भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे भी हुए, जो समय की धूल में दबने के बजाय और ज्यादा चमकने लगे। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी 1971 की मास्टरपीस फिल्म ‘आनंद’ का किरदार डॉ. भास्कर बनर्जी, जिसे प्यार से ‘बाबू मोशाय’ के नाम से जानते हैं, उन्हीं अमर पात्रों में से एक है। अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया यह किरदार न सिर्फ उनकी करियर की आधारशिला बना, बल्कि इसने हिंदी सिनेमा में ‘दोस्ती’ और ‘जीवन दर्शन’ को एक नई गहराई दी।
कैसा था डॉ. भास्कर बनर्जी का किरदार
डॉ. भास्कर बनर्जी कोई साधारण फिल्मी हीरो नहीं थे। वे एक ऐसे डॉक्टर थे जो अपनी आंखों के सामने गरीबी और लाचारी को देख-देखकर अंदर से कड़वाहट से भर चुके थे। वे बंगाल से ताल्लुक रखते थे। उनके किरदार में एक ऐसी गंभीरता थी, जो आज के समय में दुर्लभ लगती है।
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फिल्म की शुरुआत में भास्कर एक ऐसा व्यक्ति है, जो जीवन को सिर्फ बीमारियों और मौतों के आंकड़ों के रूप में देखता। वे परेशान हैं कि वे अपनी दवाइयों से गरीबों की भूख और लाचारी का इलाज नहीं कर सकते। उनका यह इंट्रोवर्ट स्वभाव उन्हें दुनिया से काट देता है, जब तक कि उनके जीवन में ‘आनंद’ (राजेश खन्ना) की एंट्री नहीं होती।
बाबू मोशाय और आनंद: विपरीत दिशाओं का मिलन
डॉ. भास्कर बनर्जी के किरदार की अमरता का सबसे बड़ा कारण ‘आनंद’ और ‘बाबू मोशाय’ की केमिस्ट्री है। जहां आनंद एक खुला आसमान है, वहीं बाबू मोशाय एक बंद कमरा हैं। आनंद, डॉ. भास्कर बनर्जी को ‘बाबू मोशाय’ कहना शुरू करता है और धीरे-धीरे भास्कर की कड़वाहट पिघलने लगती है।
अमिताभ बच्चन ने अपनी आंखों और शांत अभिनय से उस बदलाव को बखूबी पर्दे पर उतारा। जब आनंद कहता है कि ‘बाबू मोशाय जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं’ तो भास्कर के चेहरे पर आने वाली वो हल्की सी मुस्कान और आंखों में छिपी नमी यह बयां कर देती है कि एक डॉक्टर होने के नाते वे जानते हैं कि यह आदमी मर रहा है, लेकिन एक दोस्त होने के नाते वे उसे अमर बनाना चाहते हैं।
तकनीकी पहलू और अभिनय की बारीकियां
1970 के दशक की शुरुआत में जब राजेश खन्ना सुपरस्टार थे, तब अमिताभ बच्चन ने एक सह-कलाकार के रूप में अपनी जगह बनाई। डॉ. भास्कर का किरदार निभाना मुश्किल था क्योंकि उन्हें आनंद के चुलबुलेपन के सामने खुद को स्थिर रखना था। इसमें सबसे बड़ी भूमिका डायलॉग डिलीवरी ने निभाई।
अमिताभ बच्चन की आवाज ने इस किरदार को एक वजन दिया। फिल्म के अंत में जब आनंद की मृत्यु हो जाती है और टेप रिकॉर्डर पर उनकी आवाज गूंजती है, तब भास्कर का वह विलाप- ‘आनंद आनंद… अब तो कुछ बोल भाई’ दर्शकों की रूह कपा देता है। इसके बाद बॉडी लैंग्वेज- एक डॉक्टर का एप्रन पहनकर, हाथों को पीछे बांधे हुए सोचना या डायरी लिखना, यह दर्शाता है कि भास्कर बहुत सोचने वाला है। वे अपनी भावनाओं को शब्दों के बजाय अपनी डायरी में उतारते हैं।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
डॉ. भास्कर बनर्जी का किरदार यह सिखाता है कि एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति संवेदना रखना कितना रूरी है। फिल्म में एक सीन है जहां वे एक गरीब मरीज का इलाज मुफ्त में करते हैं, जो उनके पेशे के प्रति उनकी ईमानदारी को दिखाता है। वे एक ऐसे नायक हैं जो अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए गुस्से का सहारा लेते हैं, लेकिन अंदर से उतने ही कोमल हैं।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर, बाबू मोशाय का किरदार हमें शोक के दौर से गुजरना सिखाता है। वे जानते हैं कि उनका सबसे प्रिय दोस्त लिम्फोसारकोमा (कैंसर) जैसी घातक बीमारी से जूझ रहा है। एक डॉक्टर के रूप में उनकी बेबसी और एक दोस्त के रूप में उनका समर्पण, मानवीय संवेदनाओं का सर्वोच्च उदाहरण है।
सिनेमाई विरासत और प्रभाव
आज 50 साल से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी ‘बाबू मोशाय’ का नाम लेते ही एक छवि आंखों के सामने आ जाती है। यह किरदार इसलिए अमर हुआ क्योंकि इसने मौत को डरावना दिखाने के बजाय, उसे जीवन के अंतिम सच के रूप में स्वीकार करना सिखाया। ऋषिकेश मुखर्जी ने इस किरदार के जरिए दिखाया कि सिनेमा में ‘साइड हीरो’ जैसा कुछ नहीं होता।
डॉ. भास्कर बनर्जी कहानी के नैरेटर हैं। पूरी फिल्म उनके नजरिए से दिखाई गई है। उनकी डायरी ही वह जरिया है जिससे हमें आनंद की महानता का पता चलता है। अगर आनंद फिल्म की ‘आत्मा’ है, तो बाबू मोशाय वह ‘शरीर’ हैं जिसने उस आत्मा को महसूस किया और दुनिया के सामने रखा।
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