हिंदी फिल्म जगत में लता और आशा दो ऐसे विशाल वटवृक्ष रहे, जिनकी छत्रछाया में आगे चलकर महिला पार्श्व गायन की पीढ़ियां तैयार हुईं। समूचे भारतीय सिने संगीत में लता और आशा ने परोक्ष और प्रत्यक्ष दोनों ही तरह से नई पीढ़ी को प्रभावित किया। ये अलग बात है कि ना तो दूसरी लता हो सकीं और ना ही दूसरी आशा हो सकती हैं। क्योंकि लता और आशा दोनों ही बहनें संगीत की साधना का पर्याय कहलाती। हालांकि, दोनों की गायन शैली, व्यक्तिगत जीवन और करियर के सफर में वे एक-दूसरे से काफी अलग थीं।

लता मंगेशकर की आवाज को ‘स्वर्ग की आवाज’ माना जाता था। वे ज्यादातर भावपूर्ण, रोमांटिक, शास्त्रीय और शांत गीतों के लिए जानी जाती थीं। इसके उलट आशा भोसले ने रॉक, पॉप और तेज रफ्तार वाले गाने गाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई। लता मंगेशकर और आशा भोसले सगी बहनें जरूर थीं, लेकिन अभिरुचि, मिजाज और गायकी तीनों ही स्तर पर बिल्कुल जुदा थीं।

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दोनों ने कम उम्र से ही गाना प्रारंभ कर दिया था। लता मंगेशकर क्लासिकी की परंपरा का पालन करने के लिए जानी गईं, लेकिन आशा ने क्लासिकी में आधुनिक का प्रयोग करके अपने लिए नया श्रोता वर्ग तैयार किया। उनके आचार-विचार जितने विद्रोही रहे। संगीत में आगे बढ़ने और अपने लिए नई परंपरा गढ़ने के मिशन पर भी उतनी ही शिद्दत से जुटी रहीं। लता मंगेशकर ने साठ और सत्तर के दशक में बहुत से ऐसे गाने गाए हैं, जो जोश, जवानी, प्रेम और सौंदर्य की भावना से युक्त हैं, लेकिन आशा भोसले ने अपने लिए भविष्य की नई लकीर खींची।

अलग पहचान बनाने के लिए उन्होंने क्लासिकल के साथ पश्चिमी शैली पर भी ध्यान दिया, अपने सुर निखारे। आशा की इस मेहनत, प्रतिभा, विद्रोही विचार और उनकी आवाज की खनक से ओपी नैय्यर और आरडी बर्मन जैसे संगीतकार बखूबी वाकिफ हो चुके थे, जिन्होंने आशा को उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर से अलग राह पर ले जाने में काफी मदद की। आशा भोसले ऐसी गायिका थीं जो वक्त के साथ चलने में यकीन रखती थीं। उन्होंने शंकर जयकिशन, ओपी नय्यर, रवि, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आरडी बर्मन, बप्पी लहड़ी से लेकर एआर रहमान के साथ भी गाने गाए हैं।

उन्होंने बैजयंती माला, मीना कुमारी से लेकर हेलन, जीनत अमान, हेमा मालिनी, परबीन बाबी, रेखा, श्रीदेवी, उर्मिला मातोंडकर तक सभी दौर की अभिनेत्रियों को आवाज दी है। शास्त्रीय संगीत को कभी उन्होंने छोड़ा नहीं। इसके साथ-साथ लोकगीत, भजन, गजल और कव्वाली भी बखूबी गाती थीं।

सफल कारोबारी भी थीं आशा भोसले

गायिकी के साथ-साथ आशा भोसले एक सफल कारोबारी भी थीं। आशा भोसले ने रेस्तरां कारोबार में अपने कदम साल 2002 में बढ़ाए थे, जब उन्होंने दुबई के वाफी मॉल में एक भारतीय रेस्तरां खोला था और इसका नाम ‘आशा’ रखा था। इसके बाद इस कारोबार का उन्होंने लगातार विस्तार किया। एक यूट्यूब चैनल पर उन्होंने खुद इस बात का जिक्र किया था कि दुनियाभर में उनके कई रेस्तरां हैं। इनमें दुबई के अलावा कुवैत में पांच रेस्तरांएं हैं। दोहा, कतर, अबु धाबी जैसे मध्य पूर्व देशों के साथ ही लंदन और मैनचेस्टर में एक-एक रेस्तरां है, जबकि बर्मिंघम में दो ‘आशा’ रेस्तरां हैं।

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