगर सिर्फ अपनी आवाज के लिए ही नहीं, बल्कि अपने खास कुकिंग स्टाइल के लिए भी जानी जाती थीं। उनकी सिग्नेचर डिश ‘पेशावरी दाल’ खाने के शौकीनों के बीच काफी लोकप्रिय रही है।
कर्ली टेल्स के साथ खास बातचीत में आशा भोसले ने खुद इस दाल की खासियत बताई थी। उन्होंने कहा था कि ये कोई आम दाल नहीं, बल्कि लंबे समय में तैयार की जाने वाली डिश है।
3 दिनों में बनकर तैयार होती थी आशा भोसले की ये खास दाल
आशा भोसले ने बताया था कि इस ‘पेशावरी दाल’ को बनाने में पूरे 3 दिन का समय लगता था। इसे सिगड़ी यानी कोयले की धीमी आंच पर लगातार पकाया जाता था, जिससे दाल में गहरा स्मोकी फ्लेवर आता था। देसी घी, क्रीम और खास मसालों के साथ धीमी आंच पर पकने की वजह से इसका स्वाद बेहद रिच और मलाईदार हो जाता था।
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आशा भोसले के मुताबिक, इस दाल का असली स्वाद उसकी स्लो-कुकिंग में छिपी है। जितनी देर ये पकती है, उतना ही इसका स्वाद निखरता है। यही वजह है कि उनकी ये सिग्नेचर डिश सबको बहुत पसंद आती है।
आशा भोसले के नाम पर हैं कई रेस्टोरेंट
आशा भोसले की एक इंटरनेशनल रेस्टोरेंट चेन है, जिसे Asha’s के नाम से जाना जाता है। इसमें परोसे जाने वाले कई डिशेज खुद आशा भोसले की रेसिपीज़ से इंस्पायर्ड हैं।
कहां-कहां हैं उनके रेस्टोरेंट?
आशा भोसले के रेस्टोरेंट के आउटलेट्स दुनिया के कई बड़े शहरों में मौजूद हैं, जैसे आबू धाबी, बर्मिंघम, मैनचेस्टर, दोहा और दुबई।
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मोमोज भी बनाती थी आशा भोसले
कर्ली टेल्स की कामिया जानी के साथ खास बातचीत में आशा ने ये भी बताया था। उन्होंने कहा था, “मैं मोमो बनाती हूं… मुझे माला सिन्हा ने सिखाया है,” आशा ने बताया था बिरयानी से लेकर मोमो और उनकी सिग्नेचर पेशावरी दाल तक, उनके खाने की दुनिया पूरी तरह भारतीय स्वादों से भरी है, जो उन्होंने जिंदगी, दोस्तों और अपनी जिज्ञासा से सीखी।
इस सफर की शुरुआत उनके बेटे आनंद की बचपन की भूख से हुई। जिसके बारे में बताते हुए उन्होंने कहा था, “जब वो चार-पांच साल का था… जब मैं रिकॉर्डिंग से आती थी, तो वो कहता था, ‘आई तू क्या करते?’” आशा समझ जाती थीं कि उसे भूख लगी है। “मुझे मालूम था, इनको बिरयानी चाहिए, इनको मटन-चिकन चाहिए।” और फिर वो दिल और किचन में मौजूद चीजों से शानदार खाना तैयार कर देती थीं।
बाद में उनके बेटे ने इस प्यार को एक सपने में बदल दिया। “बड़ा होने के बाद बोला, मैं रेस्टोरेंट बनाता हूं तुम्हारे नाम से… तुम्हारा खाना होना चाहिए उसमें।” यहीं से आशा ने अलग-अलग जगहों से रेसिपी इकट्ठा करना शुरू किया। “जहां-जहां जाती थी, वहां मैं पूछती थी: ये कैसे बनता है?”
लखनऊ की असली नवाबी रेसिपी उन्हें मखदूम ‘मजरूह’ सुल्तानपुरी की पत्नी से मिली, जबकि पंजाबी, बंगाली और सिख खाने उन्होंने दोस्तों और रिश्तेदारों से सीखे। “बंगाल तो मेरा ससुराल बन गया था, तो वहां से खाना सीखा।”
