साल 2020 में जब ‘अनुपमा‘ ने टीवी पर दस्तक दी थी और इसने सिर्फ रुपाली गांगुली को छोटे पर्दे की सबसे बड़ी स्टार्स में शामिल नहीं किया, बल्कि शो से जुड़े कई कलाकारों की जिंदगी भी बदल दी। इनमें से एक थीं सीनियर अभिनेत्री अल्पना बुच, जो इस लोकप्रिय धारावाहिक में लीला बा कोठारी का किरदार निभाती हैं।
शो की कामयाबी ने अल्पना को अपना एक पुराना सपना पूरा करने का मौका दिया, प्रकृति के बीच अपना आशियाना बसाने का सपना। आज उनका यह ड्रीम होम मुंबई के बाहरी इलाके शाहपुर में मौजूद है। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने इस खूबसूरत घर का नाम ‘लीला विला’ रखा है, जो उस किरदार को डेडिकेटिड है जिसने उनकी जिंदगी को नई दिशा दी और उन्हें नई पहचान दिलाई।
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अल्पना बुच बताती हैं कि ‘अनुपमा’ से हुई कमाई का हर हिस्सा उनके ड्रीम होम को बनाने में लगा। यही वजह है कि उन्होंने अपने घर का नाम ‘लीला विला’ रखा, जो उनके किरदार लीला बा को समर्पित है।
इस घर का सपना उन्हें कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान आया था। उसी दौर में ‘अनुपमा’ शुरू हुआ और देखते ही देखते टीवी का सबसे लोकप्रिय शो बन गया, जिसने उन्हें आर्थिक मजबूती के साथ बड़े सपने देखने का हौसला भी दिया।
शाहपुर स्थित लीला विला की शुरुआत प्रवेश द्वार पर बने साईं बाबा के छोटे से मंदिर से होती है। हरियाली से घिरा यह घर अल्पना की सादगी और प्रकृति प्रेम को दिखाता है। घर के हर कोने में देश के अलग-अलग हिस्सों से जुटाई गई हैंड क्राफ्टेड कलाकृतियां और सजावटी सामान उनकी पसंद की झलक दिखाते हैं।
लीला विला अल्पना बुच के लिए सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि उनकी यादों और भावनाओं से जुड़ा एक खास ठिकाना है। घर के लगभग हर दरवाजे, कोने और डिजाइन को उन्होंने खुद सोचा और तैयार कराया है। इसमें परिवार की कई पुरानी धरोहरों को भी जगह दी गई है। उनके पिता का पुराना पारंपरिक संदूक आज लिविंग रूम की सेंटर टेबल बन चुका है, जो इस घर को भावनात्मक और पारिवारिक जुड़ाव का एहसास देता है।
लीला विला की सबसे खास बातों में से एक है वहां से दिखाई देने वाला खूबसूरत नजारा। घर की रसोई की खिड़की से घना जंगल नजर आता है और चारों तरफ फैले हजारों पेड़ मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर सुकून का एहसास कराते हैं।
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हालांकि, प्रकृति के इतने करीब रहने के साथ कुछ अनोखे अनुभव भी जुड़े हैं। अल्पना बुच बताती हैं कि इलाके में तेंदुओं का दिखना आम बात है। उन्हें याद है कि एक बार एक तेंदुआ रास्ता भटककर उनके इलाके में आ गया था और करीब एक महीने तक वहीं आसपास रहा। शुरुआत में लोग काफी सतर्क और सावधान थे, लेकिन धीरे-धीरे सब उसके आदी हो गए और दूर से उसे देखना रोजमर्रा का हिस्सा बन गया।
अल्पना बताती हैं कि जब भी इस इलाके में विकास के लिए पेड़ काटे जाते हैं, तो जून या जुलाई में स्थानीय लोग मिलकर पैसे जुटाते हैं और करीब 300 नए पौधे लगाते हैं। वह कहती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में इस पहल के तहत 3,000 से ज्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं। उनके मुताबिक, यह प्रकृति को लौटाने और उसका आभार जताने का उनका अपना तरीका है।
