60s, 70s और 80 के दशक में रिलीज होने वाली हिंदी फिल्मों में विलेन का मतलब आमतौर पर खौफ, गहरी आवाज और डरावना चेहरा होता था। हालांकि, साल 1994 में रिलीज हुई राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ ने विलेनगिरी की इस परिभाषा में थोड़ा बदलाव ला दिया था।
सलमान खान, जूही चावला, आमिर खान और करिश्मा कपूर स्टारर उस मूवी में शक्ति कपूर ने विलेन ‘क्राइम मास्टर गोगो’ का किरदार निभाया था, जो आज एक कल्ट अमर किरदार बन चुका है। गोगो कोई साधारण विलेन नहीं था, वह ‘विलेनगिरी में कॉमेडी’ का सबसे सफल प्रयोग था। चलिए आज आपको अपने अमर किरदार के इस कॉलम में उनके बारे में बताते हैं।
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कैसे बाकी विलेन्स से अलग था ‘क्राइम मास्टर गोगो’
‘क्राइम मास्टर गोगो’ की पहली झलक ही उसे बाकी विलेन्स से अलग करती थी। जहां ‘मोगैंबो’ या ‘शाकाल’ अपनी भव्यता से डराते थे, वहीं ‘गोगो’ अपनी कॉस्ट्युम से हंसाता था। इस फिल्म में विलेन लंबी काली केप, लाल शर्ट और पाजामा पहनता था, जो सुपरहीरो और विलेन का एक अजीब मिश्रण था।
यह देखते ही मजाकिया लगता था। इसके अलावा विलेन की लंबी, पतली और मुड़ी हुई मूंछें उसे एक ‘कॉमिक बुक विलेन’ जैसा लुक देती थी। ‘क्राइम मास्टर गोगो’ जब डराने की कोशिश करता था, तो वह डरावना कम और मासूम ज्यादा लगता था।
फनी डायलॉग और उन्हें बोलने का अंदाज
बाकी फिल्मों में विलेन की एंट्री, उनके डायलॉग और उन्हें बोलने का अंदाज काफी डरावना और अलग होता था। लेकिन ‘क्राइम मास्टर गोगो’ के किरदार को अमर बनाने में उसके डायलॉग का भी बड़ा हाथ होता था। ‘गोगो’ के डायलॉग आज भी मीम्स की दुनिया पर राज करते हैं। जैसे ‘नाम है मेरा ‘क्राइम मास्टर गोगो, आंखें निकाल कर गोटियां खेलता हूं मैं’, ‘आया हूं, कुछ तो लेकर जाऊंगा’ यह डराते कम और हंसाते ज्यादा थे।
इसके अलावा कुछ डायलॉग में ‘क्राइम मास्टर गोगो’ खुद को ‘मोगैंबो’ का भतीजा बताता है, लेकिन उसकी हरकतें उसके दावों के बिल्कुल उलट हैं। इसमें विलेन खुद को शातिर समझता है, लेकिन अमर और प्रेम (आमिर और सलमान) जैसे दो बुद्धू भी उसे बेवकूफ बना देते हैं।
शक्ति कपूर का मास्टरक्लास अभिनय
शक्ति कपूर ने इस किरदार में जान फूंक दी। उन्होंने कॉमेडी और ह्यूमर का सही तालमेल बिठाया। उनका बॉडी लैंग्वेज, जिसमें ‘गोगो’ का केप को बार-बार संभालना और लड़खड़ाकर चलना एक ‘अनाड़ी विलेन’ बनाता है।
वहीं, उनकी आवाज का उतार-चढ़ाव जैसे ‘गोगो’ भारी आवाज में बात शुरू करता है, लेकिन घबराहट में उसकी आवाज पतली हो जाती है। गंभीर स्थितियों में गोगो की बेवकूफी भरी हरकतें ही फिल्म का मुख्य आकर्षण बनीं। ऐसे में इसकी कॉमिक टाइमिंग भी बेहद अच्छी है।
‘क्राइम मास्टर गोगो’ क्यों बना अमर किरदार
हमें लगता है कि गोगो के अमर होने के पीछे तीन बड़े कारण हैं। पहला विलेन का मानवीकरण, जैसे आमतौर पर विलेन हारने पर मर जाते हैं या जेल चले जाते हैं, लेकिन गोगो हारने पर भी सहानुभूति बटोरता है। इसके अलावा ‘गोगो’ सालों बाद भी मीम्स की दुनिया में एक्टिव है। आज भी लोग उनके डायलॉग और एक्शन को मीम्स के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, इसके क्राइम मास्टर गोगो थीम वाली टी-शर्ट और खिलौने भी उस समय बाजारों में मिलने लग गए थे।
मासूमियत और शैतानी का संगम
‘क्राइम मास्टर गोगो’ शैतान बनना चाहता है, लेकिन वह दिल से मासूम या फिर बेवकूफ है। वह बच्चों को डराने की कोशिश करता है, लेकिन खुद भी डर जाता है। यही उसे ‘यूनिक’ बनाता है।
भारतीय सिनेमा पर असर
गोगो की सफलता ने बॉलीवुड को यह सिखाया कि विलेन को हमेशा डरावना होने की जरूरत नहीं है। इसके बाद कई कॉमेडी विलेन आए, लेकिन गोगो जैसा कोई नहीं बन पाया।
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