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हमारी याद आएगी: मौत का भय और जिंदगी की पहेली

जिंदगी ने गीतकार योगेश से खूब उठापटक करवाई। संगीतकारों और स्टूडियो के खूब चक्कर लगवाए। फिर यही जिंदगी उनके गीतों में भी उतरी। कभी न ‘जाने क्यों होता है जिंदगी के साथ...’, कभी ‘बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी ये जिंदगी...’ तो कभी ‘जिंदगी कैसी है पहेली...’ जैसे गानों के रूप में। उनके गाने सुनकर भ्रम होता था कि इन्हें गुलजार ने तो नहीं लिखा। उनका लिखा गाना गाकर लता मंगेशकर ने कहा था कि शैलेंद्र तो रहे नहीं, तो क्या उन्होंने अपने निधन से पहले यह गाना लिख दिया था। मजरूह सुलतानपुरी ने तो ‘सौ बार बनाकर मालिक ने सौ बार मिटाया होगा, ये हुस्न मुज्जसिम तब तेरा इस रंग पे आया होगा...’ सुनकर कहा था कि सुंदरता पर इससे बढ़िया गीत लिखा ही नहीं जा सकता। ऐसे गीतकार योगेश का 29 मई को निधन हो गया।

‘आनंद’ गीतकार योगेश के करिअर की महत्वपूर्ण फिल्म थी, जो 16 साल की उम्र में कोई ढंग की नौकरी पकड़ने अपने मित्र सत्तू के साथ लखनऊ से मुंबई आए थे।

भय इनसान का जीवन भर पीछा करता है और इनसान के जीवन में सबसे बड़ा भय मौत का होता है। इस थीम पर बनी थी राजेश खन्ना की प्रमुख भूमिकावाली फिल्म ‘आनंद’ (1971), जिसमें योगेश के लिखे गाने ‘जिंदगी कैसी है पहेली…’ की खूब चर्चा होती है। दरअसल एक बार राज कपूर गंभीर रूप से बीमार पड़े, तो उनके परम मित्र निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी को चिंता सताने लगी थी कि अगर राज कपूर नहीं रहे, तो उनका क्या होगा। हृषिदा राज कपूर को बाबू मोशाय कहते थे। दोनों की दोस्ती की झलक ‘आनंद’ में थी। राज कपूर को परदे पर उतारा था राजेश खन्ना ने और हृषिदा की भूमिका में थे अमिताभ बच्चन। लगातार एक दर्जन हिट फिल्में दे चुके राजेश खन्ना ने इसकी पटकथा सुनी तो हृषिदा के पीछे ही पड़ गए कि फिल्म तुरंत शुरू करें। वे बार-बार तारीखें देने के लिए आते थे और हृषिदा उन्हें देखकर छिप जाते थे क्योंकि आर्थिक संकट के कारण फिल्म तुरंत शुरू करने जैसी स्थिति नहीं थी। हृषिदा ने मात्र 28 दिनों में ‘आनंद’ बनाई थी।

‘आनंद’ गीतकार योगेश के करिअर की महत्वपूर्ण फिल्म थी, जो 16 साल की उम्र में कोई ढंग की नौकरी पकड़ने अपने मित्र सत्तू के साथ लखनऊ से मुंबई आए थे। जेब में मेहनत और ईमानदारी भर थी। 11 रुपए महीने में अंधेरी में पहाड़ी पर बनी एक झोपड़ी में दोनों रहते थे, जिसमें न पानी था न बिजली। लगभग दस साल उन्होंने कड़ा संघर्ष किया। 25 रुपए में गाना लिखा। हालांकि उस दौर में आनंद बख्शी और इंदीवर जैसे गीतकार 15 रुपए में गाने लिख रहे थे। योगेश को छिटपुट काम मिल रहा था।

संगीतकार सलिल चौधरी उनकी कलम के कदरदान बन चुके थे। सलिलदा से बासु भट्टाचार्य अपनी फिल्म के लिए तीन गाने गुलजार से लिखवाने और रिकॉर्ड करवाने का कहकर इंदिरा गांधी पर एक डाक्यूमेंटरी के सिलसिले में दिल्ली चले गए। गुलजार व्यस्त थे। लिहाजा तीनों गाने सलिलदा ने योगेश से लिखवा लिए। मगर फिल्म रिलीज ही नहीं हुई। सलिलदा ने यही तीनों गाने निर्माता एलबी लछमन की ‘अन्नदाता’ में लगा दिए जिसके वे संगीतकार थे। ये गाने हृषिदा ने सुने, जो लछमन की फिल्म ‘अनुराधा’ (1960) डाइरेक्ट कर चुके थे। उन्होंने लछमन से दो गाने ‘आनंद’ के लिए मांगे मगर मिला एक ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए…’ जिसे हृषिदा ने ‘आनंद’ में इस्तेमाल किया। एक और गाना ‘जिंदगी कैसी है पहेली…’ योगेश से और लिखवाया। बाकी के गाने गुलजार लिख चुके थे जिनमें अमिताभ बच्चन की पढ़ी जाने वाली कविता ‘मौत तू एक कविता है…’ भी शामिल थी। ‘आनंद’ रिलीज हुई और ‘जिंदगी कैसी है पहेली…’ खूब पसंद किया गया। इसके बाद तो योगेश को पीछे मुड़ देखने की जरूरत नहीं पड़ी।

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