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…और एक छोटी फिल्म बड़ी बन गई

किसी नए कलाकार को कोई निर्माता अपनी फिल्म में काम दे। कुछ दिन के बाद वही कलाकार उस फिल्म के निर्माता से कहे कि उसे तो एक बडे निर्माता की ‘बड़ी फिल्म’ मिल रही है इसलिए उसे इस फिल्म से आजाद किया जाए।

एलबी प्रसाद

गणेशनंदन तिवारी

कर्ज में डूबे तेलुगुभाषी किसान के एक युवा बेटे ने जब पिता की परेशानियां देखीं, तो उनकी मदद करने और हालात बदलने के लिए पत्नी से कुछ रुपए लेकर उसने घर छोड़ दिया। साल भर बीत गया। कोई खोज-खबर नहीं मिली, तो परिवार ने मान लिया कि दुनिया उसे लील गई। मगर किसान का बेटा लौटा। उसने हालात बदले, कर्ज के बोझ से परिवार को निकाला और समाज में प्रतिष्ठा दिलाई। सिनेमा में काम कर शोहरत और दौलत कमाई। हिंदी और तेलुगू की पहली बोलती फिल्मों में अभिनय किया। बाद में फिल्में भी बनाई। यह युवा थे दादासाहेब फालके विजेता अक्किनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद राव यानी एलवी प्रसाद, जिनकी बनाई ‘एक दूजे के लिए’ ने प्रदेशवाद और भाषावाद के टकराव के बीच प्यार की ताकत बताई। शनिवार को एलबी प्रसाद की 25वीं पुण्यतिथि है।

किसी नए कलाकार को कोई निर्माता अपनी फिल्म में काम दे। कुछ दिन के बाद वही कलाकार उस फिल्म के निर्माता से कहे कि उसे तो एक बडे निर्माता की ‘बड़ी फिल्म’ मिल रही है इसलिए उसे इस फिल्म से आजाद किया जाए। नया कलाकार फिल्म छोड़ देता है मगर हफ्ते भर बाद आकर कहता है कि उस ‘बड़ी फिल्म’ के निर्माता ने तो किसी और हीरो को ले लिया है। अब आप वापस मुझे अपनी फिल्म में ले लीजिए। ऐसी स्थिति में शायद ही कोई निर्माता कलाकार की बात सुनता। मगर उदार निर्माता ने नए कलाकार को माफ कर वापस फिल्म में लिया। बाद में उनके संबंध इतने अच्छे बने कि दोनों ने आधा दर्जन फिल्में साथ कीं। यह नए कलाकार थे जीतेंद्र और उन्हें मौका दिया था निर्माता, निर्देशक अभिनेता, छायाकार एलवी प्रसाद ने।

किस्सा 1969 की फिल्म ‘जीने की राह’ (जीतेंद्र-तनुजा) का है, जिसका निर्माण-निर्देशन एलवी प्रसाद कर रहे थे। प्रसाद हिंदी और तेलुगू में सफल फिल्में बना चुके थे और उनकी साख थी। ‘जीने की राह’ उनकी 1953 की एक तेलुगू फिल्म का रीमेक थी, जिसके प्रसाद खुद हीरो थे। जीतेंद्र को वी शांताराम ने ‘गीत गाया पत्थरों ने’ (1964) में मौका दिया था और पांच साल का अनुंबध किया था कि इस बीच बाहर की फिल्मों में काम करोगे, तो कमाई का आधा हिस्सा दोगे। यह अलग बात थी कि जीतेंद्र ने बाहर की फिल्में भी की और शांताराम को कमाई का आधा हिस्सा भी दिया।

प्रसाद की ‘जीने की राह’ और सुबोध मुखर्जी की ‘अभिनेत्री’ दोनों की तारीखें टकरा रही थीं। जीतेंद्र चाहते थे कि प्रसाद उन्हें आजाद कर दें ताकि वह ‘अभिनेत्री’ में काम कर सके। सुबोध मुखर्जी बड़े निर्माता-निर्देशक थे और अशोक कुमार के जीजा शशधर मुखर्जी के भाई थे। मुखर्जी देव आनंद को लेकर ‘मुनीमजी’, ‘पेइंग गेस्ट’ और ‘लव मैरिज’ बना चुके थे। मुखर्जी की फिल्म जंगली ने शम्मी कपूर को स्टार बना दिया था। इसलिए जीतेंद्र को लगता था कि ‘अभिनेत्री’ उन्हें स्टार बना सकती है।

जीतेंद्र की बात सुन प्रसाद को झटका लगा। मगर वह संघर्षरत कलाकार की मजबूरी जानते थे। उन्होंने जीतेंद्र को आजाद कर दिया। मगर जीतेंद्र को तब झटका लगा, जब उन्होंने एक फिल्म पत्रिका ने सुबोध मुखर्जी की नई फिल्म ‘अभिनेत्री’ के विज्ञापन में शशि कपूर और हेमा मालिनी के नाम देखे। जीतेंद्र ने जिस फिल्म के लिए एलवी प्रसाद की ‘जीने की राह’ छोड़ी थी, वह शशि कपूर को मिल गई थी।

जीतेंद्र वापस एलवी प्रसाद के पास लौटे। हालात बताए। एलवी प्रसाद ने जीतेंद्र को समझाया कि कोई फिल्म छोटी बड़ी नहीं होती है न किसी निर्माता की साख से फिल्म चलती है। वापस फिल्म में लिया। प्रसाद ने जो कहा था वही हुआ भी।नामीगिरामी निर्माता-निर्देशक सुबोध मुखर्जी की ‘अभिनेत्री’ बॉक्स पर बुरी तरह से फेल हुई और ‘जीने की राह’ हिट हो गई। उसके गाने ‘बड़ी मस्तानी है मेरी महबूबा’, ‘आप मुझे अच्छे लगने लगे…’, ‘इक बंजारा गाए जीवन के गीत सुनाए…’ खूब लोकप्रिय हुए। बाद में एलवी प्रसाद और जीतेंद्र ने ‘खिलौना’, ‘ससुराल’, ‘बिदाई’ जैसी फिल्मों में साथ काम किया।

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