ताज़ा खबर
 

याद हमारी आएगीः सिफारिशी चिट्ठी भी काम न आई बख्शी के

वाक्या 1956 का है। आनंद बख्शी तब गीतकार, संगीतकार या गायक नहीं थे। उन्होंने दो बार सेना में काम किया था और उसके बाद फिल्मों में कुछ बनने का इरादा लेकर दूसरी बार मुंबई आए थे।

आनंद बख्शी

आनंद बख्शी

(21 जुलाई 1930 – 30 मार्च 2002)
फिल्मजगत में कैंपों और गुटों का अस्तित्व हमेशा ही रहा है और अक्सर कहा जाता है कि कैंपों के कारण नई प्रतिभाओं को मौका नहीं मिलता। गीतकार आनंद बख्शी के साथ भी शुरू में यही हुआ था। वह जब फिल्मों में गीतकार बनने आए, तब कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुलतानपुरी, शकील बदायूंनी, शैलेंद्र जैसे प्रतिभाशाली गीतकारों का दबदबा था। मगर सहज, सरल गीत लिखने के कारण आनंद बख्शी ने अपना मकाम बना लिया। उन्होंने 600 से ज्यादा फिल्में कीं और तीन हजार से ज्यादा गाने लिखे। हिंदी सिनेमा इतिहास की सबसे लंबे समय तक चलने वाली ‘दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे’ में गाने लिखे। यहां तक कि मील का पत्थर मानी जाने वाली फिल्म ‘शोले’ की एक कव्वाली में गाने का भी मौका बख्शी को मिला, मगर वह कव्वाली फिल्म में शामिल नहीं की जा सकी। धुनों पर गीत लिखने में मास्टर माने जाने वाले आनंद बख्शी आज होते तो फिल्मजगत उनका 88वां जन्मदिन मना रहा होता।

वाक्या 1956 का है। आनंद बख्शी तब गीतकार, संगीतकार या गायक नहीं थे। उन्होंने दो बार सेना में काम किया था और उसके बाद फिल्मों में कुछ बनने का इरादा लेकर दूसरी बार मुंबई आए थे। रोज सात-आठ निर्माताओं के यहां चक्कर लगाते-लगाते बख्शी थक चुके थे। लोकल ट्रेन में बिना टिकट पकड़े गए, तो एक उदार टीसी ने न सिर्फ खाना खिलाया बल्कि अपने घर में पनाह भी दी। दूर के रिश्तेदार सुनील दत्त ने भगवान दादा के नाम सिफारिशी चिट्ठी लिखी थी। संयोग से भगवान दादा का लेखक बीमार पड़ गया और आनंद बख्शी को न सिर्फ उनकी फिल्म ‘भला आदमी’ (1958) में गीत लिखने का, बल्कि गाने का भी मौका मिल गया। मगर कैरियर को जिस ‘करंट’ की जरूरत थी, वह मिल नहीं रहा था। तब सुनील दत्त ने उन्हें राज कपूर के नाम सिफारिशी खत दिया।

राज कपूर तब फिल्मजगत में नाम कमा चुके थे। टिकट खिड़की पर पैसे की ‘बरसात’ (1949) हो चुकी थी। इस ‘बरसात’ ने सिनेमा-संगीत में भी बड़ा बदलाव किया था। उनकी ‘आवारा’ (1951), ‘श्री 420’ (1955), ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960) सफलता के झंडे गाड़ चुकी थी। आरके की फिल्मों में शंकर-जयकिशन का संगीत होता था और गाने लिखते थे शैलेंद्र और हसरत जयपुरी। लिहाजा न तो आरके में किसी संगीतकार की दाल गलती थी, न किसी गीतकार की। ऐसे में सुनील दत्त की चिट्ठी लेकर आनंद बख्शी आरके के चक्कर लगाने लगे। मगर उन्हें अंदर घुसने का मौका ही नहीं मिल पाता था।

एक दिन किसी तरह वह आरके स्टूडियो में घुस गए और राज कपूर के सहायक हीरेन खेड़ा के पास पहुंच गए। खेड़ा ने उनकी बातें सुनने के बाद समझाया कि राज कपूर की फिल्मों में शैलेंद्र और हसरत जयपुरी के होते किसी गीतकार को जल्दी मौका नहीं मिलेगा। बख्शी अगर राज कपूर से मिल लिए, तो भी उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाएगा। फिर खेड़ा ने बख्शी से एक वादा किया कि जब भी वह अपनी फिल्म बनाएंगे, उसमें आनंद बख्शी को जरूर मौका देंगे।

खेड़ा ने अपना वादा पूरा भी किया। उन्होंने ‘मेहंदी रंग लाएगी’ (1962) बनाई, जिसके गाने उन्होंने आनंद बख्शी से लिखवाए, जो खूब लोकप्रिय हुए। इसके बाद ‘हिमालय की गोद में’ (1965) और ‘जब-जब फूल खिले’ (1965) की सफलता के बाद तो आनंद बख्शी को पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा। फिर शैलेंद्र और जयकिशन के निधन के कारण वक्त ऐसा भी आया जब राज कपूर की फिल्म ‘बॉबी’ (1973) में संगीत देने के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बख्शी को बुलाया गया। फिल्म में एक गाना ‘हम तुम एक कमरे में बंद हो…’ आनंद बख्शी ने भी लिखा। लेकिन तब तक वक्त बदल चुका था। बख्शी इंडस्ट्री के सबसे महंगे, सफल और व्यस्त गीतकार थे। उन्हें ‘बॉबी’ के लिए राज कपूर को सुनील दत्त की सिफारिशी चिट्ठी दिखाने की जरूरत नहीं पड़ी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App