‘मैं अपनी फेवरेट हूं’- फिल्म ‘जब वी मेट’ का यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं, बल्कि एक पूरी सोच था। एक ऐसी सोच जिसने लाखों युवाओं को खुद से प्यार करना, अपनी गलतियों को स्वीकार करना और जिंदगी को खुलकर जीना सिखाया। ‘जब वी मेट’ की ‘गीत’ भारतीय सिनेमा के उन किरदारों में शामिल है, जिनकी लोकप्रियता फिल्म की सफलता से कहीं आगे निकल गई।
लगभग दो दशक बाद भी गीत का नाम लेते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और यही किसी अमर किरदार की सबसे बड़ी पहचान होती है। साल 2007 में रिलीज हुई इम्तियाज अली की फिल्म ‘जब वी मेट’ में ‘गीत ढिल्लों’ का किरदार करीना कपूर द्वारा निभाया गया था और यह रोल आज भी बॉलीवुड के सबसे यादगार महिला किरदारों में गिना जाता है। गीत सिर्फ एक चुलबुली लड़की नहीं थी।
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वह आत्मविश्वास, स्वतंत्र सोच, जिंदगी के प्रति सकारात्मक नजरिए और खुद से प्यार करने की मिसाल थी। उस दौर में जब फिल्मों की नायिकाएं अक्सर किसी हीरो की कहानी का हिस्सा बनकर रह जाती थीं, गीत ने अपनी अलग पहचान बनाई। वह अपनी शर्तों पर जीती है, फैसले खुद लेती है, गलतियां करती है, उनसे सीखती है और फिर दोबारा खड़ी भी होती है।
गीत ने पहली मुलाकात में ही जीत लिया था दिल
फिल्म की शुरुआत में जब गीत की मुलाकात आदित्य कश्यप से ट्रेन में होती है, तब दर्शक उसके व्यक्तित्व से परिचित होते हैं। लगातार बोलना, हर परिस्थिति में उत्साहित रहना और अनजान लोगों से भी बिना झिझक बातचीत करना- ये उसकी पहली पहचान रही। लेकिन गीत की सबसे बड़ी खासियत उसकी बातूनी आदत नहीं, बल्कि उसका आत्मविश्वास है।
वह खुद को लेकर बिल्कुल स्पष्ट है। फिल्म का उसका मशहूर डायलॉग ‘मैं अपनी फेवरेट हूं’ सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि उसकी पूरी पर्सनालिटी का सार है। भारतीय समाज में खासकर महिलाओं को अक्सर विनम्रता और त्याग के दायरे में देखने की आदत रही है। ऐसे माहौल में एक लड़की का खुलकर कहना कि वह खुद की सबसे बड़ी फैन है, दर्शकों के लिए नया अनुभव था। यह आत्ममुग्धता नहीं थी, बल्कि आत्मसम्मान का बयान था।
गीत: एक नई भारतीय नायिका
2000 के दशक तक बॉलीवुड में महिला किरदारों की एक तय छवि थी। वे या तो पारंपरिक संस्कारों की प्रतीक होती थीं या फिर आधुनिकता के नाम पर केवल ग्लैमर तक सीमित कर दी जाती थीं। ‘गीत’ इन दोनों धारणाओं से अलग थी। वह आधुनिक थी, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हुई थी। वह परिवार से प्यार करती थी, लेकिन अपने फैसले खुद लेना चाहती थी। वह प्रेम में विश्वास करती थी, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं। यही संतुलन उसे खास बनाता है।
इम्तियाज अली ने ‘गीत’ को किसी आदर्श नायिका की तरह नहीं लिखा। वह गलतियां करती है। अपने प्रेमी अंशुमान के लिए घर छोड़ दिया। भावनाओं में बहकर फैसले लिए, लेकिन यही उसकी वास्तविकता है। दर्शकों को उसमें एक इंसान दिखाई देता है, कोई परफेक्ट फिल्मी चरित्र नहीं।
जब जिंदगी ने गीत को मारा थप्पड़
अगर फिल्म सिर्फ गीत की खुशमिजाजी तक सीमित रहती, तो शायद यह किरदार इतना गहरा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। कहानी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है, जब अंशुमान उसे स्वीकार करने से इनकार कर देता है। पहली बार गीत की दुनिया बिखरती दिखाई देती है। वह चुप हो जाती है, अकेली पड़ जाती है और अपनी पहचान खोने लगती है।
यहीं से गीत का किरदार और भी शानदार बन जाता है। क्योंकि वास्तविक जीवन में भी आत्मविश्वासी लोग कभी-कभी टूटते हैं। सकारात्मक लोग भी निराशा का सामना करते हैं। मजबूत दिखने वाले लोग भी भावनात्मक संघर्षों से गुजरते हैं। फिल्म यह नहीं दिखाती कि खुश रहने वाले लोगों की जिंदगी में दुख नहीं आते। बल्कि यह दिखाती है कि दुख आने के बाद वे उनसे कैसे बाहर निकलते हैं। गीत का यह चरण दर्शकों को बताता है कि आत्मविश्वास का मतलब कभी न टूटना नहीं है, बल्कि टूटने के बाद फिर से खड़ा होना है।
युवाओं पर गीत का प्रभाव
गीत का प्रभाव सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं रहा। फिल्म रिलीज होने के बाद उसके संवाद, पहनावा, बोलने का अंदाज और जीवन के प्रति नजरिया युवाओं के बीच बेहद फेमस हो गए। कॉलेजों, सोशल मीडिया और आम बातचीत में ‘मैं अपनी फेवरेट हूं’ एक प्रेरणादायक वाक्य बन गया। उस समय यह डायलॉग खास तौर पर युवा महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का प्रतीक बना। यह संदेश देता था कि खुद से प्यार करना कोई गलत बात नहीं है।
कई फिल्म समीक्षकों ने भी माना कि गीत बॉलीवुड की उन महिला पात्रों में शामिल है जिन्होंने महिलाओं को केवल प्रेम कहानी के हिस्से के रूप में नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र सोच रखने वाले व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया।
करीना कपूर के करियर का मील का पत्थर
करीना कपूर ने अपने करियर में कई सफल भूमिकाएं निभाई हैं, लेकिन गीत को अक्सर उनके बेस्ट प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है। इस किरदार में उन्होंने ऊर्जा, हास्य, भावनात्मक गहराई और संवेदनशीलता का ऐसा संतुलन दिखाया जो कम ही देखने को मिलता है। फिल्म के शुरुआती हिस्से में उनकी चंचलता और बाद के हिस्से में उनकी टूटन- दोनों को उन्होंने प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा। यही कारण है कि रिलीज के लगभग दो दशक बाद भी गीत का नाम लेते ही सबसे पहले करीना कपूर का चेहरा याद आता है।
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